मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

झूठ बोलना पाप (नहीं) है!

हालांकि मानने वाले आज भी यही मानते हैं कि झूठ बोलना ‘पाप’ है। कुछ समय पहले तक मैं भी ऐसा ही मानता था। लेकिन जब से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आठ हजार बार से ज्यादा झूठ बोलने के बारे में खबर पढ़ी, तब से मेरा मत ‘झूठ बोलना पाप है’ पर बदल गया।

जाहिर-सी बात है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति इतना झूठ बोल सकता है तो मेरे-आपके झूठ की बिसात ही क्या!

वैसे बता दूं, झूठ मैं भी कम नहीं बोलता। सबसे ज्यादा झूठ तो मैं मेरी बीवी से बोलता हूं। कभी-कभी तो उससे इतना ऊंचा झूठ बोल देता हूं कि वो मेरे झूठ की ‘दीवानी’ हो जाती है। जबकि उसे यह अच्छे से मालूम है कि मुझे झूठ बोलने में महारत हासिल है, तब भी उसने मुझे कभी मेरे झूठ के लिए रोका-टोका नहीं।

दरअसल, हम पति-पत्नी ने अपने-अपने झूठों पर आपस में बेहतर समझदारी बना ली है। तय किया है कि दिन में अगर चार झूठ मैं उसको बोलूंगा तो छः झूठ वो मुझे बोलेगी। कह सकता हूं- हमारी वैवाहिक जिंदगी झूठ के दम पर ही सही मगर बहुत कायदे और आराम से चल रही है।

मेरा निजी मत है कि झूठ जितना हो सके बोलना चाहिए। वो इसलिए क्योंकि सच बोलने पर हमेशा ‘गालियां’ ही सुनने को मिला करती हैं। मुझसे जीवन में जितने भी सच बोलने वाले टकराए, आज की तारीख में सब से सब दुखी हैं। कितने तो ऐसे हैं, जिनका तलाक सच बोलने पर हो गया। जाने कितनों की नौकरी सच बोलने पर चली गई। कितने तो ऐसे भी हैं, जो सच बोलने के कारण नेता नहीं बन पा रहे।

वैसे, ‘झूठ बोलने की कला’ हमें नेताओं से सीखनी चाहिए। जिस और जितनी खूबसूरती से झूठ वे बोल लेते हैं, गारंटी है, धरती से लेकर आकाश तक कोई बोल ही नहीं सकता। इतना समझ लीजिए, वे झूठ का चलता-फिरता ‘इंसाकिलोपीडिया’ होते हैं।

सच कहूं, मुझे झूठ बोलने की ‘प्रेरणा’ नेताओं से ही मिली है!

तो गलत ही क्या किया ट्रंप ने आठ हजार बार से अधिक झूठ बोलकर!

मैं अपनी ही बताए देता हूं- मैंने अपने नाते-रिश्तेदारों में यह झूठ जमकर फैला रखा है कि मुझे साहित्य का सबसे ऊंचा पुरस्कार मिल चुका है। अब तक एक दर्जन से ज्यादा मेरी किताबें आ चुकी है। और, जाने कितनी ही किताबों का संपादन कर चुका हूं। कोई मामूली लेखक नहीं, कितनी ही दफा मैं चेतन भगत सरीखे ऊंचे लेखकों के साथ लंच ले चुका हूं। लेखन में मेरा सिक्का वैसे ही चलता है, जैसे कभी गब्बर सिंह का रामगढ़ में चला करता था।

देखिए, ऊंची छोड़ने और झूठ बोलने में जाता कुछ नहीं, बस मन को तसल्ली मिल जाती है।

यही वजह है कि मैं किसी के भी झूठ पर कभी ‘शक’ नहीं करता।

ऐसा तो इस दुनिया-ए-फानी में कोई होगा ही नहीं जिसने कम या ज्यादा झूठ न बोले हों। कुछ झूठ भलाई तो कुछ दिली-तसल्ली के लिए बोले जाते हैं। लेकिन बोले जाते हैं, यह सत्य है।

हमारे जीवन में झूठ बोलने की प्रासंगिकता को सबसे अधिक ‘मोबाइल’ ने ही बढ़ाया। इस यंत्र पर दिनभर में कितने झूठ बोले जाते हैं, यह खोज का विषय है। सबसे बड़ा झूठ तो ‘बस अभी दो मिनट में आया’ और ‘तबीयत खराब की छुट्टी लेने’ का ही है।

तो जनाब झूठ जितना और जहां तक सध जाए बोलते रहिए। नहीं बोलेंगे तो एक दिन ज़बान आपका साथ छोड़ देगी। बाकी आपकी मर्जी।

3 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति नमन - नामवर सिंह और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर ... अभिनन्दन।।

indu chhibber ने कहा…

Sach bloun ki jhoot?

Anu Shukla ने कहा…

बेहतरीन
बहुत खूब!

HindiPanda