शनिवार, 29 सितंबर 2018

बिग बॉस का घर

मनुष्य मूलतः दोगली प्रजाति प्राणी है। दोगलापन उसकी नस-नस में बसा है। सामने कुछ और पीठ पीछे कुछ। दिनभर में जब तक दो-चार बातें इधर की उधर, उधर की इधर कर नहीं लेता उसकी रोटी हजम नहीं होती। दूसरों की जलाने और सुलगाने में उसे उतना ही आनंद आता है, जितना दूधिए को दूध में पानी मिलाने में।

मनुष्य के इसी दोगलेपन को ध्यान में रखकर ही 'बिग बॉस' नामक रियलिटी शो का आविष्कार किया गया होगा! यह शो सम्भवतः बनाया ही इसलिए गया है ताकि भिन्न-भिन्न स्वभाव के व्यक्ति अपने-अपने दुचित्तेपन को दुनिया के सामने रख सकें। बता सकें कि इंसान का दिल और दिमाग भी हाथी के दांत की तरह ही होता है। भीतर से कुछ, बाहर से कुछ।

हालांकि बहुत लोगों का ऐसा मानना है कि 'बिग बॉस' समाज और समाजिकता के लिए खतरा है। भाषा और संस्कृति का दुश्मन है। इससे हम केवल एक-दूसरे की बुराई करना ही सिखते हैं। लेकिन, मैं इन तर्कों से सहमत नहीं। इंसान के अंदर और बाहर के चरित्र को जानने के लिए यह रियलिटी शो बहुत जरूरी है। देखा नहीं, इस घर के सदस्य कितनी छोटी-छोटी बातों पर- एक-दूसरे से- कितना विकट लड़ लेते हैं। 'बिग बॉस' के अलावा क्या आम जिंदगी में हम छोटी-छोटी बातों पर लड़ते या बहस नहीं करते?

समाज में लोग लड़ने के मामले में इस कदर महान हैं कि रिक्शे वाले से लेकर सब्जी वाले तक से दो रुपये के लिए अच्छा-खासा लड़ लेते हैं। जहां चार लोग इकट्ठे हों और लड़े नहीं, बहस न करें, मुंह जोरी न हो- ऐसा तो संभव ही नहीं।
पता है, 'बिग बॉस' की असली सफलता क्या है; वो है तरह-तरह के सेलिब्रिटी के पर्दे के पीछे वाले चरित्र को दर्शकों के सामने रखना। उन्हें देखकर, उनकी बातचीत और व्यवहार से रूबरू होकर लगता ही नहीं कि वे हमसे कुछ भी अलग हैं। बस उन्हें सेलिब्रिटी होने का एक ऊंचा टैग मिला हुआ है। उनकी आपस में लड़ाइयां देखकर हूबहू वही फीलिंग आती है, जो अपने मोहल्ले में हो रही लड़ाइयों को देखकर आती थी।

एक 'बिग बॉस' के घर में मौजूद घर वाले ही नहीं बल्कि हम सब किसी न किसी रूप में अंदर या बाहर बिग बॉस को ही जी और खेल रहे हैं। दुचित्तेपन और दोगलेपन की इंतहा है हमारे। पलभर में किसी के साथ कुछ भी कर डालें। किसी को कुछ भी घोषित कर दें। फूल देते-देते कब किसको पत्थर मार दें, कुछ नहीं पता।

तमाम ऊहापोह से भरा जीवन एक मनोरंजन ही है 'बिग बॉस' की तरह। सुख-दुख की तरह यहां कमीन-पंती भी जरूरी है। सब कुछ अच्छा-अच्छा या आदर्श-मय होगा तो नीरसता ही बढ़ाएगा। बिगड़ैल आइनों में खुद की बिगड़ी शक्ल देखना भी आवश्यक है महाराज।

कोशिश में तो खैर मैं भी लगा हूं 'बिग बॉस' के घर जाने की। देखिए किस्मत कब साथ देती है। मगर उससे पहले उस घर के लायक कोई ऊंचा कांड तो कर लूं!

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