शुक्रवार, 8 मई 2020

हंगामा है क्यों बरपा


लोग क्षुब्ध हैं। कह रहे हैं, तालाबंदी के बीच शराब बिक्री की छूट नहीं दी जानी चाहिए थी। इससे समाज और घरेलू हिंसा में वृद्धि होगी। बताइए, यह भी कोई बात हुई भला! आटा, दाल, चावल आदि बिक्री की छूट है पर शराब बिक्री पर 'हंगामा' बरपा हुआ है। दारू प्रेमियों पर लानत भेजी जा रही है। लोग भी न कितने आत्म-केंद्रित हो गए हैं। हमेशा अपने बारे में सोचते हैं। चालीस दिन से जो बंदा 'सूखा' घर में बैठा है अगर ठेके पर जाकर दो घूंट लगा लेता है तो क्या गलत करता है!

एक तरफ कोरोना का ख़ौफ़, दूसरी तरफ तालाबंदी का झंझट आदमी क्या करे, कहां जाए, कैसे अपने गम को गलत करे; इससे उबरने के लिए 'कुछ' तो चाहिए न। जब लाल दवाई में हर मर्ज का इलाज मुमकिन है फिर थोड़ी-बहुत ले लेने में क्या हर्ज! दिमागी परेशानियों से मुक्ति के लिए यह 'रामवाण' है। कसम से। खुद के 'निजी अनुभव' के आधार पर कह रहा हूं।

यकायक ठेकों पर उमड़ी भीड़ को देख कहा गया कि यह लॉकडाउन का उल्लंघन है। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया जा रहा। आदि। ये सब मिथ्या-प्रचार है। दारू प्रेमियों ने हर नियम-कायदे का पूर्णतः पालन किया। बराबर एक-दूसरे के बीच दो फिट का अंतर रखा। न ठेके पर न ठेके से बाहर न कोई आपस में लड़ा न झगड़ा। न किसी ने दारू चढ़ाकर सड़क पर हंगामा काटा। न कहीं छेड़छाड़ की वारदात हुई न छीनाझपटी की। दारू की बिक्री 'शांति' के साथ संपन्न हुई। और क्या लेंगे!

हर दारू-प्रेमी 'हंगामेबाज' नहीं होता, ध्यान रखें। बल्कि जितना सभ्य और अपने काम से मतलब रखने वाला दारू-प्रेमी होता है शायद ही कोई होता हो। पीकर हंगामा काटना उसका मकसद कभी नहीं रहा। जाने-अनजाने कभी कोई बहक गया हो तो बात अलग है। बहक कर भला कौन डांवाडोल नहीं होता।

चाहे कोई माने या न माने पर कोरोना का काट सिर्फ दारू में निहित है। दारू ही है जो इससे लड़ व भिड़ सकती है। 'इम्युनिटी' में जितनी श्रीवृद्धि दारू कर देगी, कोई और दवा या वैक्सीन नहीं कर पाएगी। मेरे मोहल्ले के एक वरिष्ठ दारू प्रेमी का कहना है- कोरोना महज वहम है। मैं उनसे इतिफाक रखता हूं। लगी रहे दुनिया कोरोना की वैक्सीन को बनाने के चक्कर में पर दारू प्रेमियों ने तो पहले ही इस पर सफलता पा ली है।

इतिहास गवाह है, दारू या दारू प्रेमी ने कभी किसी प्रकार की हिंसा की वकालत नहीं की। खुद को हमेशा इससे बचाकर रखा। कुछ ऐसे महापुरुष भी हैं, जिनके पीने के बाद लगेगा ही नहीं कि उन्होंने पी भी है। कमाल का 'कंट्रोल' रखते हैं वे खुद पर। वो तो दो-चार बहक कर हंगामा खड़ा कर देते हैं, जिससे दारू और दारू प्रेमी मुफ्त में बदनाम हो जाते हैं। वरना उनसे अधिक 'शांत' इस धरती क्या ब्रह्मांड में कोई नहीं।

हमें दारू प्रेमियों को 'मुख्यधारा' में लेना ही होगा। उनके प्रति अपनी सोच को बदलना होगा। उन्हें सम्मान देना होगा। दारू पीने का मतलब यह नहीं कि अगला 'बिगड़ैल' है। मुझे ही देख लीजिए, मेरे चिंतन व लेखन का सारा दारोमदार दारू पर निर्भर है। लगाने के बाद मैं कहीं बेहतर लिख पाता हूं। एक मैं ही नहीं बड़े-बड़े लेखकों-शायरों ने पीने के बाद लिखा और क्या खूब लिखा। हम आज उनके लिखे को बिंदास गुनगुना रहे हैं।

दारू पर हंगामा खड़ा न करें। जिन्हें शौक है पीने का उन्हें पी लेने दें। ठेके दारूबाजी के अड्डे नहीं, यह भ्रम अपने मन से निकल फेंके। देश की अर्थव्यवस्था में दारू प्रेमियों का भी बड़ा योगदान है। इसे कभी न भूलें। कोरोना से जंग का यही अंतिम उपाय है। 

अंत में-
हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी-सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है

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