रविवार, 10 अक्तूबर 2021

इस्तीफे की प्रासंगिकता


कितना आसान होता है नेताओं के लिए इस्तीफा देना। पार्टी से जरा नाराजगी हुई नहीं कि दो लाइनों का इस्तीफा हाजिर। भविष्य में क्या करेंगे इसकी खास परवाह उन्हें रहती नहीं। क्योंकि ये पार्टी नहीं तो दूसरी पार्टी उन्हें अपने यहां जमा ही लेगी। जन सेवा ही तो करनी है- चाहे इस पार्टी में रहकर की जाए या उस पार्टी में। देश और जन से बढ़कर उनके लिए कोई नहीं होता।

मैंने भी कई दफा अपनी नौकरी से इस्तीफा देने का मन बनाया। इस्तीफा लिख भी लिया। लिफाफे में बंद भी कर लिया। लेकिन बॉस तक ले जाने की हिम्मत न जुटा पाया। भविष्य को लेकर डर गया। पेट और परिवार का ख्याल आ गया। नाराजगी होने के बावजूद नौकरी कर रहा हूं। इधर कुंआ उधर खाई वाली स्थिति है पर क्या करूं।

सच बताऊं, नौकरी करने का मेरा कतई मन न था। मैं नेता बनना चाहता था। राजनीति और जन सेवा को अपना ध्येय बनाना चाहता था। जनता के संपर्क में रहकर उसके दुःख दूर करना चाहता था। लेकिन घर वालों को मेरा नेता बनना मंजूर न था। मुझे जबरन ही नौकरी में घसीटा गया। तरह-तरह की इमोशनल कसमें खाई व खिलाई गईं। मरता क्या न करता आखिर नौकरी करनी पड़ी।

कह कुछ भी लीजिए परंतु नौकरी में भविष्य सुरक्षित नहीं। आज है कल नहीं। बॉस से हर वक्त की तू-तू मैं-मैं अलग। राजनीति में आना, नेता बनना, पार्टी का सदस्य कहलाना बड़ा ही जहीन काम है। देश में इतनी पार्टियां हैं कि नेता ‘नल्ला’ रह ही नहीं सकता। बहुतेरे ऐसा नेता हैं, जिनकी शक्लें कभी इस पार्टी तो कभी उस पार्टी में आराम से देखी जा सकती हैं। जो पार्टी टिकट दे, उसी का पल्लू थाम लीजिए। जन सेवा के लिए हर पार्टी उपयुक्त है।

लोगों की नेताओं के इस्तीफों के प्रति धारणा काफी गलत है। वे उन्हें अच्छी निगाह से नहीं देखते। दल-बदलू का लेबल उन पर चिपका देते हैं। मौकापरस्त बताते हैं। कभी नेता की नजर से देखने की कोशिश कीजिए, इस्तीफा गुलदस्ता सरीखा लगेगा। इस्तीफा गांधीवाद का प्रतीक है। यह भी एक प्रकार का आंदोलन है। एक नेता ही नहीं- इस्तीफा देता हर व्यक्ति मुझे- ‘महान आत्मा’ से कम नहीं लगता। इस्तीफा सदा प्रासंगिक है।

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