गुरुवार, 11 अक्तूबर 2018

इतना बुरा भी नहीं भूलना

हालांकि अभी मैं उस भूलने-भालने वाली उम्र में नहीं मगर फिर भी भूलने लगा हूं। कभी भी कुछ भी कैसे भी भूल जाता हूं। दो-चार दफा तो अपने घर का पता ही भूल चुका हूं। वो तो भला हो पड़ोसियों का उन्होंने मुझे घर पहुंचाया। लेकिन बेमकसद किसी के घर में घुस जाना मुझ जैसे शरीफ लेखक को सुहाता नहीं। पर क्या करूं। याददाश्त साथ नहीं देती।

यों भूलने या याददाश्त के कमजोर होने की शिकायत मेरे खानदान में कभी किसी को नहीं रही। अपने अंत समय तक सभी- बाकी जगहों से बेशक लाचार हो गए हों किंतु- याददाश्त के मामले में चुस्त-दुरुस्त ही रहे। मैं ही क्यों इस बीमारी का शिकार हुआ, यह खोज का विषय है। पर खोज करे कौन!

कम उम्र में याददाश्त का बिखरना ठीक संकेत नहीं- ऐसा मेरे डॉक्टर का मानना है। डॉक्टर भी मेरी भूलने की बीमारी से थोड़ा हतप्रभ है। इसके लिए वो मेरे लेखन को जिम्मेवार मानता है। कहता है- तुम लेखक होने के नाते सोचते बहुत हो, इस कारण इस समस्या का शिकार बन गए हो।

जबकि सच यह है कि मैं न के बराबर सोचता हूं। सोचकर लिखने को मैं लेखन की तौहीन मानता हूं। ऐसा लेखक होने से भी क्या फायदा, जो सोचकर लिखे। दिमाग और सोच पर पहले से ही इतने बोझ हैं, एक लेखकीय सोच का बोझ और उस पर लादना उचित नहीं।

कभी-कभी तो मैं भी अपनी भूलने की बीमारी से उकता-सा जाता हूं। फिर बाद सोचता हूं, जीवन में किसी न किसी खास आदत या रोग का बने रहना आवश्यक है। नहीं तो लाइफ बड़ी बोरिंग टाइप लगने लगती है।

और फिर भूलता ही तो हूं। भूलवश किसी को छेड़ता तो नहीं न!

जैसे- दाग अच्छे हैं वैसे ही भूलना भी इतना बुरा नहीं। याददाश्त का शिकार आदमी हमेशा व्यस्त रहता है। दिनभर कुछ न कुछ खोजता रहता है। खुद ही किसी चीज को कहीं रखकर कई बार ढूंढने लगता है, इससे बड़ी खूबसूरत आदत भला और क्या हो सकती है! मैं खुशनसीब हूं!

चूंकि सबको पता चल चुका है कि मेरी याददाश्त में थोड़ी प्रॉब्लम आ गई है इसलिए मेरे भूलने का अब कोई बुरा नहीं मानता। पत्नी भी नहीं। वो तो अक्सर ही मेरा यह कहकर उत्साह बढ़ाती है कि भूलने के लिए जिगर चाहिए होता है, तुम खुशकिस्मत हो। हर बात को हर वक़्त याद रखना दिमाग और सोच का अपमान है।

भूलने की बीमारी मुझे अगर नहीं रही होती तो शायद मैं इतना सफल लेखक भी न बन पाता! ऊंचा लेखक बनने के लिए जरा-बहुत भूलने का साहस खुद में विकसित करना ही चाहिए।

मुझे तो प्रायः यह सुनकर ही बड़ी हैरानी होती है कि लोग इतनी पुरानी-पुरानी बातों, किस्सों, घटनाओं को कैसे याद रख लेते हैं? रत्तीभर भूलते तक नहीं। कुछ तो ऐसे भी होते हैं, जिन्हें पूर्वजन्म की बातें तक याद रहती हैं।

ऐसी स्मरण शक्ति से भी क्या फायदा कि गड़े मुर्दे दिमाग में हर वक़्त चहलकदमी करते रहें।

मैं मेरी याददाश्त के साथ खुश हूं। भूलने से कभी कोई नुकसान नहीं हुआ मुझे। एकदम नॉर्मल रहता हूं। कभी-कभार यहां-वहां चला भी जाऊं तो अड़ोसी-पड़ोसी वापस घर पहुंचा देते हैं। और क्या चाहिए। याददाश्त को हर वक़्त चुस्त रख कौन-सा मुझे न्यूटन या आइंस्टाइन बनना है।

1 टिप्पणी:

विकास नैनवाल ने कहा…

हा हा। सही कहा आपने। भूलने के भी अपने फायदे हैं।