गुरुवार, 18 अक्तूबर 2018

अंदर का रावण

मैं नहीं चाहता मेरे अंदर का रावण मरे! मैं उसे हमेशा जिंदा रखना चाहता हूं। वो जिंदा रहेगा तो दुनिया के आगे मेरा कमीनापन उजागर करता रहेगा। मुझे भरे बाजार नंगा करता रहेगा। मेरा सच और झूठ सामने लाता रहेगा।

हां, मैं बहुत अच्छे से जानता हूं कि रावण की छवि दुनिया-समाज में कतई अच्छी नहीं। उस पर कपटपूर्ण सीता हरण और राम से युद्ध करने संबंधित तमाम इल्जाम हैं। जिद्दी, और अहंकारी भी उसे कहा जाता है। इसीलिए लोग रावण से इतनी नफरत करते हैं। शायद ही कोई अपने बच्चे का नाम रावण रखता हो। उसकी पूजा करता हो। उसे सम्मान देता हो। तब ही तो हर दशहरे पर अपने अंदर के रावण को मारने का आवाहन किया जाता है।

मगर रावण है की मरता ही नहीं। देश, दुनिया, समाज के भीतर उसकी पहुंच दिन-प्रति-दिन बढ़ती ही जा रही है। बलात्कार, चोरी, डकैती, घपला, घोटाला, हत्या आदि में हमें रावण का ही प्रतिरूप देखने-सुनने को मिलता है।

विडंबना देखिए, हमारे बीच से न बुराई का अंत हो पा रहा है न शोषण का। बल्कि और गहरा ही रहा है। तिस पर भी लोग कह रहे हैं, अपने अंदर के रावण को मारिए। मरेगा क्या खाक, जब हम ही नहीं चाहते कि वो मरे।

वैसे एक बात कहूं, बड़ा मुश्किल है अंदर के रावण का मार पाना। कोशिश चाहे कितनी ही कर लीजिए पर किसी न किसी रूप में रावण रहेगा जिंदा ही। पूरी तरह वो खत्म हो ही नहीं सकता। जिस दिन रावण मर लिया, समझिए उस दिन देश में रामराज्य आने से कोई नहीं रोक पाएगा। अमरीका भी नहीं।

जो हो लेकिन मैं अपने भीतर के रावण को जिंदा रखना चाहूंगा। क्योंकि ज्यादा सभ्य और ईमानदारी पूर्ण जिंदगी मैं जीना नहीं चाहता। जिंदगी में कुछ तो ऐसी बदनामियां-बुराइयां हो ताकि लोग भी मुझे- इस बहाने ही सही- याद तो रखें। जब कभी रावण का जिक्र हो, साथ में मेरा नाम भी लिया जाए। समाज में सभी अच्छा करने वाले होंगे तो बुरों को कौन पूछेगा! अच्छाई-बुराई में बैलेंस बराबर का होना चाहिए।

कहना न होगा मौजूदा रावणों से कहीं बेहतर उस समय का रावण था। वो जो भी, जैसा भी था कम से कम आज के रावणों जितना भ्रष्ट तो नहीं था। हां, ये बात अलग है कि भीषण अहंकार के कारण उसकी मति मारी गई थी। जिसकी अंत में उसे उचित सजा भी मिली। वो कहावत है न- विनाश काले, विपरीत बुद्धि।

तो इसीलिए, मैं चाहता हूं मेरे अंदर का रावण थोड़ा-बहुत जीवित रहे। ताकि कुछ डर भी मन में बना रहे। सच कहूं- कभी-कभी तो मेरा दिल अपना नाम रावण कर लेने का भी करता है। मगर...।

इस जन्म में तो खैर बनावटी रावण का किरदार ही निभा रहा हूं। पर चाहता हूं अगला जन्म रावण के रूप में ही लूं। आखिर अनुभव तो ले सकूं रावण की विकराल इमेज का। लेकिन विष नाभि में न रख किसी डिजिटल बॉक्स में रखूंगा।

फिलहाल, अभी मेरे अंदर का रावण पूछ रहा है कि मैं तो किसी 'मी टू' कांड में शामिल नहीं?

