शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

'मी टू' की बहस के बीच 'मी टू'

हालांकि ऐसा कुछ है नहीं फिर भी सचेत तो रहना पड़ेगा न। जब से 'मी टू' से जुड़े किस्से कब्र से बाहर आए हैं, मेरा बीपी थोड़ा बढ़-सा गया है। बचपन से लेकर अब तक की गई अपनी 'ओछी शरारतों' पर गहन चिंतन करना शुरू कर दिया है। शायद कहीं कोई ऐसा किस्सा याद आ जाए, जहां 'मी टू' टाइप कुछ घटा हो। मगर याद कुछ नहीं आ रहा।

एकाध दफा तो पत्नी भी पूछ बैठी- 'ऐसा कुछ तुमने तो किसी के संग नहीं किया न?' ज्यादा ऊंची सफाई न देकर बस 'न' में सिर हिला देता हूं। वो क्या है कि बातों की बातों में ज़बान का कोई भरोसा नहीं होता; बातों को कितनी दूर तलक खींच कर ले जावे। अतः चुप रहना ही बेहतर।

समय बड़ा खराब आ लिया है। लेकिन समय जब से डिजिटल हुआ है और भी पेचीदा हो गया। पता न रहता किसी का कब का गड़ा मुर्दा किधर निकाल फेंके। डिजिटल समय में तो बात इतनी रफ्तार से एक छोर से हजारों छोरों तक फैलती है कि बंदा सफाई देते-देते अधमरा टाइप हो जाए।

दरअसल, वायरल होने वाले मुद्दों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि बहती गंगा में सब के सब हाथ धोने निकल पड़ते हैं। स्वयं चरित्र में चाहे कैसे भी हों पर दूसरे के चरित्र का फालूदा बनाकर ही दम लेते हैं। जो भी 'मी टू' की शिकार हुई हैं, उनके प्रति मेरी पूर्ण सहानुभूति। किंतु अब तो वे भी 'मी टू', 'मी टू' बोलने लगे हैं, जिन्हें हिंदी में 'मिट्ठू' तक लिखना नहीं आता।

समाज में तरह-तरह के विचित्र चरित्र के प्राणी भरे पड़े हैं महाराज। क्या कर लीजिएगा!

वो दौरे-दौरा ही कुछ अलग था, जब दिलफेंक आशिकों की समाज में कद्र हुआ करती थी। उनकी मोहब्बतों के किस्से आम हुआ करते थे। हजारों लोग उनसे प्रेरणा हासिल किया करते थे। झूठ क्या बोलूं, दो-चार से तो मैं ही व्यक्तिगत तौर पर प्रभावित रहा हूं।

लेकिन इस 'मी टू' मय तारीख में हर कोई अब दिल देने से बचना चाहेगा। क्या पता दिल देने के बदले 'कॉन्ट्रोवर्सी' ही न गले पड़ जाए।

तो जनाब खुद को बचाए रखिए। अभी 'मी टू' की हवा जोरों पर है।

2 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 12/10/2018 की बुलेटिन, निन्यानबे का फेर - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Jyoti Dehliwal ने कहा…

बहुत सटिक व्यंग।