बुधवार, 22 जनवरी 2020

हां, मैं घटिया व्यंग्यकार हूं

चित्र साभार : गूगल
जब किसी मित्र लेखक की यह प्रतिक्रिया मिलती है कि 'यार, तुम बड़े घटिया व्यंग्य लिखते हो' तब यकीन मानिए, सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। तब अहसास होने लगता है कि मेरे व्यंग्य कुछ कमाल कर रहे हैं। मेरी भी पहचान, भले घटिया व्यंग्यकार के रूप में ही सही, स्थापित हो रही है। और क्या चाहिए मुझे।

घटिया व्यंग्य लिखना इतना आसान नहीं, जितनी आसानी से लोग ताना मार देते हैं। घटिया लिखने के लिए खुद को खपाना पड़ता है। दिमाग का दही करना पड़ता है। भानुमति का कुनबा जोड़ना पड़ता है। मन को घटिया ही लिखने के लिए हमेशा तैयार करना पड़ता है। यानी- वो सब करना पड़ता है, जिसे न करने के लिए आपका दिल गवाही न दे।

मेरा दावा है, आज तक मैंने एक भी 'अच्छा व्यंग्य' नहीं लिखा। जब लिखा घटिया ही लिखा। बल्कि कहूं, मुझे घटिया लिखने और घटिया कहलवाने में बड़ा फक्र महसूस होता है। मेरी बीवी मुझे 'घटिया शौहर' कहती है। मजाल है जो कभी उसके कहे पर मैंने उसे टोका हो। बीवी को हक़ है शौहर को कुछ भी कहने और मानने का।

घटिया लिखना मुझे एक दिन में थोड़े न आ गया। तगड़ी मेहनत की है इसके लिए। बचपन में, कक्षा में, मैं हमेशा किसी भी विषय पर घटिया निबंध ही लिखकर देता था। सबसे घटिया पेपर मेरा हिंदी और गणित का जाता था। कक्षा में नम्बर भी उतने ही घटिया आते थे। मैं मेरी कक्षा का सबसे 'घटिया विद्यार्थी' रहा हूं।

इसीलिए मुझे कतई बुरा नहीं लगता, जब कोई मित्र लेखक या पाठक मुझे घटिया व्यंग्यकार घोषित करता है। मेरे आसपास के वातावरण का असर भी मेरे लेखन पर रहता है। मेरी कोशिश यही रहती है कि मुझे घटिया मित्र-मंडली मिले। घटिया पड़ोसी मिलें। घटिया रिश्तेदार मिलें। घटिया बॉस और जॉब मिले। ऊपर वाले का शुक्र है कि यह सब मेरे पास है।

आपको विश्वास नहीं होगा, मैं राशन से लेकर कपड़े तक घटिया ही खरीदता व पहनता हूं। ताकि घटियापन का स्वाद बना रहे।

मैं अपने मित्र और पाठकों को यकीन दिलाता हूं कि मैं आगे भी ऐसे घटिया व्यंग्य ही लिखता रहूंगा। ऐसा लिखने में मुझे 'मानसिक संतोष' मिलता है।

2 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

लिखते चलें।

Sagar ने कहा…

मैंने अभी आपका ब्लॉग पढ़ा है, यह बहुत ही शानदार है।

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