सोमवार, 27 अगस्त 2018

पर्सनल नार्मल के बीच फंसे हम

नॉर्मल लोग बड़ी आसानी से मिल जाते हैं। पर्सनल लोग खोजे नहीं मिल पाते। जीवन में घटने वाली तमाम घटनाओं के साथ जितना उम्दा सामंजस्य नार्मल लोग बैठा लेते हैं, उतना पर्सनल नहीं।

यों भी, पर्सनल होने के नार्मल होने से कहीं ज्यादा खतरे हैं। मगर जो इन दोनों को साध ले, वो ही सच्चा संत।

मेरी कोशिश यही रहती है कि मैं जीवन में उन्हीं लोगों की संगत में रहूं, जो पर्सनल कम नार्मल अधिक हैं। पर्सनल मत के लोग अधिकार जतलाते हैं। जबकि नार्मल लोग कूलता में विश्वास करते हैं।

जमाना खराब है। किसके मन में भूत बैठा है। और, किसके मन में राधा। कुछ पता नहीं रहता। एक कान की बात दूसरे कान को पता नहीं चल पाती। पहले तो फिर भी पेट में दबी रहती थीं बातें मगर अब मोबाइल पर आकर तुरंत ही वायरल हो जाती हैं। इज्जत का खतरा है।

पर्सनल से न ज्यादा दोस्ती भली न दुश्मनी।

कृष्ण को ही ले लीजिए। लोग उनके साथ कितना ही पर्सनल होने की कोशिश करें पर वे सबके साथ नार्मल ही रहते थे। यहां तक की गोपियों से भी बहुत पर्सनल न होकर नार्मल का रिश्ता ही रखते थे।

बाकी दुनियादारी में तो फिर भी चल जाता है पर्सनल-नार्मल का राग लेकिन राजनीति और साहित्य में न चल पाता। यहां तो जितनी टांग नार्मल वाला खींचता है, उससे ज्यादा पर्सनल वाला। मैंने तो कई दफा दोनों के मध्य तलवारें तक खींचती देखी-सुनी हैं।

हां, अपने मतलब को साधने के लिए अगर नार्मल या पर्सनल को अपना बाप तक बनाना पड़े तो आराम से बना लीजिए। काम का निकलना जरूरी है, बनिस्बत जोड़-घटाने के। क्या समझे...।

2 टिप्‍पणियां:

Sagar ने कहा…

I just read you blog, It’s very knowledgeable & helpful.
i am also blogger
click here to visit my blog

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन नेत्रदान कर दुनिया करें रोशन - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...