सोमवार, 9 जुलाई 2018

मेरे मरने के बाद...

जीते-जी इस बात का पता लगाना बेहद मुश्किल है कि ये दुनिया, समाज और नाते-रिश्तेदार आपके बारे में क्या और कैसा सोचते हैं। ये सब जानने के लिए आपको मरना पड़ेगा। क्योंकि इंसान की सामाजिक औकात का पता उसके मरने के बाद ही लगता है।

तो, एक दिन मैंने भी यही सोचा क्यों न मर ही लिया जाए। यों भी, जिंदा रहकर मैं कौन-सा अपने चमन को गुलजार कर रहा हूं। मरूंगा तो कम से कम चार लोग मेरी खैर-खबर तो लेंगे। मेरे बारे में दो बातें बुरी तो पांच अच्छी भी बोलेंगे। यमराज की भी एक दिन की दिहाड़ी पक्की हो जाएगी।

मौका पाते ही एक रोज मैंने अपने मरने की खबर वाइरल करवा दी। खबर एक घर से दूसरे घर कम, फेसबुक-व्हाट्सएप पर अधिक दौड़ी। जिसने सुना लगभग हिल-सा गया। अभी उम्र ही क्या थी...के जुमले फिजाओं में तैरने लगे। मेरे जाने को व्यंग्य लेखन का बहुत बड़ा नुकसान बताया गया। फेसबुक पर मेरे लिखे व्यंग्य टांगे जाने लगे। मुझ पर पोस्टें भी लिखी गईं। व्हाट्सएप पर मुझे धीर-गंभीर टाइप श्रद्धांजलि भी दी गई।

ये सब तो खैर सोशल मीडिया पर चलता रहा। आदमी का चरित्र सोशल मीडिया पर कुछ और जमीन पर कुछ और ही होता है।

जमीन पर मेरे खर्च होने की जमीनी हकीकत यह रही कि सब अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त रहे। मेरे मरने की खबर को 'आम खबर' की तरह ही लिया गया। दो-चार लेखक लोग मेरे घर मुझे 'अंतिम सलाम' कहने पहुंचे। दो-चार मिनट मेरे सिरहाने भी बैठे। एक ने तो आपसी खुसर-पुसर में यहां तक कह डाला- 'अच्छा ही हुआ जो महाराज निपट लिए। अखबार में कम से कम एक जगह, एक दिन तो खाली हुआ। वरना, तो जब तक रहा अखबार के कॉलम पर अपना हक जमाए रहा।'

दूसरे ने पहले वाले कि हां में हां मिलाते हुए कहा- 'ठीक फरमाया यार। व्यंग्य की बहुत बड़ी चिरांद था ये। खुद को शौकत थानवी और लतीफ घोंगी से कम नहीं समझता था। जबकि आता-जाता इसे व्यंग्य का 'व' तक नहीं था।' व्यंग्य लेखन पर बोझ थे मियां। तीसरे ने नुक्ता जोड़ा।

मैं अपने भूतपूर्व साथी लेखकों की अपने बारे में जाहिर की जा रही राय को सुन मन ही मन खुश हो रहा था। खुद को दुआएं भी दे रहा था कि अच्छा हुआ मुझे मेरी लेखकीय औकात का अहसास करवा दिया साथी लोगों ने। वरना तो मैं अपने को जाने क्या माने बैठा था।

मरने के बाद अमूमन आदमी को अपनी तारीफें ही सुनने को मिलती हैं मगर मैं लक्की रहा कि मुझे अपनी बुराइयां सुनने को मिलीं। बुरा बनकर रहने में भी सुख है। पर ये सुख हर किसी के नसीब में नहीं आ पाता।
एक बात मुझे और भी पसंद आई कि मेरे जाने के बाद न अखबारों में मेरे ऊपर कोई लेख ही आए न पत्रिकाओं ने मुझ पर केंद्रित अंक ही निकाले। अगर आ जाते तो ऊपर वाले को अपने लेखकीय चरित्र का स्पष्टीकरण देना मेरे तईं बड़ा कठिन पड़ता।

वैसे, बतौर लेखक मरने में हजार झंझट हैं। लोगबाग लेखक को बुद्धिजीवि समझ सेंटी टाइप हो जाते हैं। जबकि हकीकत यह है कि लेखक बुद्धिजीवि नहीं होता। सिर्फ अपनी बुद्धि की कमाई खाता है।

अगर आप भी लेखक हैं तो एक दफा मरकर जरूर देखिए। लोगों के भीतर छिपे, आपके बारे में, सारे सच पता चल जाएंगे।

2 टिप्‍पणियां:

indu chhibber ने कहा…

Mar jayen,lekin agar nirash hi huye to marna bhi bekar hi jayega

Anshu Mali Rastogi ने कहा…

Ha ha ha ha.