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

चिंता कीजिए, मस्त रहिए

जब मेरे कने करने को कुछ खास नहीं होता, तब मैं सिर्फ 'चिंता' करता हूं। 'चिंता' मुझे 'चिंतन' करने से कहीं बेहतर लगती है! मुद्दा या मौका चाहे जो जैसा हो, मैं चिंता करने का कारण ढूंढ ही लेता हूं। ऐसा कर मुझे दिमागी सुकून मिलता है। मन ही मन महसूस होता है, मानो मैंने बहुत बड़ा तीर मार लिया हो।

कहा तो यही जाता है कि चिंता चिता समान। मगर मेरे लिए इस कहावत के कोई मायने नहीं हैं। करना हमेशा वही चाहिए, जिसे करने का दिल करे।

और फिर एक अकेला मैं ही नहीं हूं। यहां सैकड़ों लोग हैं, जो बहाने या बे-बहाने कोई न कोई चिंता करते ही रहते हैं। उन्हें तो कभी कुछ नहीं हुआ। चैन से चिंता कर रहे हैं। आराम से जी रहे। यही नहीं, मैंने तो हंसते-खेलते लोगों तक को चिंता के समंदर में डूबते-उतरते देखा है।

फिर मैं ही क्या गलत कर रहा हूं!

हमें नहीं भूलना चाहिए कि हम मूलतः चिंता-पसंद समाज हैं। चिंता करने की आदत हमारी नस-नस में समाई हुई है। जिस रोज हम चिंता नहीं करते- ट्रेनें समय से नहीं चल पातीं! अफसर घूस नहीं ले पाता। अस्पतालों में मरीज भर्ती नहीं होते। सिस्टम काम नहीं करता। योजनाएं-परियोजनाएं संचालित नहीं हो पातीं। पेट्रोल-डीजल से लेकर सेंसेक्स तक अवसाद की सी अवस्था में आ जाते हैं।

बिन चिंताओं के न समाज चल पाएगा न सरकार न नेता न व्यवस्था।
जहां-जहां जिन-जिन भी क्षेत्रों में चिंताएं रही हैं, उन्होंने ही सबसे अधिक तरक्की की है। चाहे तो इतिहास खंगाल लीजिए।

चिंताएं जिंदगी को आसान बनाती हैं। संघर्ष करने का जज्बा पैदा करती हैं। खाली दिमाग को शैतान का घर नहीं बनने देतीं। जबकि चिंतन दिमाग का दही करता है। इंसान के भीतर बुद्धिजीवियों जैसी फीलिंग लाता है। भीड़ के बीच अकेला बनाता है।

सामूहिक व व्यवहारिक होने के नाते चिंता-प्रदान मनुष्य अधिक सोशल होता है। इंसान वही जो केवल सुख में ही नहीं, हर किसी की चिंता में भी अपनी चिंता का पथ ढूंढ ले।

अब मुझे ही देख लीजिए, मैं उतना चिंता-ग्रस्त खुद की चिंता से नहीं रहता, जितना दूसरों की चिंताओं के बहाने रहता हूं। ऐसा कर मुझे सुख मिलता है।
कोई चाहे माने या न माने चिंता के मामले में सबसे ऊपर नेता ही आते हैं। शायद ही कोई ऐसा नेता हो जो जनता की चिंता न करता हो! यहां तो ऐसे नेता भी कम नहीं जिन्होंने अपना पूरा जीवन ही जनता की चिंता में खर्च कर दिया।
अगर चिंताएं न होतीं तो देश इतना विकास भी न कर पाता। मेरा मस्तक नेताओं की जन-चिंताओं के प्रति गर्व से उठा रहता है।

बे-समझ हैं वे लोग जो चिंता की सकरात्मकता को नहीं समझते। अक्सर ही चिंता नहीं चिंतन करने की सलाहें दिया करते हैं। ऐसे बुद्धिमानों के न मैं मुंह लगता हूं, न उनके मुंह लगाता।

