सोमवार, 31 अगस्त 2020

रसोड़े में कौन था

 

बरेली के बाजार में गिरे झुमके का न मिल पाना और रसोड़े में कौन था का रहस्य न मालूम चल पाना देश की बड़ी समस्याएं हैं। मगर अफसोस इन समस्याओं की तरफ किसी का ध्यान ही नहीं। बस ऐसे ही तो समस्याएं जमा होती रहती हैं। जनता सवाल पूछती है पर जवाब किसी के पास नहीं होता। सरकार की किरकिरी होती है। जांच एजेंसियों पर शक गहराता है। देश की इज्जत को बट्टा लगता है। लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। बनाने वाले ढेर तरह की बातें बनाते हैं। लोग हैं, कुछ तो कहेंगे ही।

मीडिया भी इन दिनों सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते एक ही सवाल पूछ रहा है कि उस रोज रसोड़े में कौन था? हालांकि अभी वो सुशांत और रिया के बीच फंसा हुआ है तब भी रसोड़े पर बात कर ही लेता है। और फिर खाली कुक्कर को गैस पर चढ़ा देना 'अपराध' जैसा है। बहू को इतना भी सेंस नहीं। भला इस लापरवाही को कौन सास बर्दाश्त करेगी। बावजूद इसके अभी कोई भी श्योर नहीं कि रसोड़े में था कौन? राशि बेवजह बदनाम हो रही है।

मेरे विचार में सीबीआइ को इसकी जांच सौंपी जानी चाहिए। नहीं तो अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई की भी मदद ली जा सकती है। मैं नहीं चाहता नेशन इस रहस्य को जानने से वंचित रह जाए कि रसोड़े में कौन था! 57 सेकेंड के इस वीडियो ने इन दिनों सोशल मीडिया पर तहलका मचाया हुआ है। हर किसी की ज़बान पर एक ही सवाल है कि रसोड़े में कौन था? मगर यह सवाल सवाल ही न बना रहे इसलिए इसकी जांच होनी चाहिए। दूध का दूध पानी का पानी होना ही चाहिए। इस विषय पर लाइव वार्तालाप होना चाहिए। बड़ी-बड़ी सर्च कंपनियों को इस काम पर लगा देना चाहिए। खबरिया चैनलों व साहित्यिक आयोजनों में इस मुद्दे पर बहस होनी चाहिए। विमर्श हो। देश का हर व्यक्ति अपना कामधाम छोड़ रसोड़े में कौन था, खोजने में लग जाए।

रसोड़ा, चना और कुक्कर प्राथमिकता बनें। मैंने कुछ ऐसा ही किया है। दफ्तर में काम से अधिक चर्चा रसोड़े पर किया करता हूं। दिन में कई-कई बार उस वीडियो को देखता हूं। व्हाट्सएप ग्रुप में भी रसोड़ा ही छाया रहता है। लोगों का ध्यान कोरोना से भटकर रसोड़े पर टिक गया है। कभी-कभी लगता है, देश में रसोड़ा-क्रांति चल रही है। एक तरफ रिया है दूसरी तरफ रसोड़ा। दोनों के बीच होड़ लगी है, 'शोहरत' का खिताब किसकी झोली में आएगा।

लोगों को दिल लगाने का बहाना मिल गया है। आज के दौर में दिल लगाना सबसे कठिन काम है। दिल लग गया तो उसे बहलाना भी पड़ेगा। न्यूज़ चैनलों पर सुशांत, रिया और रसोड़ा यही सब दिल लगाने और बहलाने के काम आ रहे हैं। वाकई, देश कितना बदल चुका है। धीरे-धीरे कर रसोड़े में तब्दील होता जा रहा है।

बरेली में गुम हुआ साधना का झुमका भले न मिला हो, पर प्रार्थना कीजिए, रसोड़े में कौन था जल्द मिल जाए। यह बड़ा टास्क है। मुझे हल्का-सा शक है, रसोड़े में कहीं 'कवि' तो नहीं था!

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