मंगलवार, 21 जनवरी 2020

क्रांतियां ही क्रांतियां

चित्र साभार : गूगल
देश में इन दिनों 'क्रांतियों' की धूम है। जिधर निगाह डालो, उधर क्रांति हो रही है। कोई आजादी के लिए क्रांति कर रहा है तो कोई छात्रों के बहाने क्रांति कर रहा है। कोई सोशल मीडिया पर रहकर क्रांति कर रहा है तो कोई टीवी चैनलों पर बैठकर। कोई रजाई में घुसकर क्रांति कर रहा है तो कोई कविता लिखकर। मतलब- जितने लोग हैं, उतनी ही तरह की क्रांतियां हैं। किसी की क्रांति का रंग लाल है, किसी का हरा, किसी का नीला तो किसी का नारंगी। अच्छा, क्रांतिकारियों में भी आपस में विकट होड़ मची है कि किसकी क्रांति 'जोशीली' है, किसकी 'कामचलाऊ'।

मैं लिहाफ मैं बैठा सबकी क्रांतियां होते हुए देख रहा हूं। देखने के अलावा और कर भी क्या सकता हूं। क्रांति करने के लिए 'साहस' चाहिए, वो मुझमें है नहीं। यों भी, जब इतने लोग क्रांति कर ही रहे हैं फिर मुझे बीच में कूदने की क्या आवश्यकता है। मैं किसी की क्रांति में खलल नहीं डालना चाहता। देखने का लुत्फ ही अलग है।

देखिए, ये जो क्रांतियां हो रही हैं न ये पिछली सदी की क्रांतियों से बिल्कुल अलग हैं। पहले ज्यादातर क्रांतियां जमीन पर उतरकर हुआ करती थीं। आजकल क्रांति करने के लिए आपको जमीन पर उतने की जरूरत नहीं। अगर आपके कने मोबाइल है और आप सोशल मीडिया पर हैं तो आप कहीं से भी, किसी भी तरह की ग्लोबल क्रांति कर सकते हैं। वैसे बता दूं, सोशल मीडिया पर रहने वाला प्रत्येक बंदा खुद को किसी ऊंचे क्रांतिकारी से कम नहीं समझता। उसे लगता है, देश में जो कुछ भी हो-चल रहा है सिर्फ उसी के दम पर हो रहा है। आप उससे उलझ नहीं सकते। वो दो-तीन ट्वीट कर आपकी ऐसी-तैसी कर देगा। इसीलिए तो मैं किसी की क्रांति पर कभी कोई सवाल नहीं उठता। मुझे सभी की क्रांति एक से बढ़कर एक लगती है।

हालांकि मेरे मित्र अक्सर ही मुझे क्रांति करने के लिए उकसाते रहते हैं। किंतु मैं उनकी उकसाहट पर कतई ध्यान नहीं देता। उनका क्या है, वो तो मुझे बत्ती लगाकर निकल जाएंगे। आखिर में झेलना तो मुझे ही पड़ेगा न। वो भी इतनी विकट ठंड में क्रांति की बात मैं सपने में भी नहीं सोच सकता। जो मजा देखने में है, वो करने में नहीं।

बीवी भी मुझसे यही कहती है कि तुम लेखक हो क्रांति करो। ये क्या मतलब हुआ। हर लेखक क्रांति थोड़े न कर सकता है। हां, कुछ अलग टाइप के लेखक होते हैं, जो लेखन भी कर लेते हैं और क्रांति भी। पर मैं उस तरह का साहसी लेखक नहीं। जब से कलम छोड़कर टच-स्क्रीन का साथ क्या पकड़ा है, तब से रही-सही मजबूती भी जाती रही। क्रांति पर लिख तो सकता हूं किंतु कर नहीं सकता। खामख्वाह लफड़े में कौन पड़े।

देख रहा हूं, अब तो सेलिब्रिटी लोग भी क्रांति करने लगे हैं। जहां वो खड़े हो जाते हैं, बस वहीं से क्रांति शुरू हो जाती है। बड़ी ही फैशनेबल किस्म की क्रांति होती है उनकी। चेहरे का मेकअप रत्तीभर भी इधर से उधर न होता। क्रांति उनसे हिंदी में उतनी नहीं हो पाती, जितनी बढ़िया अंगरेजी में कर लेते हैं। कभी कोई मजबूरी हो तब ही वे जमीन पर आते हैं, वरना तो ट्वीट कर-करके ही क्रांति करते रहते हैं। खुद को मशहूर करने का सबसे उम्दा तरीका है यह।

मीडिया भी ऐसे कथित क्रांतिकारी सेलिब्रिटीज को हाथों-हाथ लेता है। सारी डिबेट उन पर ही केंद्रित कर देता है। वो किस आंदोलन का हिस्सा बने हैं, कहां आ रहे हैं, कहां जा रहे हैं सबका हिसाब रखता है। क्रांति का असली आनंद तो सेलिब्रिटीज ही उठा रहे हैं।

क्रांति अब एक दुकान है। पहले किसी जमाने में इसमें त्याग आदि रहा करता था, अब यह प्योर मार्केटिंग का जरिया है। जोर इस बात पर ज्यादा रहता है कि क्रांति की दुकान को चलाने के लिए क्या-क्या करतब किए जाएं। कैसे समाज की आंखों में क्रांतिकारी बना जाए। कैसे रायता फैलाकर उसे यहां-वहां बांटा जाए। यह इतनी सुविधाजनक हो गई है कि जो जीवन में कुछ न कर पा रहा हो, वो आराम से क्रांति कर सकता है। क्रांति का विशेषज्ञ भी बन सकता है। बस आपकी क्रांति को मार्केट करने वाले बंदे आपके पास होने चाहिए। काफी हद तक यह काम सोशल मीडिया कर ही रहा है।

कभी-कभी सोचता हूं, अपना आलस्य त्यागकर मैं भी किसी क्रांति का हिस्सा बन ही जाऊं। जितना नाम लिखकर न कमा पाया हूं, उससे कहीं अधिक क्रांतिकारी बनकर कमा लूंगा। यह तो 'हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा' वाला हिसाब है। सेलिब्रिटी क्रांतिकारी होने के अपने ठाठ हैं। क्रांति और लेखन दोनों दुकानें साथ-साथ चलाता रहूंगा। फिलहाल, सोचना अभी 'प्रोसेस' में है।

खैर, यह जब होगा, तब देखा जाएगा। अभी तो मैं वापस अपने लिहाफ में चलता हूं। अभी मुझे और भी क्रांतियों को होते हुए देखना है।

1 टिप्पणी:

Sagar ने कहा…

मैंने अभी आपका ब्लॉग पढ़ा है, यह बहुत ही शानदार है।

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