रविवार, 13 अक्तूबर 2019

कवि और प्याज

कवि की आंखों में आंसू हैं। वो प्याज पर कविता लिख रहा है। मुझसे उसके आंसू देखे नहीं जा रहे। मैं व्यंग्यकार की आंखों में आंसू देख सकता हूं लेकिन कवि की नहीं। कवि के आंसू किसी बड़े 'अनर्थ' का प्रतीक होते हैं।

कवि देश और समाज की पीड़ा को समझता है। प्याज का 80 पार हो जाना उसे भीतर से दर्द दे रहा है। कवि प्याज प्रेमी है। पता नहीं लोग कवि को सिर्फ प्रकृति प्रेमी ही क्यों समझते हैं।

मेरे मोहल्ले में चार कवि रहते हैं। चारों की कविता और साहित्य की दुनिया में तूती बोलती है। चारों को प्याज इतना पसंद है कि कभी-कभी तो वे अपनी नई कविता की शुरुआत प्याज चख कर ही करते हैं।

लेकिन आजकल थोड़े व्यथित हैं। प्याज का महंगा होना उन्हें टिस दे रहा है। इस कारण न दिन में न रात में चैन से सो पा रहे हैं। एकाध दफा तो मैंने चारों को प्याज की कीमत पर आंसू बहाते देखा है।

मैंने सुना है, कवि गण प्याज की खातिर सीधे सत्ता से टकराने का मन बना रहे हैं। दिल्ली जाकर जंतर-मंतर पर धरना देने की सोच रहे हैं। उन्होंने अपना दर्द अपनी कविता में भी अभिव्यक्त किया है।

मैं अपने मोहल्ले के कवियों की इच्छाशक्ति जानता हूं, वे एक दफा जो ठान लें फिर पीछे नहीं हटते।

प्याज पर मुझे प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की चुप्पी थोड़ा खल रही है। जैसे वे बात-बात पर सरकार का विरोध करने सड़कों पर उतर आते हैं, प्याज पर मौन हैं। क्या बुद्धिजीवि प्याज से नफरत करता है? या फिर वे इसलिए नहीं बोल रहे कि उनमें से कुछ प्याज नहीं खाते ! बुद्धिजीवि प्याज न खाता हो, ऐसा मैं मान नहीं सकता।

खैर, कवि ही अब प्याज की अंतिम उम्मीद है। कवि ही प्याज के लिए संघर्ष कर सकता। कवि ही प्याज की खातिर आंसू बहा सकता है। यहां तक की प्याज बेचने वालों की उम्मीदें भी कवि पर टिकी हैं।

मैं कवि के संघर्ष में उसके साथ हूं। प्याज पर लिखी जा रही उसकी कविता को साहित्य का कोई ऊंचा पुरस्कार मिलना ही चाहिए। आंसुओं में डूबकर कविता लिखना यह प्याज के लिए सम्मान की बात है।

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