गुरुवार, 9 जनवरी 2020

एक बे-किताब लेखक का दर्द

इस बार भी मैं पुस्तक मेला में नहीं जा रहा। जाऊं भी तो किस मुंह से! किताब मेरी कोई है नहीं। कोई प्रकाशक मुझे जानता नहीं। लेखक जरूर हूं पर लेखकों के बीच 'अनजान' ही हूं।

पुस्तक मेला में लेखकों को अपनी-अपनी किताबों के प्रमोशन व लोकार्पण कराते हुए तस्वीरें सोशल मीडिया पर जब देखता हूं तो मुझको खुद के लेखक होने पर शर्म-सी आती है। ऐसा लगता है, उन सब के बीच मेरे लेखक होने की कोई 'हैसियत' ही नहीं।

यह एक कड़वी सच्चाई है कि लेखक को लेखक तभी माना जाता है, जब उसकी कोई किताब हो। बिना किताब लेखक 'बिना सींग का गधा' सामान है।
यही वजह है कि बीवी मुझे लेखक ही नहीं मानती। उसकी निगाह में मैं कलम घिसने वाला 'घसीटा लेखक' हूं। न मेरे कने कोई छोटा-बड़ा पुरस्कार है न कोई किताब। वो यह ताना भी मार देती है कि अब तक लिखकर मैंने अपना समय और जीवन ही बर्बाद किया है। मेरी हैसियत घर में दरअसल 'घर की मुर्गी दाल बराबर' की है।

बीवी बात की नजाकत को समझती नहीं। कुछ भी बोल देती है। खैर...बीवी है।

पता है, मैं अपनी किताब क्यों नहीं लाना चाहता। किताब लाने के सैकड़ों झंझट हैं। प्रकाशक से सेटिंग करो। उसके तरह-तरह के नखरे सहो। अपनी जेब से पैसा खर्च करो। किताब आने के बाद उसका यहां-वहां प्रमोशन करते फ़िरो। जैसे फिल्मी हस्तियां अपनी फिल्मों का करती हैं। किताब बिकती रहे तो बल्ले-बल्ले। न बिके तो कूड़े का ढेर। इसे आप मेरा दिमागी फितूर भी कह सकते हैं।

फिर भी, मैं उन लेखकों को शाबासी देता हूं जो अपनी किताब को 'हिट' करवाने में जी-जान जुटे रहते हैं। एक दिल्ली पुस्तक मेला ही नहीं देश भर में जहां-जहां भी पुस्तक मेला लगता है, वहां-वहां अपनी किताब बेचने दौड़ पड़ते हैं। यह अच्छी बात है। बाजार है तो किताब है। किताब है तो लेखक है। बाकी कब तलक आदर्शवाद को ढोते रहेंगे।

पुस्तक मेला में किताबों पर तव्वजो उतनी नहीं दी जाती जितनी उसके लोकार्पण और सेल्फियों को दी जाती है। किताब का विमोचन अगर कोई ऊंचा साहित्यकार कर दे फिर तो लेखक के कदम जमीन पर पड़ते ही नहीं। उस फोटू को वो अपने फेसबुक पर दीवार पर इतनी ऊंचाई पर ले जाकर टांगता है कि इटली में खड़े व्यक्ति को भी बराबर दिख जाए। लेखक को मशहूर होने के लिए अब उतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती, जितनी पुराने जमाने के लेखक-साहित्यकार किया करते थे। सोशल मीडिया दरअसल लेखक का 'पीआर' है।

लेखक को फर्क इससे नहीं पड़ता कि उसकी किताब कितनों ने पढ़ी। फर्क पड़ता है, उसकी किताब कितनी बिकी। सालभर में कितने संस्करण आए। सोशल मीडिया और ऑन-लाइन प्लेटफॉर्म पर कितनी हिट रही।

लेखक, लेखन और किताब के फंडे बदल चुके हैं पियारे।

भले ही अपने शहर या मोहल्ले में मैं कितना ही ऊंचा लेखक क्यों न हूं लेकिन बेकार है। मेरी लेखकीय ऊंचाई का पता मेरी किताबों की बिक्री से ज्ञात होता है। इसीलिए तो मैं कभी किसी से कहता ही नहीं कि मैं लेखक हूं। कहीं खुद को लेखक कह दिया तो अगला यही सवाल करता है कि अब मेरी कितनी किताबें आ चुकी हैं? बेहतर है कि चुप रहो।

लेखक भले ही खुद को बाजार का लेखक मानने से इंकार करता रहे पर हकीकत यही है कि हम सब बाजार की कठपुतलियां हैं। बाजार जैसा नचाता है, वैसा ही हम नाचते हैं। पुस्तक मेला में उसी लेखक की असली कद्र होती है, जो अपने हिसाब से बाजार, प्रकाशक, पाठक और लेखन को नचाना जानता है। मुझे खुद की किताब की मार्केटिंग करते हुए लेखक बहुत पसंद हैं। यह सही भी है। दूसरों का मुंह ताकने से बेहतर है, अपना बाजार खुद ही बन जाओ।

मैं बस यहीं तो पिछड़ गया। हालांकि बीवी मुझसे कितना ही कहती रही कि खुद के लिखे को बेचो। अपनी किताब लाओ। उसकी मार्केटिंग करो। बड़े-बड़े प्रकाशकों के साथ उठो-बैठो। हफ्ते में चार चक्कर बरेली से दिल्ली के लगाया करो। लेकिन मैं ठहरा आदर्शवादी लेखक। बीवी की बातों पर कभी ध्यान ही न दिया। बाजार और बाजारवाद को हमेशा फालतू की चीज समझा।

लेकिन अब धीरे-धीरे सारे फंडे समझ आ रहे हैं। बाजार और पाठक के बीच खुद को बतौर लेखक अगर जीवित रखना है तो किताब तो लानी ही पड़ेगी। मुझे अपनी किताब न लाने की जिद को त्यागना ही होगा। क्योंकि लेखन में धोबी का कुत्ता बने रहने से कुछ हासिल नहीं; न घर का न घाट का!

खैर, इस पुस्तक मेला को तो जाने दीजिए अगले पुस्तक मेला तक मेरी पूरी कोशिश रहेगी अपनी दो-चार किताबें लानी की। तब मैं भी ठसक के साथ दिल्ली पुस्तक मेला में जाया करूंगा। फिर मेरी गिनती भी मशहूर लेखकों के बीच हुआ करेगी। इस बीच साहित्य के एकाध पुरस्कार-सम्मान झटकने के प्रयास भी साथ-साथ चलते रहेंगे।

3 टिप्‍पणियां:

nirmal gupta ने कहा…

न छपने की वजह ....पर भी कुछ लिखें.

mukul ने कहा…

Adbhut मजा आ गया पढ़ कर dhanyvad

Rita Puri ने कहा…

👌🙏