रविवार, 22 जुलाई 2018

गले मिलना, आंख मारना : सियासत का एक रंग

अविश्वास प्रस्ताव को गिरना ही था, गिर गया। अब तक जिद के आगे जीत सुनते आए थे, इस दफा जिद के आगे हार देख ली। हार भी कोई ऐसी-वैसी नहीं, तगड़ी वाली। लेकिन गिरने या हारने का उन्हें कोई अफसोस नहीं। वे उनके चीख-पुकार युक्त भाषण में फिलहाल अपनी जीत देखकर ही मुतमईन हैं।

देश का बुद्धिजीवि वर्ग भी उन्हें सुन गद-गद है। वे भी उनके भाषण में कथित बोल्डनेस के तार जोड़ने में लगे हुए हैं। चूंकि हम एक लोकतांत्रिक मुल्क हैं, इस नाते हर कोई स्वतंत्र है अपनी खुशी, अपना विरोध चुनने-जताने के लिए।

मुझे तो ऐसा लगता है, भाषणबाजी तो महज बहाना थी, असली मकसद झप्पी और आंख मारने में निहित ही था। यों तो हम बहुत-सी झप्पीयां देखते आए है, पर ये झप्पी 'शुद्ध राजनीतिक' थी। अगर राजनीतिक न होती तो झप्पी के तुरंत बाद आंख भी न मारी जाती। किंतु, ये वो वाली आंख नहीं मारी गई थी, जिसमें स्नेह और अपनापन समाया होता है। जिसमें एक आंख मारने पर ही पटने-पटाने के हाव-भाव छिपे होते हैं। जिसमें अंखियों से गोली चलती हुई प्रतीत होती है। और, जिस एक आंख मारने की घटना ने पिछले दिनों सोशल मीडिया पर अभूतपूर्व तहलका मचा दिया था।

जिस तत्परता के साथ आंख को मारा गया था, स्वयं आंख को भी उम्मीद न रही होगी। आंख ने झपक जाने के बाद सोचा तो अवश्य होगा कि हाय! ये मैंने क्या किया? आंखें अमूमन बहुत भोली होती हैं, उन्हें तो यह तक पता नहीं रहता कि इंसान कब किस पल उनसे क्या काम ले लेगा। चाहे अच्छे में या मजबूरी में, बदनाम आखिर आंखों को ही होना पड़ता है। इस बार भी हुईं।

फिलहाल उनकी झप्पी और आंख मारने के अलग-अलग सियासी मतलब निकाले जा रहे हैं। बात एक छोर से निकल, दूसरे छोर तक दूर बहुत दूर तलक जाने लगी है। कुछ कह रहे हैं, ऐसा भी भला होता है कहीं, तो कुछ ड्रामा बता रहे हैं। ये तो दुनिया है, यहां हर कोई कुछ भी कहने-बोलने को आजाद है। लेकिन नेता मंडली खुश नजर आ रही है। प्रस्ताव का गिरना या उठे रहना उनके लिए इतना बड़ा मुद्दा नहीं, वे तो 2019 की चौसर पर अपने-अपने दलों के भविष्य का अनुमान लगाने में व्यस्त हैं।

जनता उतना भोली भी अब नहीं रही, जैसे पहले कभी नजर आती थी। उसने आक्रामक भाषण को भी खूब समझा। झप्पी और आंख मारने के भी मजे लिए। भाषण पर होने वाली विकट हंगामेबाजी भी उसकी निगाह से छिपी नहीं। उसे अच्छे से मालूम है, कि गड्ढा कहां है। और पानी कहां भरा हुआ है। चुनाव युक्त वादे और जुमले उसे अब मनोरंजन का साधन मात्र लगते हैं। इसलिए तो वो खुद खामोश रहकर नेताओं को चीखने-चिल्लाने का मौका देती है। उसका उत्तर तो वोट में छिपा है।

कभी-कभी तो ऐसा लगता है, जब जनता के पास विकल्प नहीं होता तो वो किसी को भी गले लगा लेती। फिर, पांच साल तक निभाती है। झेलती है। यही होता है, गले लगाने और गले पड़ने का हश्र। कोई जरूरी नहीं जो गले लगा हो वो आपका हमदर्द ही हो। हो सकता है, जान कर गले पड़ रहा हो ताकि आपस में गलबहियों की गुंजाइश बनी रहे।

जिस तरह वे उनके करीब आ कर गले लगे, मानो दिल खिले। अब कितने खिले या नहीं खिले ये तो उनके दिल ही बता सकते हैं। पर सियासत में कभी-कभार ऐसे गले आपस में मिला लेने चाहिए। ताकि गलों को भी ये भरोसा रहे कि वे सिर्फ कटने के लिए ही नहीं होते।

इस झप्पी, आंख और गले मिलन के सीन को देखने के बाद सोच रहा हूं, मुझे भी अपने भीतर थोड़ा सुधार लाना चाहिए। किसी से दिल मिले न मिले हां गला अवश्य ही मिलाते रहना चाहिए। हर्ज तो आंख मारने में भी कुछ नहीं पर वो सीधी जगह जाकर ही लगे इस पर भरोसा बैठाना थोड़ा मुश्किल है।

कुछ भी कहिए, सियासत बहुत खूबसूरत शै है। अच्छा या खराब लगने की यहां अधिक टेंशन नहीं। दुनियादारी का झंझट नहीं। जनता को दिखाने के लिए दुश्मन हैं पर अंदर झप्पी और पप्पी की जगह बनी रहती है। गले मिलकर आंख मारने की छूट भी सियासत में ही संभव है। वरना ऐसा आम जिंदगी में करके देखिए कभी, दिन में चांद-सितारे न नजर आ जाएं तो कहिएगा।

कोई मलाल नहीं अविश्वास पर विश्वास कायम न हुआ। घर बैठे जो मनोरंजन हुआ उसे तो इतिहास भी याद रखेगा हमेशा। गर्व करिए कि देश के नेता न केवल अपने भाषणों से बल्कि झप्पी और आंख से भी खुद को कूल और जनता को बेफिक्र रखना जानते हैं।

सियासतदां सबकुछ साधना जानते हैं। वो तो हमारी ही बेचारगी है, जो उनकी तिकड़मों को समझ नहीं पाते। अगर समझ भी लें तो भी क्या।

सोच रहा हूं, उनकी तरह झप्पी और आंख मारने का एक प्रयोग मैं भी करके देख ही लूं शायद बरसों से बिगड़ी बात अब बन जाए। न बन पाई तो यह मानकर संतोष कर लूंगा- तुमसे न हो पाएगा बेटा।

1 टिप्पणी:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सियासतदान बनना पड़ेगा ये सब करने के लिए ...
राहुल जी तो फ़िल्मी हीरो निकले ... हर किसी के बस की बात नहि है ये ।।।