रविवार, 19 जनवरी 2020

ठंड और मेरा आलस्य

चित्र साभार : गूगल
यकीन मानिए, ठंड पर लिखने के लिए 'साहस' चाहिए। हालांकि यह मुझमें नहीं फिर भी इधर-उधर से 'साहस' बटोर-बटार कर लिख रहा हूं। ठंड ने न केवल नाक में दम कर रखा है बल्कि गर्दन को भी किसी लायक नहीं छोड़ा है। ये नाक और गर्दन कभी किसी के आगे झुकती नहीं थीं किंतु आजकल या तो बहती रहती है या मफलर में लिपटी रहती है। बीवी तो कई दफा तंज भी कस चुकी है, 'तुम लेखकों के पास नाक और गर्दन न हो तो पाठकों को कितना सुकून मिलेगा।' पता उसे कुछ नहीं फिर भी 'कुछ भी' बोलती है। बीवी है। बीवी की बोलती बंद करना दरअसल शौहर के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। सो चुप ही रहता हूं।

सुना है, इस बार ठंड ने पिछले कई वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ डाले हैं। आलम यह है, मेरी सुबह से लेकर रात तक 'रजाई' में ही बीतती है। आजकल मैंने हर जरूरी काम सिर्फ ठंड के कारण छोड़ रखा है। दफ्तर से दो माह की 'विदआउट वेतन' छुट्टी ले ली है। दिसम्बर के शुरू से ही नहाने को भी 'टाटा-टाटा, बाय-बाय' बोल दिया है। अब या तो दिनभर रजाई में सोता हूं या फिर खाता हूं। हालांकि बीवी को मेरा यों घर में पड़े रहना बेहद खल रहा है, पर बर्दाश्त कर रही है। जिस दिन उसकी बर्दाश्त करने की सीमा पार हो जाएगी, तब कि तब देखा जाएगा। अभी तो मौज उठाओ।

और तो और इस भीषण ठंड में मैंने लिखना-पढ़ना भी मुल्तवी कर दिया है। दिमाग को बेवजह 'अतिरिक्त कष्ट' देने से क्या फायदा। यों भी, ठंड में मेरे विचार और सोच जम-से जाते हैं। हर रोज लिखना ही है, यह कोई पंडित ने थोड़े ही बताया है। आखिर दिमाग को भी आराम की जरूरत होती है।

वैसे, सर्द मौसम के अपने मजे भी हैं। पूरा शरीर 'आलस्य का घर' बन जाता है। किसी काम को करने का मन नहीं करता। वो तो सुबह-सुबह दिशा-पानी के लिए जाना मजबूरी है पर कभी-कभी आलस्य के कारण उसे भी 'गोल' कर देता हूं। रजाई में एक दफा जिस करवट लेट जाओ, फिर करवट बदलने का साहस नहीं होता। इस मौसम में चाय तो अमृत है अमृत। दिनभर में कितनी कप चाय गटक लेता हूं, कुछ ख्याल ही नहीं रहता। अव्वल तो कोई मुझसे मिलने आता नहीं अगर आता भी है तो कहलवा देता हूं कि सो रहा हूं। कौन इतनी सर्दी में गर्म रजाई को छोड़ किसी की आवभगत करने जाए। आने वाले को भी थोड़ा सोचना चाहिए कि इतनी सर्दी में कहां और क्यों जा रहा है। है न...।

जैसाकि मैंने ऊपर बताया कि पिछले कई दिनों से नहाना मैंने स्थगित कर रखा है फिर भी इस मसले पर बीवी से झें-झें हो ही जाती है। वो चाहती है कि मैं ठंड में भी हर रोज नहाऊं। मगर मैं इस 'संघर्ष' से बचना चाहता हूं। खामख्वाह अपने शरीर को कष्ट नहीं देना चाहता। पानी कितना भी गर्म क्यों न हो ठंड तो आखिर ठंड है, कहीं से भी जकड़ सकती है। एकाध बार तो हमारे बीच बात इतनी बढ़ गई कि उसने, इस मसले पर, मुझे तलाक तक देने की खुली धमकी दे डाली। खैर, बात को जैसे-तैसे संभाला। उसकी सन्तुष्टि के लिए गुसलखाने में जाकर 'प्रतीकात्मक' तौर पर पानी उड़ेल आता हूं।

बीवी और जमाना समझता ही नहीं कि ठंड में मुझ जैसे आलसी लोग छिपकली की मानिंद 'इनएक्टिव' से हो जाते हैं। जहां हैं वहीं पड़े रहना चाहते हैं। साल में ये दो महीने ही तो चैन की काटने को मिलते हैं। है न...।

मैं चाहता हूं, ठंड अभी और पड़े। इससे भी तगड़ी पड़े। एक के बजाए मुझे दो रजाई से काम चलाना पड़े। इस बहाने ही सही मेरा आलस्य तो कायम रहेगा न। मैं यों ही रजाई में पड़ा चाय-कॉफी का आनंद उठाता रहूं। दिमाग को अच्छे या बुरे विचार से मुक्त रखूं। लिखने के लिए उंगलियों को कष्ट न दूं। ठंड में तो मोबाइल भी ठंडा लगता है। अतः इसे भी मैंने दो माह की छुट्टी दे दी है।

मैं तो हर किसी से यह कहता हूं कि ठंड है तो इसके पूरे मजे लीजिए न। देश-दुनिया की फिक्र करने के लिए पूरी जिंदगी पड़ी है। इतने सालों के बाद तो ऐसी भीषण मगर दिलकश ठंड पड़ी है। इसको 'एन्जॉय' करने से अभी चूक गए तो फिर ताउम्र पछताते ही रह जाओगे। काम-धाम छोड़ो सीधा रजाई का रूख करो क्योंकि असली आनंद तो उसी में है। क्यों पियारे ठीक कही न।

1 टिप्पणी:

Sagar ने कहा…

मैंने अभी आपका ब्लॉग पढ़ा है, यह बहुत ही शानदार है।

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