शनिवार, 17 अक्तूबर 2020

एक खत सेंसेक्स के नाम

 

प्रिय सेंसेक्स,

बहुत दिन हुए तुम्हारा हालचाल लिए। आशा है, स्वस्थ व प्रसन्न होगे। तुम भी सोचते होगे, साल-छह महीने बाद ही मैं तुमसे रू-ब-रू होता हूं। लेकिन यकीन मानना तुम्हारा ख्याल मुझे रहता हर पल है। तुम्हारा दिन कैसा गुजरा मुझे खबर रहती है। तुम्हारा मूड इन दिनों कैसा है मुझे पता रहता है। तुमको तो मैं कभी भूला ही नहीं सकता। तुम मेरे दिल के बहुत नजदीक हो। हां, यह बात अलहदा है कि तुम्हारी कुशल-क्षेम पूछने में देरी कर देता हूं।

विकट कोरोना काल में भी तुम हिम्मत के साथ निरंतर आगे बढ़ रहे हो। यह देखकर खुशी मिलती है। मार्च में, जब कोरोना शुरू ही हुआ था, तुम्हारी हालत बहुत खस्ता हो गई थी। लेकिन जल्द ही तुमने खुद को उस पीड़ा से उबार लिया। वैसे, यह मैंने कई बार देखा है कि तुम नकारात्मकता से बहुत जल्द पार पा लेते हो। तुम्हारी यही जिजीविषा कई लोगों के लिए प्रेरणा बनती है। मैंने न कभी तुम्हें थकते देखा न हताश होते।

आजकल तुमने दलाल पथ पर धूम मचा रखी है। निवेशकों के चेहरों पर मुस्कुराहट ला दी है। उनके पोर्ट-फोलियो चढ़ रहे हैं। दीवाली से पहले दीवाली जैसा माहौल बना हुआ है। बाजार के पंडित भी तुम्हारी बढ़त के गुण गा रहे हैं।

अच्छा ही नहीं बहुत अच्छा लग रहा है यह सब देखकर। सच बताऊं, जब तुम प्लस में बंद होते हो न मुझे बड़ी खुशी होती है। माइनस में तुम्हें कभी देखना ही नहीं चाहता। लेकिन क्या करें मंदड़िये कभी-कभी ऐसा खेल खेल देते हैं कि तुम्हें लुढ़कना ही पड़ता है। अभी ज्यादा दिन न हुए होंगे, जब तुम हजार अंक तक ढह गए थे। लेकिन तुमने खुद को संभाला और शानदार वापसी की। तेज गिरावट के साथ तेजी से संभलने का हुनर तो कोई तुमसे सीखे।

मैं जानता हूं तुम्हारी जिंदगी भीतर से इतनी आसान नहीं जितनी बाहर से नजर आती है। तुम बहुत संवेदी प्राणी हो। किसी को जरा-सी छींक भी आ जाए कि तुम परेशान हो उठते हो। तुम पर जुल्मो-सितम ढहाने वाले भी कम नहीं। मंदड़ियों का एक वर्ग तो चाहता ही यह है कि तुम हर वक़्त गिरते रहो। तुम गिरते हो, उनकी चांदी होती है। बड़े शातिर होते हैं बाजार के मंदड़िये। लेकिन तुम भी कम उस्ताद नहीं। संभलने के बाद उन्हें ऐसा धोबी पछाड़ मरते हो कि चारो खाने चित्त। यह अच्छी बात है कि तुम उनके दबाव में ज्यादा समय तक नहीं रहते। अपने निवेशकों की तुम चिंता करते हो इसीलिए उनका भरोसा तोड़ना नहीं चाहते।

मैंने देखा है आम आदमी तुम पर निगाह कम ही रखता है। तुम्हें वो एलीट वर्ग का मानता। न कभी वो तुम्हारी खुशी में शरीक होता है न कभी दुःख में दुःखी। जबकि तुम पर अर्थव्यवस्था का बड़ा भार है। कृषि के बाद तुम ही हो जो देश के अर्थचक्र को खींचते हो। तुमने अर्थव्यवस्था का हमेशा ही भला चाहा है। इतने बरस तुम्हारे साथ रहते हुए मुझे हो गए, कभी लगा ही नहीं कि तुम अपने लिए जिए हो। हमेशा दूसरों के लिए जीते हो। उनकी भलाई में ही अपनी भलाई का सुख महसूस करते हो।

प्रिय, मैं चाहता हूं तुम्हारी महानता और सहनशीलता पर एक किताब लिखूं। हालांकि तमाम किताबें तुम पर लिखी गई हैं। पर वे कमाई और प्रोफेशनल नजरिए के तहत लिखी गई हैं। किंतु मैं तुम्हारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व का खाका खींचना चाहता हूं। एक ऐसी किताब हो जो 'बेस्ट सेलर' बने।

बहुत किया तुमने दूसरों के लिए। निरंतर कर भी रहे हो। सोचता हूं, थोड़ा मैं भी तुम्हारे लिए करूं। 

मुझे तुम पर गर्व है। तुम निवेशकों के साथ-साथ अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी हो। तुम चढ़ते हो तो लगता है देश-दुनिया में सबकुछ ठीक चल रहा है। कोरोना काल में भी तुम नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हो। तुम बढ़ते रहो। चढ़ते रहो। गतिमान रहो। संघर्षशील बने रहो। लोगों के बीच यों ही सुख-समृद्धि बांटते रहो।

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