सोमवार, 23 जुलाई 2018

दिल मिले न मिले, गले मिलते रहिए

किस्मत वाले होते हैं वो जिन्हें किसी का गले लगना या आंख मारना नसीब होता है। वरना इस मतलबी दुनिया में किसे फुर्सत है, किसी के गले लगने या मौका भांप आंख मारने की।

उन्होंने भी तो उस रोज संसद में यही किया था, भावावेश में जाकर उनके गले ही तो लगे थे। फिर, किसी को एक आंख मार अपना रूतबा जाहिर किया था। मगर लोगों को ये भी नागवार गुजरा। उनके गले लगने और आंख मारने में तरह-तरह के तंज कसे गए। बनाने वालों ने चुटकुले तक बना डाले। ऐसा भी कहीं होता है भला!

देखा भी गया है, तीज-त्यौहार पर तो दुश्मन भी गले मिल लेते हैं। मजाक-मजाक में आपस में आंख भी मार लेते हैं। फिर ये गले मिलना तो छोटे का अपने बड़े के प्रति आदर था। हां, आंख मारने पर पेंच हो सकता है। यह भी तो सकता है कि उन्होंने आंख मारी ही न हो, आंख खुशी के मारे खुद ब खुद दब गई हो।

वैसे, ये आंखें भी न बड़ी चालू चीज होती हैं। आंखों ही आंखों में इशारा कर बैठती हैं। गुस्ताखियां आंखें करती हैं। बदनाम बेचारा इंसान हो जाता है। लोग समझते हैं, ये सब इंसान ने ही अपनी आंखों से जानकर करवाया होगा। उन्हें क्या मालूम आंखें भी मौके की नजाकत देख शरारत कर बैठती हैं।

माने या न माने, गले मिलना और आंख मारना सच्चा सेक्युलरिज्म है। गले और आंखें यह नहीं देखतीं सामने वाली की जात या धर्म क्या है। वे तो प्यार-मोहब्बत में यकीन करती हैं। वो तो हम लोग हैं, जो अपनी निजी खुन्नस की खातिर उन्हें खलनायक बना डालते हैं।
कहते रहिए, वो उनके गले पड़े थे पर हकीकत तो यही है कि वे उनसे गले मिले थे।

मैं तो अब तक इस उम्मीद में रहता हूं कि काश! ऐसे ही कोई मुझसे भी गले मिले। या सरे-राह आंख ही मार दे।

बड़े मतलबी हो गए लोग, गले मिलने को भी सियासत से जोड़ने लगे हैं। आंख मारने को बेइज्जती से। पीठ पीछे खंजर भोंकने से तो कहीं बेहतर है सामने रहकर गले मिलना।

उनका गले मिलना लंबे समय तक याद रखा जाएगा। जो याद नहीं रखना चाहेंगे वे भूल ही करेंगे। दिल मिले न मिले, गले मिलते रहिए।

4 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बढ़िया

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाविद प्रोफ़ेसर यशपाल की प्रथम पुण्यतिथि : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

गले मिलना अच्छा है बशर्ते ...
पर राहुल जी ने कहा है “आँखों की गुस्ताखियाँ माफ़ हों” पर लोग फिर भी उसी का ज़िक्र कर रहे हैं ...

Kavita Rawat ने कहा…

जो छाप बन गयी वह आसानी से नहीं जाती
बहुत खूब!