मंगलवार, 3 जुलाई 2018

देख लेना, गिरकर फिर उठेगा रुपया

गिरना एक स्वभाविक प्रक्रिया है। कुछ मैदान-ए-जंग में गिरते हैं तो कुछ मैदान-ए-बाजार में। गिरकर जो उठ या संभल नहीं पाते, दुनिया उन्हें बहुत जल्द भूला देती है। जैसे- शेयर बाजार के जाने कितने ही शेयर। आज उन शेयरों का अता-पता तक नहीं। एक बार गिरे तो कभी उठ ही न सके।

यह भी उतना ही सत्य है कि गिरने वाले की हंसी अवश्य बनाई जाती है। उस पर हंसकर उसे इस बात का एहसास कराया जाता है कि तूने गिरकर कितना बड़ा 'अनर्थ' कर डाला। फिर भी, होते है कुछ ऐसे लोग जो अपने गिरने का जबाव खीझकर नहीं बल्कि खुद को साबित कर देते हैं। जैसे- खेल के मैदान पर इस बात को जाने कितनी ही दफा सचिन तेंदुलकर और महेंद्र सिंह धोनी ने सिद्ध भी किया है।

हाल-फिलहाल तो गिरावट का संकट रुपए पर आन पड़ा है। रुपया गिरकर 69 पर अटक गया है। डॉलर ने रुपए को भरे बाजार पटखनी दे डाली है। गिरे रुपए का मजाक बनाया जा रहा है। कोई सोशल मीडिया पर चुटकले खींच रहा है तो कोई बाजार में बत्तीसी फाड़ रहा है। मंदड़िये रुपए के फिसलने पर खुश हैं तो तेजड़िये दुखी।

मगर रुपया स्थिर है। वो अपनी हंसी बनाने का बुरा नहीं मान रहा। उसे मालूम है कि यह गिरावट आंशिक है। गिरकर वो फिर से उठेगा। डॉलर को ईंट का जबाव पत्थर से देगा।

इससे पहले भी तो जाने कितनी दफा रुपया गिरा है। किसी ने संभाला नहीं, खुद ही संभला है। रुपया बहुत समझदार है। उसे अच्छे से मालूम है कि देश की अर्थव्यवस्था का दारोमदार उसके कंधों पर टिका है। वो गिरा-पड़ा रहेगा तो आर्थिक ढांचा ही गड़बड़ा जाएगा।

रही बात उसके लुढ़कने पर हंसने वालों की तो ये वही लोग हैं जो अपनी हंसी हंसते और दूसरे की हंसी पर रोते हैं। इनकी फिक्र रुपया नहीं करता।

रुपए को मैं अपनी प्रेरणा मानता हूं। उसके गिरकर उठने के जज्बे को सलाम करता हूं। ऐसा साहस बहुत कम लोगों में होता है। अपने इसी साहस के दम पर ही तो रुपया बाजार में अब तलक टिका हुआ है।

रुपया बरेली के बाजार में गिरा झुमका थोड़े है कि उठे ही न।

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