शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

चिंता कीजिए, मस्त रहिए

जब मेरे कने करने को कुछ खास नहीं होता, तब मैं सिर्फ 'चिंता' करता हूं। 'चिंता' मुझे 'चिंतन' करने से कहीं बेहतर लगती है! मुद्दा या मौका चाहे जो जैसा हो, मैं चिंता करने का कारण ढूंढ ही लेता हूं। ऐसा कर मुझे दिमागी सुकून मिलता है। मन ही मन महसूस होता है, मानो मैंने बहुत बड़ा तीर मार लिया हो।

कहा तो यही जाता है कि चिंता चिता समान। मगर मेरे लिए इस कहावत के कोई मायने नहीं हैं। करना हमेशा वही चाहिए, जिसे करने का दिल करे।

और फिर एक अकेला मैं ही नहीं हूं। यहां सैकड़ों लोग हैं, जो बहाने या बे-बहाने कोई न कोई चिंता करते ही रहते हैं। उन्हें तो कभी कुछ नहीं हुआ। चैन से चिंता कर रहे हैं। आराम से जी रहे। यही नहीं, मैंने तो हंसते-खेलते लोगों तक को चिंता के समंदर में डूबते-उतरते देखा है।

फिर मैं ही क्या गलत कर रहा हूं!

हमें नहीं भूलना चाहिए कि हम मूलतः चिंता-पसंद समाज हैं। चिंता करने की आदत हमारी नस-नस में समाई हुई है। जिस रोज हम चिंता नहीं करते- ट्रेनें समय से नहीं चल पातीं! अफसर घूस नहीं ले पाता। अस्पतालों में मरीज भर्ती नहीं होते। सिस्टम काम नहीं करता। योजनाएं-परियोजनाएं संचालित नहीं हो पातीं। पेट्रोल-डीजल से लेकर सेंसेक्स तक अवसाद की सी अवस्था में आ जाते हैं।

बिन चिंताओं के न समाज चल पाएगा न सरकार न नेता न व्यवस्था।
जहां-जहां जिन-जिन भी क्षेत्रों में चिंताएं रही हैं, उन्होंने ही सबसे अधिक तरक्की की है। चाहे तो इतिहास खंगाल लीजिए।

चिंताएं जिंदगी को आसान बनाती हैं। संघर्ष करने का जज्बा पैदा करती हैं। खाली दिमाग को शैतान का घर नहीं बनने देतीं। जबकि चिंतन दिमाग का दही करता है। इंसान के भीतर बुद्धिजीवियों जैसी फीलिंग लाता है। भीड़ के बीच अकेला बनाता है।

सामूहिक व व्यवहारिक होने के नाते चिंता-प्रदान मनुष्य अधिक सोशल होता है। इंसान वही जो केवल सुख में ही नहीं, हर किसी की चिंता में भी अपनी चिंता का पथ ढूंढ ले।

अब मुझे ही देख लीजिए, मैं उतना चिंता-ग्रस्त खुद की चिंता से नहीं रहता, जितना दूसरों की चिंताओं के बहाने रहता हूं। ऐसा कर मुझे सुख मिलता है।
कोई चाहे माने या न माने चिंता के मामले में सबसे ऊपर नेता ही आते हैं। शायद ही कोई ऐसा नेता हो जो जनता की चिंता न करता हो! यहां तो ऐसे नेता भी कम नहीं जिन्होंने अपना पूरा जीवन ही जनता की चिंता में खर्च कर दिया।
अगर चिंताएं न होतीं तो देश इतना विकास भी न कर पाता। मेरा मस्तक नेताओं की जन-चिंताओं के प्रति गर्व से उठा रहता है।

बे-समझ हैं वे लोग जो चिंता की सकरात्मकता को नहीं समझते। अक्सर ही चिंता नहीं चिंतन करने की सलाहें दिया करते हैं। ऐसे बुद्धिमानों के न मैं मुंह लगता हूं, न उनके मुंह लगाता।

शुक्र है, चिंताओं का जिन्होंने मुझे सामाजिक और बौद्धिक स्तर पर बचाए रखा है। वरना मैं भी किसी बुद्धिजीवि की मिनिंद घर के किसी कोने में बैठकर चिंतन ही कर रहा होता। चिंता करता हूं तो ज्यादा प्रसन्न रह पाता हूं।