गुरुवार, 15 अक्तूबर 2020

संस्कारी होने से परहेज

 

'अच्छे संस्कारों' का रास्ता अपने लिए मैंने हमेशा ही रोके रखा। हालांकि घर वाले चाहते थे कि मुझमें 'अच्छे संस्कार' पड़ें। घर-परिवार और समाज के बीच मैं 'संस्कारी व्यक्ति' के तौर पर जाना व पहचाना जाऊं। लेकिन संस्कारी होने-बनने का मोह मैंने खुद ही त्याग दिया। संस्कारी होना बड़ा जिम्मेदारी का काम है। हर बात में हर चीज का ख्याल रखना पड़ता है। अच्छे विचार, अच्छा व्यवहार। सबसे अच्छे रिश्ते रखने पड़ते हैं। बोलते वक़्त सदविचार ही मुंह से निकलें ऐसा ख्याल रखना पड़ता है। इतना कुछ रख पाना मेरे बस की बात नहीं। और फिर, मैं ही संस्कारी हो गया तो अन्य संस्कारशीलों का क्या होगा। संस्कार की चादर उतनी ही फैलानी चाहिए, जितना पैर समा जाएं।

इसीलिए मैंने बचपन में ही अपने लिए 'उज्जडता का मार्ग' चुन लिया था। बचपन में ही खुद में ऐसी आदतें पैदा कर ली थीं कि समाज और परिवार मुझे 'नासपीटा' समझे। संस्कार और संस्कारी व्यक्ति को कभी अपने पास तक न फटकने दिया। अपनी हर हरकत में नीचता की प्रधानता रखी। न कभी समय से स्कूल गया। न कक्षा में कभी अव्वल आया। न कभी किसी टीचर का सम्मान किया। न किसी रिश्तेदार को भाव दिया। जिंदगी को हमेशा ठेंगे पर रखा। जिस उम्र में मेरे भीतर संस्कार पड़ने चाहिए, उस उम्र में मैं कु-संस्कारी बन रहा था।

अच्छे संस्कार तो इसलिए भी मुझमें पड़ना गैरजरूरी थे क्योंकि मैं बहुत 'नॉटी' था। नॉटीवाद मुझमें कूट-कूटकर भरा था। सुनता किसी की न था, चाहे सामने कोई हो।

यह बात मुझे कभी समझ न आई कि क्यों लोग संस्कारी होने पर इतना जोर देते हैं। संस्कारी होकर ऐसा क्या मिल जाता है, जो कु-संस्कारी होकर नहीं मिल सकता। विडंबना देखिए, संस्कारी होने की सबसे अधिक पाबंदियां स्त्री पर ही थोपी जाती हैं। अपना लड़का चाहे कितना ही कु-संस्कारी क्यों न हो पर लड़की संस्कारी ही चाहिए। समाज भी जाने कितनी तरह के ढकोसलों के बीच हमेशा रहता व जीता है। मेरा सवाल है, स्त्री ही क्यों संस्कारी होने का बोझ उठाए?

मेरे भीतर-बाहर कोई संस्कार नहीं। इसीलिए मैं सुखी हूं। संस्कार रखकर मुझे कुछ नहीं करना। जितना संस्कारी बना रहूंगा, यह समाज मुझे उतना ही 'उल्लू' बनाता रहेगा। संस्कारी होने से कहीं बेहतर है 'पतनशील' बन जाना। कम से कम समाज की कथित परंपराओं से मुक्ति तो मिलेगी। मेरी मित्र-मंडली में एक से एक पतनशील बंदे हैं। मजाल है कभी किसी ने किसी की पतनशीलता पर उंगली उठाई हो।

मेरे विचार में हर संस्कारी को अपने संस्कारों से मुक्त होकर बिंदास जीवन जीना चाहिए। कब तक संस्कारों की पोटली का बोझ खुद पर लादे रहोगे। याद रखना, जिनमें संस्कार होते हैं, वे बड़े सिरफिरे होते हैं। लेकिन मैं सिरफिरा कभी नहीं होना चाहूंगा। एक बार संस्कार का कीड़ा आपमें घुस गया फिर बचना मुश्किल है। मैंने बड़े-बड़े तीसमारखां देखें हैं इस कीड़े के आगे पनाह मांगते।

जीवन में अगर कुछ सार्थक करना है तो संस्कार का दामन छोड़िए। खुद को स्वतंत्र बनाइए। बिंदास जिया कीजिए। संस्कार आदि में उलझे रहेंगे तो जीवन बेहद कठिन हो जाएगा। बताना मेरा फर्ज था। शेष आपकी मर्जी।

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