मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

घर में खाली रहने का लुत्फ

आजकल घर पर 'खाली' रहने का 'लुत्फ' उठा रहा हूं। सुबह से लेकर रात तक खाली ही रहता हूं। खाली रहने को छोटा काम न समझें। यह बहुत बड़ा काम है। बड़ा काम करने से मैं कभी पीछे नहीं हटता।

मैं इतना खाली रहता हूं कि 'वर्क फ्रॉम होम' भी नहीं कर पाता। क्या करूं, टाइम ही नहीं मिलता। खाली रहने में टाइम का बड़ा लोचा है। हालांकि मेरे मोहल्ले के सब लोग 'वर्क फ्रॉम होम' में व्यस्त रहते हैं। लेकिन मैं उनकी नकल नहीं करता। यह क्या बात हुई भला कि घर पर रहो और 'वर्क फ्रॉम होम' भी करते रहो। यह खाली रहने और घर पर रहने दोनों का 'अपमान' है। भई, जब हमसे कहा गया है कि घर में रहिए। तो घर में ही हूं। घर के अलावा कहीं नहीं जा रहा। पिछले कई दिनों से तो मैंने पड़ोसी के यहां झांक कर यह भी नहीं देखा है कि वो है भी या नहीं। 'सोशल डिस्टेंसिंग' का पूरा ख्याल रख रहा हूं।

आलम यह है, बीवी से बात भी छह फीट की दूरी पर रहकर ही करता हूं। उसे मेरा यों दिनभर खाली रहना अखर अवश्य रहा है पर कह नहीं पाती, मजबूरी है। बीवी की मजबूरी का फायदा उठाने का मौका हर रोज थोड़े न हाथ आता है।

वैसे, खाली रहना मेरे तईं कोई बड़ी बात नहीं। मैं तब भी लगभग खाली-सा ही रहता था, जब पूरी दुनिया किसी न किसी काम में लगी रहती थी। दफ्तर में भी मैं खाली रहने की ही कोशिश अधिक किया करता हूं। कभी किसी फ़ाइल पर निगाह मार ली तो सही, नहीं तो जाने दो। और लोग हैं तो वे देख लेंगे। मुझे यह कहने में जरा भी शर्म नहीं कि मैं दफ्तर में 'खाली बैठने की ही तनख्वाह' ले रहा हूं। अपनी-अपनी किस्मत है। यों भी अधिक काम करके बॉस ने मुझे कौन-सा प्रोमोशन दे देना है। जितना बन पड़े करो। बाकी पर खाक डालो।

खाली बैठना मुझे मक्खी या मच्छर मारने से अधिक बेहतर लगता है। मक्खी या मच्छर को क्यों मारना, कौन-सा वे हमें नुकसान पहुंचा रहे हैं। मैं 'जियो और जीने दो' के सिद्धांत को मानता हूं। जब मुझे खाली बैठे रहना पसंद है तो जीव-जंतुओं को क्या न होगा!

खाली बैठकर ही तो देश, समाज और दुनिया की चिंता की जा सकती है। सबसे अधिक ऊंचे आइडियाज खाली बैठकर ही आते हैं। मैं बताऊंगा तो आप हंसेंगे। इन दिनों मैं कोरोना वायरस की वैक्सीन किस विधि से बनाई जाए, इस पर मंथन कर रहा हूं। अब इतनी ऊंची विधि सोचने के लिए खाली टाइम चाहिए कि नहीं। इधर-उधर के कामों में घिर कर तो यह काम नहीं हो सकता न। मुझे पक्की उम्मीद है कि जल्द ही मैं इस पर कुछ ऊंचा सोच पाऊंगा।

एक बात और बताऊं। मैं अपना लेखन खाली बैठकर ही किया करता हूं। खाली रहकर ही अधिक अच्छा लिख पाता हूं। लेखन है ही बैठे-ठाले का काम। पता नहीं अन्य लेखक लेख व किताब लिखने के लिए कई-कई दिन कैसे बर्बाद कर देते हैं। मैं उतना ही लिखता हूं, जितना मेरा खालीपन परमिशन देता है।

लॉकडाउन की छ्त्र-छाया में जो हैं, वे खाली रहें। स्वस्थ रहें। लेकिन घरों में ही रहें। घर में रहकर अपने खालीपन को एंजॉय करें।

3 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुघवार 29 एप्रिल 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Subodh Sinha ने कहा…

उत्तम सलाह ...

Shah Nawaz ने कहा…

वाआआह क्या खूब कहा 😜😂