गुरुवार, 3 जनवरी 2019

न्यू ईयर, चारपाई और रजाई

सर्दी शुरू होने से पहले ही तय कर लिया था, इस दफा 'न्यू ईयर' चारपाई पर रजाई में घुसकर ही मनाऊंगा। न कहीं बाहर जाऊंगा, न बाहर से किसी को घर बुलाऊंगा। कम से कम साल का पहला दिन सुकून से तो गुजरे।

घर के एक कोने में बरसों से उपेक्षित पड़ी चारपाई दिल में बड़ा दर्द देती थी। जिस चारपाई पर खेल बचपन बीता, उससे यों मुंह मोड़ लेना भी तो ठीक नहीं। हालांकि शहरों में बहुत हद तक चारपाई के दिन लद चुके हैं। चिंता, चिंतन और अन्य करतब अब बेड पर ही होते हैं। लेकिन तब भी चारपाई की अपनी प्रासंगिकता है।

कभी गांव-कस्बों में चले जाइए, वहां पंचायत आज भी चारपाई पर ही जमती है। हुक्का चारपाई पर गुड़गुड़ाया जाता है। गर्मियों में पेड़ के नीचे ठंडी हवा का आनंद चारपाई पर लिया जाता है।

इसी कारण तो मैंने चारपाई का दामन दोबारा थाम लिया।

'न्यू ईयर' को देसी रंग में मनाने की बात ही कुछ और है। चारपाई, रजाई और कॉफी दिन बनाने के लिए काफी हैं। अब जिनके पास है मुफ्त का फूंकने को वे महंगे होटलों में जाकर नोट फूंकें। अपने को न तो इतना शौक है न नोट है।

हालांकि बीवी को देसी अंदाज में मेरा 'न्यू ईयर' मनाना कतई पसंद नहीं आता। वो मुझे 'पिछड़ी सोच' का बता तमाम बातें सुना देती है। पर, सुन लेता हूं। सुन लेने के अतिरिक्त मेरे कने कोई और चारा भी तो नहीं। ये तो जन्म-जन्मांतर की खुराक है, जो हर हाल में लेनी ही लेनी है। बेहतर है कि बीवी की प्रत्येक जली-कटी निश्चिंतता के साथ एक कान से सुनकर दूसरे कान से बाहर निकाल दी जाए।

मूर्ख हैं लोग जो न्यू ईयर पर किस्म-किस्म के संकल्प लेते हैं। जबकि संकल्प पूरे एक दिन भी टिके नहीं रह पाते। रात की खुमारी उतरते ही संकल्प भी भाप बनकर उड़ जाते हैं। लेकिन लोगों ने आदत बना रखी है।

इसीलिए तो न मैं कोई संकल्प न्यू ईयर पर लेता हूं न लेने को किसी को कहता हूं। मैं नए साल और सर्दी का आनंद अपनी चारपाई और रजाई में बैठकर उठा रहा हूं। इतना बहुत है मेरे लिए।

मुबारक न्यू ईयर।

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