मंगलवार, 18 सितंबर 2018

72 पर टिका रुपया

डॉलर ने एक दफा फिर से रुपए को टंगड़ी मार गिरा दिया है। रुपया 71 के स्तर पर चारों खाने चित्त पड़ा है। बड़ी उम्मीद से वो सरकार और रिजर्व बैंक की तरफ देख रहा है; कोई तो आकर उसे उठाए। उससे सांत्वना के दो बोल बोले। उसमें फिर से उठने का जोश भरे।

अफसोस, सरकार की तरफ से रुपए की गिरावट पर चिंता प्रकट करना तो दूर उसे उठाने की कोशिश भी नहीं की जा रही। अपनी उपेक्षा से रुपए में जबरदस्त रोष है। लेकिन देशहित की खातिर वो अपना रोष जतला नहीं सकता। कल को लोग कहीं यह न कहने लगें कि देखो, अब तो रुपया भी खुद को लोकतंत्र में असुरक्षित महसूस कर रहा है। तिल का ताड़ बनते देर ही कितनी लगती है यहां।

देश की इज्जत रुपए के लिए प्रथम है।

सच कहूं, मैं व्यक्तिगत तौर पर रुपए की सेहत के प्रति फिक्रमंद हूं। मेरी निगाहें हर पल स्क्रीन पर टिकी रहती हैं, जहां रुपए के रेट में घट-बढ़ चलती है। रुपए को जब भी लाल तीर पर लटका देखता हूं, मेरा कलेजा मुंह को आ जाता है। मन करता है, अभी इसी वक्त अपने हाथों से रुपए को हरे तीर पर लाकर खड़ा कर दूं।
मगर कुछ चीजों को हम चाह कर भी अपने बस में नहीं कर सकते।

यह कोई पहली दफा नहीं, जब रुपए पर गिरावट के बादल छाए हैं। ऐसा नवंबर 2016 और अगस्त 2013 में भी हो चुका है। तब भी रुपए ने खुद को बड़ी मुश्किल से संभाला था। तब भी सरकार और वित्तमंत्री ने कुछ खास नहीं किया था। तब भी उसे विपक्ष के मजाक का सबब बनना पड़ा था।
अब जब रुपया लुढ़ककर 72 पर आ टिका है, सरकार कह रही है कि वो जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेगी। ये ग्लोबल समस्या है।

ये क्या बात हुई भला! एक तरफ रुपए की जान पर बन गई है और सरकार अब भी जल्दी के मूड में नहीं! अब एक्शन में नहीं आएगी तो क्या तब आएगी जब रुपया 59पर आ टिकेगा। माना कि रुपया बे-ज़बान होता है पर इसका यह मतलब नहीं कि उसे कैसे भी दबा लिया जाए।

सरकार और वित्त मंत्री महोदय शायद भूल रहे हैं कि अर्थव्यवस्था का सारा दारोमदार रुपए की इज्जत पर ही कायम है।

जिस तरह से रुपए के 72 होने पर उसका सरेआम मजाक उड़ाया जा रहा है। ट्विटर और फेसबुक पर चुटकुलों भरे तंज कसे जा रहे हैं। विपक्ष उसे 'बुरे दिनों' का खलनायक बता रहा है। ये सब देख-सुनकर बेहद दुख हो रहा है। सवा करोड़ की आबादी के बीच हमारा रुपए खुद को अकेला महसूस कर रहा है।

सरकार तो सबको साथ लेकर चलने का दावा चार साल से ठोक रही है। 'सबका साथ, सबका विकास' के तराने जोर-शोर से गा रही है। फिर भी, रुपए की गिरावट पर मौन। भला ऐसे कैसे होगा- सबका विकास?

एक अपने ही देश में नहीं बल्कि विश्वभर में रुपए की फिसलाहट से हमारी अच्छी-खासी किरकिरी हो रही है। उधर, डॉलर हमारे रुपए को निरंतर आंखे तरेरे रहा है। रुपए को धोबी पछाड़ देकर बाजार का राजा बना बैठा है।

रुपए की ये तौहीन देश बर्दाश्त नहीं करेगा। आखिर सहन करने की भी एक सीमा होती है।

थोड़े-बहुत सुधार से नहीं, पूरे और पक्के सुधार से ही रुपए की गिरती सेहत को सुधारा जा सकता है। डॉलर का बढ़ना देशहित में कतई नहीं। डॉलर विदेशी मुद्रा है। विदेशियों के आगे घुटने टेकना न तो हमें मंजूर है न ही रुपए को। इसीलिए तो इतना सब सहने के बाद भी रुपया जमा हुआ है, डॉलर की तानाशाही के आगे। रुपया बड़ा वीर है।

रुपया बचा रहेगा तो देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ इसका सम्मान भी बचा रहेगा। रुपए का 72 होना बहुत खल रहा है हमें।

1 टिप्पणी:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन कुंवर नारायण और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।