गुरुवार, 9 जनवरी 2020

विमोचक के ठाठ

वे वरिष्ठ कवि ही नहीं, वरिष्ठ विमोचक भी हैं। अब तक कितनी ही पुस्तकों का विमोचन कर चुके हैं। बड़ी-बड़ी दूर से उन्हें विमोचन करने के लिए बुलाया जाता है। ऐसी धारणा है कि उन्होंने जिस लेखक की पुस्तक का विमोचन कर दिया, समझ लीजिए वो 'पवित्र' हो गया। झूठ क्यों बोलूं, मेरे ही एक दोस्त की पुस्तक का उन्होंने विमोचन किया, अगला महीने-दो महीने में ही साहित्य का 'ऊंचा पुरस्कार' पा गया। मित्र ने मुझे भी मेरी पुस्तक का विमोचन उन्हीं से करवाने की सलाह दी है।

इन दिनों वे दिल्ली पुस्तक मेला व्यस्त हैं। शायद ही वहां ऐसा कोई बुक स्टॉल हो जहां वे विमोचन करते हुए न पाए जाते हों। पुस्तक चाहे कैसी भी हो, किसी भी लेखक की हो, कहीं से भी छपी हो; ये सब वो नहीं देखते। उनका काम विमोचन करना है, सो कर देते हैं। बता दूं, मुफ्त में वो किसी पुस्तक का विमोचन नहीं करते। वाकायदा पैसे लेते हैं। इसमें गलत भी क्या है, आखिर 'प्रोफेशनल विमोचक' हैं, कोई ऐरे-गैरे, नत्थू-खैरे विमोचक नहीं। समझे।

सुना है, उनकी पत्नी भी विमोचिका हैं। लेकिन वे सिर्फ लेखिकाओं की पुस्तकों का ही विमोचन करती हैं। इन दिनों वे भी दिल्ली पुस्तक मेला में विमोचनों में व्यस्त हैं। सुना तो यह भी है कि उनके पिता जी भी अपने जमाने के ऊंचे विमोचकों में से एक थे। लेकिन वे प्रधनमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री आदि की पुस्तकों का ही विमोचन किया करते थे। राजनीति और नेताओं के बीच उनकी बड़ी तगड़ी पैठ थी। लेकिन पिता जी के खर्च होने के बाद उनके सुपुत्र ने इस पुशतैनी काम को संभाल लिया। और, क्या खूब संभाला।

वैसे, पुस्तक विमोचन का काम बुरा नहीं है। अगर अच्छे लेखक न भी बन पाओ तो कामयाब विमोचक तो बन ही सकते हो। विमोचन की लाइन में संभावनाएं ही संभावनाएं हैं। न तो यहां किसी प्रकाशक की चिरौरी करने की जरूरत है न लेखक के आगे गिड़गिड़ाने की। पुस्तक छपी है तो अगला विमोचन करवाएगा ही करवाएगा। यह ठीक वैसा ही काम है, जैसे किसी के घर बच्चा हो और वो मुंडन या नामकरण संस्कार न करवाए, ऐसा तो हो ही नहीं सकता।

पुस्तक मेला में तो विमोचनों की बाढ़-सी आई हुई है। एक ही विमोचक एक ही दिन में कितनी-कितनी पुस्तकों को विमोचित कर रहा है। लोग जितना लेखक को न पूछ रहे, उससे कहीं ज्यादा विमोचक की आवभगत में लगे पड़े हैं। विमोचक के आगे क्या आलोचक और क्या समीक्षक सब फेल हैं।

वे जितना साल भर में कविताएं लिखकर न कमा पाते, उससे कहीं ज्यादा 10-12 दिनों के पुस्तक मेला से कमा लेते हैं मय पत्नी। शहर में होने वाले पुस्तक विमोचन के आयोजनों से अलग कमाते हैं। ठाठ हैं उनके।

मैं लेखक जरूर हूं किंतु मेरी भी उनके आगे कोई औकात नहीं। छपता होऊंगा देश भर के बड़े-बड़े अखबारों में पर उनका तो विमोचक की हैसियत से रुतबा मुझसे कहीं ऊंचा है।

कभी-कभी मैं सोचता हूं, लेखन-वेखन छोड़कर क्यों न विमोचक ही बन जाऊं। तब ऐश ही ऐश होगी मेरी उनकी तरह। पुस्तक विमोचन करने को तो मिलेगी ही, कमाई होगी सो अलग। प्रोफेशनल विमोचक बनने का यही तो फायदा है। दुकान चलनी चाहिए, चाहे कैसे भी चले।

2 टिप्‍पणियां:

विकास नैनवाल 'अंजान' ने कहा…

चिंता न कीजिये हम आपसे ब्लॉग का विमोचन करवाएंगे।🤣🤣🤣

Udan Tashtari ने कहा…

कभी-कभी मैं सोचता हूं, लेखन-वेखन छोड़कर क्यों न विमोचक ही बन जाऊं।..सही सोच रहे हैं :)