बुधवार, 19 दिसंबर 2018

काम निकलने से मतलब

मैं काम निकालने में अधिक विश्वास रखता हूं। काम निकलना चाहिए बस, चाहे वो कैसे या कहीं से भी निकले। साफ सीधा-सा फलसफा है, भूख लगने पर खाना ही पेट की अगन को शांत करता है, ऊंची या गहरी बातें नहीं। बातों से ही अगर पेट भर रहा होता तो आज किसान न खेती कर रहा होता, न रसोई में चूल्हे ही जलते नजर आते।

ठीक यही फंडा काम निकालने पर लागू होता है। काम निकालने का बहुत कुछ संबंध 'जुगाड़' से है। है तो है, इसमें गलत भी क्या है। अरे भई, जो बंदा या आईडिया काम निकालने के वक़्त काम न आ सका, वो बेकार है। जुगाड़ के काम में अगर हम आदर्शवाद का राग अलापेंगे तो, मैं समझता हूं, हमसे बड़ा बेवकूफ कोई न होगा!

रुपए-पैसे के मामले में मैं काम निकालने या चलाने को ही महत्त्व देता हूं। जरूरत के वक़्त उसी दोस्त से मांगता हूं, जो वक़्त पर काम चला दे। आई बला को टलवा दे। यही असली दोस्ती है। ज्यादा हिसाब-किताब से अगर चलूंगा तो जिंदगी भर खुद को सिमेटते ही रह जाऊंगा।

देखा जाए तो एक मैं ही नहीं पूरी दुनिया काम निकालने के पैटर्न पर ही चल रही है। कोई राजनीति में तो कोई लेखन में तो कोई प्रेम में तो कोई शादी-ब्याह में काम निकालने में लगा पड़ा है। खासकर, राजनीति और लेखन तो टिके ही काम निकालने के दम पर हुए हैं। नेता चुनाव में ऊंचे वायदे तो लेखक ऊंची बातें कर काम निकाल रहा है। सार यह है कि दुकानें दोनों की ही चल रही हैं। दुकानों का चलते रहना महत्त्वपूर्ण है। बाकी तो बातें हैं। बातों का क्या...।

पहले मैं भी काम निकालने जैसी शॉर्टकट विद्या पर यकीन नहीं करता था। काम चलाने या निकालने वालो को तुच्छ निगाह से देखा करता था। लेकिन एक दिन एक तांत्रिक ने मुझे बताया- 'बेटा, दुनिया-समाज बड़ा मतलबी है। काम निकालने में विश्वास करता है। काम निकल जाने के बाद पलटकर पूछता है- आप कौन? तो जितना और जहां से हो सके काम निकाले जा। फल अवश्य मिलेगा।'

बस उसी दिन से, तांत्रिक की बात मानते हुए, काम निकालने पर ही जोर दे रहा हूं।

बदलते वक्त ने समाज को बड़ा चालू और चालाक बना दिया है। उसका सारा फोकस दूसरे को उल्लू बना अपना काम निकालने पर ही रहता है। आप रोते रहिए सामाजिकता का रोना मगर समाज को चलना अपने तौर तरीके से ही है। फिर भी, हैं कुछ ऐसे लोग भी जो चौबीस घंटे समाज क्या कहेगा की चिंता में ही घुले रहते हैं। जबकि यही समाज काम निकल जाने के बाद पूछता तक नहीं।

दुनिया, समाज, रिश्ते, संबंध सब प्रोफेशनल हो चले हैं। अपनी फंसी को सुलझाने के लिए गधे को बाप बनाने से भी न चूकें।

झूठ क्यों बोलूं- मैंने भी काम निकालने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है। समझ चुका हूं, बेबजह जज्बाती होने में कुछ न धरा। अपना काम निकलवाते रहो। दुनिया-समाज इसी में खुश है।

पत्नियां वो ही ज्यादा प्रसन्न रहती हैं, जो पतियों से अपना काम निकल जाने के बाद उन्हें अपनी ताकत का एहसास तो करवा देती हैं। उनसे जीत पाना बड़ा मुश्किल। किसी और पर क्या टिप्पणी करूं खुद इस दर्द को अक्सर ही झेलता रहता हूं। मगर खुश हूं। पत्नी की मर्जी सर-आंखों पर।

काम निकलवाने के प्रति प्रतिबद्धता बनाए रखिए। ऊपर वाला सब देख रहा है।

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