शुक्र है, चिंताओं का जिन्होंने मुझे सामाजिक और बौद्धिक स्तर पर बचाए रखा है। वरना मैं भी किसी बुद्धिजीवि की मिनिंद घर के किसी कोने में बैठकर चिंतन ही कर रहा होता। चिंता करता हूं तो ज्यादा प्रसन्न रह पाता हूं।

'मी टू' की बहस के बीच 'मी टू'

हालांकि ऐसा कुछ है नहीं फिर भी सचेत तो रहना पड़ेगा न। जब से 'मी टू' से जुड़े किस्से कब्र से बाहर आए हैं, मेरा बीपी थोड़ा बढ़-सा गया है। बचपन से लेकर अब तक की गई अपनी 'ओछी शरारतों' पर गहन चिंतन करना शुरू कर दिया है। शायद कहीं कोई ऐसा किस्सा याद आ जाए, जहां 'मी टू' टाइप कुछ घटा हो। मगर याद कुछ नहीं आ रहा।

एकाध दफा तो पत्नी भी पूछ बैठी- 'ऐसा कुछ तुमने तो किसी के संग नहीं किया न?' ज्यादा ऊंची सफाई न देकर बस 'न' में सिर हिला देता हूं। वो क्या है कि बातों की बातों में ज़बान का कोई भरोसा नहीं होता; बातों को कितनी दूर तलक खींच कर ले जावे। अतः चुप रहना ही बेहतर।

समय बड़ा खराब आ लिया है। लेकिन समय जब से डिजिटल हुआ है और भी पेचीदा हो गया। पता न रहता किसी का कब का गड़ा मुर्दा किधर निकाल फेंके। डिजिटल समय में तो बात इतनी रफ्तार से एक छोर से हजारों छोरों तक फैलती है कि बंदा सफाई देते-देते अधमरा टाइप हो जाए।

दरअसल, वायरल होने वाले मुद्दों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि बहती गंगा में सब के सब हाथ धोने निकल पड़ते हैं। स्वयं चरित्र में चाहे कैसे भी हों पर दूसरे के चरित्र का फालूदा बनाकर ही दम लेते हैं। जो भी 'मी टू' की शिकार हुई हैं, उनके प्रति मेरी पूर्ण सहानुभूति। किंतु अब तो वे भी 'मी टू', 'मी टू' बोलने लगे हैं, जिन्हें हिंदी में 'मिट्ठू' तक लिखना नहीं आता।

समाज में तरह-तरह के विचित्र चरित्र के प्राणी भरे पड़े हैं महाराज। क्या कर लीजिएगा!

वो दौरे-दौरा ही कुछ अलग था, जब दिलफेंक आशिकों की समाज में कद्र हुआ करती थी। उनकी मोहब्बतों के किस्से आम हुआ करते थे। हजारों लोग उनसे प्रेरणा हासिल किया करते थे। झूठ क्या बोलूं, दो-चार से तो मैं ही व्यक्तिगत तौर पर प्रभावित रहा हूं।

लेकिन इस 'मी टू' मय तारीख में हर कोई अब दिल देने से बचना चाहेगा। क्या पता दिल देने के बदले 'कॉन्ट्रोवर्सी' ही न गले पड़ जाए।

तो जनाब खुद को बचाए रखिए। अभी 'मी टू' की हवा जोरों पर है।

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2018

इतना बुरा भी नहीं भूलना

हालांकि अभी मैं उस भूलने-भालने वाली उम्र में नहीं मगर फिर भी भूलने लगा हूं। कभी भी कुछ भी कैसे भी भूल जाता हूं। दो-चार दफा तो अपने घर का पता ही भूल चुका हूं। वो तो भला हो पड़ोसियों का उन्होंने मुझे घर पहुंचाया। लेकिन बेमकसद किसी के घर में घुस जाना मुझ जैसे शरीफ लेखक को सुहाता नहीं। पर क्या करूं। याददाश्त साथ नहीं देती।

यों भूलने या याददाश्त के कमजोर होने की शिकायत मेरे खानदान में कभी किसी को नहीं रही। अपने अंत समय तक सभी- बाकी जगहों से बेशक लाचार हो गए हों किंतु- याददाश्त के मामले में चुस्त-दुरुस्त ही रहे। मैं ही क्यों इस बीमारी का शिकार हुआ, यह खोज का विषय है। पर खोज करे कौन!

