गुरुवार, 13 जनवरी 2022

सेल्स के बंदे से बिकवाएं कविता संग्रह

 

आखिर दिल्ली पुस्तक मेला, महामारी की बेरहमी के चलते, टालना ही पड़ा। प्रकाशकों के साथ-साथ लेखकों ने भी खुद को तसल्ली दी, अभी नहीं तो अगले बरस सही। किताबें तो आती, छपती और बिकती रहेंगी, फिलहाल इंसान का बचा रहना जरूरी है।

किंतु, मेरे मुहल्ले के एक कवि पुस्तक मेला टलने से विकट दुःखी हैं। दुःखी इस बात को लेकर हैं कि पिछले बरस आए उनके बारह कविता संग्रहों को अब कौन खरीदेगा? अपनी जेब से पैसा देकर छपवाई गई किताबों की कीमत कैसे वसूल होगी?

मेरे मुल्हले के सबसे चर्चित कवियों में से एक हैं वे। ये बात और है कि मुल्हल्ले का कोई भी सदस्य उनकी कविताओं में रत्तीभर इंटरेस्ट नहीं रखता पर सुनाते वे सभी को हैं। महिलाओं को वे उनके इनबॉक्स में घुसकर अपनी कविताएं सुनाने की कोशिश में लगे रहते हैं। इस बात पर एकाध दफा पंगा भी हो चुका है मगर वे नहीं मानते। कवि हैं न!

मुझसे वे थोड़ा हट-बचकर रहना पसंद करते हैं। उनका मानना है कि मैं लेखक हूं ही नहीं। क्योंकि मेरी अभी तक कोई किताब नहीं है। उनकी निगाह में, उसी शख्स को लेखक कहलाने का अधिकार है, जिसकी अपनी किताब हो।

पर मुझे वे अपनी कविताएं व्हाट्सएप रोज करते हैं। इस उम्मीद में कि मैं कभी तो कुछ कहूंगा। सच कहूं, कविताएं पढ़ना और समझना मेरे लिए ऐसा ही है जैसे गणित का सवाल हल करना। कोशिश यही करता हूं कि कवि और कविता से जितना दूर रहूं, उतना अच्छा।

खैर, अभी दो दिन पहले कवि महोदय सड़क पर मुझसे टकरा गए। एक-दूसरे का हालचाल लेने के बाद बोले- 'दिल्ली पुस्तक मेला तो टल गया, मेरे कविता संग्रहों को बिकवाने की कुछ जुगाड़ बताइए।' मैंने उन्हें सुझाया कि 'वे मुझसे जुगाड़ लगवाने के बजाय किसी सेल्स के बंदे को पकड़ लें। वो उनकी मदद कर सकता है।' उन्होंने पूछा- 'सेल्स का बंदा भला मेरे कविता संग्रहों को कैसे बिकवा सकता है?' मैंने कहा - 'बिल्कुल बिकवा सकता है। जब वो बीमा पॉलिसी, हिटर, कूलर, वाशिंग मशीन, टीवी, फ्रिज आदि बेच सकता है तो किताब भी बेच सकता है। बेचना उसका धरम है।'

फिलहाल, कवि महोदय अभी उधेड़बुन में हैं!

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