सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

सोना और चोर

सोने ने बमचक मचाई हुई है। न खरीदने वालों के हाथ आ पा रहा है न चोरों के। इसने सबसे अधिक 'आर्थिक नुकसान' हमारे चोर भाइयों का ही किया है। बेचारे न सोना चुरा पा रहे हैं न बेच। महंगे होने के कारण लोगों ने सोना पहनना भी कम कर दिया है। और, घर में जो रखा था, उसे लॉकर में डलवा रहे हैं। अब चोर किस मुंह से किसी के घर चोरी करने जाए। सोना ही एक ऐसा आइटम है, जिसे चुराकर वे अच्छी कमाई कर लेते हैं। अपना घर चला लेते हैं। लेकिन उस पर भी अब ग्रहण लग गया है।

छिनैती की घटनाएं भी अब घट गई हैं। वरना पहले तो चेन-कुंडल खींचने की वारदातें आए दिन अखबारों में पढ़ने को मिल जाया करती थीं। महिलाएं भी बड़ी अजीब हैं। अरे अपने लिए नहीं तो कम से कम चोरों की भलाई के लिए ही सोना पहनकर घर से बाहर निकला करें। ताकि उन बेचारों की भी दुकान चलती रहे। एक यही तो उनकी कमाई का जरिया है, उस पर भी महंगाई की मार। घोर अन्याय है चोर बिरादरी के साथ। मैं इसकी सख्त शब्दों में मज्ज्मत करता हूं। सरकार को इस बारे में जरूर कुछ सोच-विचार करना चाहिए।

सोने के संग समस्या यही है कि वो कब में बढ़ जाता है, कुछ पता नहीं चलता। रात भर में अपना दांव खेल देता है। लोगों में भी सोने के प्रति जाने क्या मोह पाल रखा है; रोटी पानी में डुबोकर खा लेंगे लेकिन सोना जरूर खरीदेंगे। चाहे घर में खुद के रहने के लिए जगह न हो पर सोना जरूर रखेंगे। पहनने को चाहे ढंग के कपड़े न हों पर सोना जरूर पहनेंगे। मतलब हद है- भगवान को सोना चढ़ा देंगे पर चोर को नहीं देंगे। इतना है तो थोड़ा चोरों को भी दे दो ताकि उनका घर-परिवार भी चलता रहे। किसी गरीब की भलाई करने में दुआएं ही मिलती हैं।

चोरी करना कितना जोखिम भरा काम है, यह तो कोई चोर से ही पूछे। किसी अनजान घर में जाकर चुराई करना, मेरे तो सोचकर ही पसीने छूट जाते हैं। यहां मैं कलम चलकर ही खुद को ऊंचा लेखक मानता हूं। अजी, कलम का क्या है कोई भी चला सकता है। परंतु चोरी हर कोई नहीं कर सकता। इसके लिए जिगर और इच्छाशक्ति दोनों की भरपूर जरूरत होती है। कभी-कभी तो चोर मुझे लेखकों से कहीं अधिक सरल और सच्चे जान पड़ते हैं। लेखक चूंकि बुद्धिजीवि होता है इसलिए हर समय शब्दों-भाषा का जाल बुनता रहता है। चोर सिर्फ चोर होता है। अपने धंधे से मतलब रखता है। यहां-वहां अपनी टांग नहीं फंसाता फिरता। वो तो खामख्वाह मैं लेखक बन गया, जबकि मुझे तो चोर ही बनना चाहिए था।

लोग सोने के महंगा होने पर, अदृश्य डर के कारण, उसे लॉकर में डलवा रहे हैं जबकि मैंने सोना घर में ही रख छोड़ा है। वो इसलिए कल को अगर चोर मेरे घर चोरी करने आता है तो उसे निराश होकर न लौटना पड़े। उसका भी घर-परिवार चलता रहे। वो मुझे दुआएं दे। सोने का क्या है, वो तो पैसे ही तरह हाथ का मैल है। आज है, कल नहीं।

बल्कि मैं तो कहता हूं देश के हर नागरिक को चोरों का ख्याल रखना चाहिए। ज्यादा नहीं तो महीने से दो चोरियां तो अपने घर में करवा ही लेनी चाहिए। बड़े बुजुर्ग भी कह गए हैं- धन बांटने से बढ़ता है।

सही बोल रहा हूं, सोने का चोरी चला जाना पुण्य का काम है। इससे घर में बरक्कत बनी रहती है। सोने का महंगा होना चोरों के पेट पर लात है।

मुझे आम आदमी की सोने के पीछे दीवानगी कभी समझ नहीं आई। जिसे देखो वो सोना जोड़ने में लगा पड़ा है। कोई शौक के लिए जोड़ रहा है तो कोई शादी के लिए जोड़ रहा है तो कोई आड़े वक़्त के लिए जोड़ रहा है। अमां, क्या कीजिएगा इतना सोना जोड़कर। जबकि साथ कुछ नहीं ले जाना है फिर भी...। यही सोना जब चोरी चला जाता है तब रोते हैं। चोरों को बद्दुआएं देते हैं। थाने में रपट लिखवाते हैं। बेवजह पुलिस वालों को भी परेशान करते हैं।

मैं तो फिलहाल इस प्रतीक्षा में हूं कि सोना जल्द नीचे आए और चोरों का कारोबार फिर से चल निकले। मुझे यह कतई अच्छा नहीं लगता कि हम खाएं और चोर बेचारे हमारा मुंह ताकें। उनका दाना-पानी भी चलता रहे तो क्या हर्ज है।

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