कम उम्र में याददाश्त का बिखरना ठीक संकेत नहीं- ऐसा मेरे डॉक्टर का मानना है। डॉक्टर भी मेरी भूलने की बीमारी से थोड़ा हतप्रभ है। इसके लिए वो मेरे लेखन को जिम्मेवार मानता है। कहता है- तुम लेखक होने के नाते सोचते बहुत हो, इस कारण इस समस्या का शिकार बन गए हो।

जबकि सच यह है कि मैं न के बराबर सोचता हूं। सोचकर लिखने को मैं लेखन की तौहीन मानता हूं। ऐसा लेखक होने से भी क्या फायदा, जो सोचकर लिखे। दिमाग और सोच पर पहले से ही इतने बोझ हैं, एक लेखकीय सोच का बोझ और उस पर लादना उचित नहीं।

कभी-कभी तो मैं भी अपनी भूलने की बीमारी से उकता-सा जाता हूं। फिर बाद सोचता हूं, जीवन में किसी न किसी खास आदत या रोग का बने रहना आवश्यक है। नहीं तो लाइफ बड़ी बोरिंग टाइप लगने लगती है।

और फिर भूलता ही तो हूं। भूलवश किसी को छेड़ता तो नहीं न!

जैसे- दाग अच्छे हैं वैसे ही भूलना भी इतना बुरा नहीं। याददाश्त का शिकार आदमी हमेशा व्यस्त रहता है। दिनभर कुछ न कुछ खोजता रहता है। खुद ही किसी चीज को कहीं रखकर कई बार ढूंढने लगता है, इससे बड़ी खूबसूरत आदत भला और क्या हो सकती है! मैं खुशनसीब हूं!

चूंकि सबको पता चल चुका है कि मेरी याददाश्त में थोड़ी प्रॉब्लम आ गई है इसलिए मेरे भूलने का अब कोई बुरा नहीं मानता। पत्नी भी नहीं। वो तो अक्सर ही मेरा यह कहकर उत्साह बढ़ाती है कि भूलने के लिए जिगर चाहिए होता है, तुम खुशकिस्मत हो। हर बात को हर वक़्त याद रखना दिमाग और सोच का अपमान है।

भूलने की बीमारी मुझे अगर नहीं रही होती तो शायद मैं इतना सफल लेखक भी न बन पाता! ऊंचा लेखक बनने के लिए जरा-बहुत भूलने का साहस खुद में विकसित करना ही चाहिए।

मुझे तो प्रायः यह सुनकर ही बड़ी हैरानी होती है कि लोग इतनी पुरानी-पुरानी बातों, किस्सों, घटनाओं को कैसे याद रख लेते हैं? रत्तीभर भूलते तक नहीं। कुछ तो ऐसे भी होते हैं, जिन्हें पूर्वजन्म की बातें तक याद रहती हैं।

ऐसी स्मरण शक्ति से भी क्या फायदा कि गड़े मुर्दे दिमाग में हर वक़्त चहलकदमी करते रहें।

मैं मेरी याददाश्त के साथ खुश हूं। भूलने से कभी कोई नुकसान नहीं हुआ मुझे। एकदम नॉर्मल रहता हूं। कभी-कभार यहां-वहां चला भी जाऊं तो अड़ोसी-पड़ोसी वापस घर पहुंचा देते हैं। और क्या चाहिए। याददाश्त को हर वक़्त चुस्त रख कौन-सा मुझे न्यूटन या आइंस्टाइन बनना है।