गुरुवार, 19 जुलाई 2018

हर कोई थूक रहा है

किसी वक़्त मुझे थूक और थूकने वालों से बहुत चिढ़ होती थी। किसी को भी थूकते देख दिमाग भन्ना जाता और दिल भीषण घृणा से भर उठता था। जी तो करता अभी उस बंदे का गिरेबान पकड़ उसके गले में जितना थूक जमा है अपनी उंगलियां डाल सब निकाल लूं। न आंगन टेढ़ा होगा। न राधा नाचेगी।

मतलब हद होती है, जहां जिसको स्पेस मिलता नहीं कि या तो थूक लेता है या फिर मूतने खड़ा हो जाता है। मानो हर सड़क, हर दीवार पर उनके बाप-दादाओं की हुकूमत चल रही हो! हम एक लोकतांत्रिक मुल्क है पर इसका यह अर्थ तो नहीं कि हमने अपने थूक को भी स्वतंत्र कर रखा है। जिधर मन किया आ...क... थू कर दिया। सभ्यता नाम की भी कोई चीज होती है जनाब। लेकिन थूक वीरों को सभ्यता-संस्कृति से क्या सरोकार। कभी-कभी तो उन्हें थूकता देख ऐसा फील होता है, मानो- ईश्वर ने उन्हें धरती पर उतरा ही केवल थूकने और थूकते रहने के लिए है।

जबकि और देशों में ऐसा नहीं है। वहां आप सड़क चलते कभी थूक कर देखिए। तुरंत चालान हो जाएगा। इंसान तो दूर वहां तो कुत्ता भी यों ही सड़क पर हगने से घबराता है। आखिर वे साफ-सफाई पसंद लोग हैं।

मगर हमारे यहां का तो सीन ही उल्टा है। यहां तो आप न थूकने वाले को, न मूतने वाले को, न कूड़ा फेंकने वाले को, न अपने कुत्ते को बीच सड़क हगाने वाले को टोक ही नहीं सकते। दो सेकंड में दोनों तरफ से तलवारें खींच आती हैं। बड़े ही बिंदास अंदाज में न केवल मां-बहन बल्कि पुरखों तक को याद फरमा लिया जाता है। बात बढ़ते-बढ़ते राजनीतिक रसूख तक आ पहुंचती है। मामला कोर्ट-कचहरी में भी आ लेता है।

तो भला ऐसी विकट स्थिति में कौन किसको थूकने से कह या मना कर सकता है! थूकने को तो हमने 'अभिव्यक्ति की आजादी' सरीखा बना लिया है। हमारे आस-पास की रंग-बिरंगी दीवारें इस आजादी की दास्तान स्वयं कहती हुई मिल जाएंगी।

वो दफ्तर, सरकारी या गैर-सरकारी, ही क्या जिसकी दीवारों पर पीक की कलाकृतियां न मिलें। आलम यह है, थूक वीर अपने थूक से दीवारों को इतना सजा देते हैं कि कभी-कभी तो वो पहचान में ही नहीं आ पातीं कि दीवारें हैं या पीकदान...!

मैं तो सोचता था कि थूका-थाकी के दीवाने सिर्फ मेरे ही शहर में हैं। मगर थूकने वालों की सभ्यता के दर्शन मैंने तो मुंबई में भी साक्षात किये हैं। आर्थिक राजधानी की दीवारें भी थूक के असर से बेअसर नहीं।

मेरे जैसे चंद 'थूक ना-पसंद' लोगों को थूक देखकर बेशक जलन होती हो पर थूकने वाले हर जलन से बे-फिक्र होते हैं। कहीं भी  थूककर उन्हें लगता है जैसे उन्होंने थूककर वहां अपने थूक की नाल गड़ दी हो। कभी पान-मसाला खाए बंदे को थूकते देखिए...। उसके मुंह से निकली पान की पीक कब किसके कपड़े रंग दे खुद उसे भी यह एहसास न रहता। न जाने कितनी दफा इस रंगत का सुख मेरे ही कपड़े भोग चुके हैं। मगर इस पाप के लिए अगले पर गुस्सा होने का तो मुझे नैतिक अधिकार ही नहीं। क्योंकि उसका एक 'सॉरी भाईसाहब' हर पाप पर भारी है।... कुछ ऐसे शालीन लोग भी मुझे मिले हैं, जो मुझ पर थूकने के बाद मुझी से रूमाल मांग मेरी शर्ट पोंछ चुके हैं। उनकी शालीनता देख वैसे ही मेरा गला भर आता है, उन पर गुस्सा होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।
कबीरा इस संसार में भांति-भांति के थूक-वीर...।

विडंबना देखिए, कूड़े-कचरे पर सख्ती, साफ-सफाई पर बड़ी-बड़ी बातें खूब हो रही हैं। स्वयं प्रधानमंत्री जी और राज्य सरकारें भी स्वच्छता मिशन में जी-जान से जुटी हुईं हैं। स्मार्ट सिटी का दर्जा पाने के लिए शहर संघर्षरत हैं। परंतु थूक-वीर सबसे बेखबर बस थूके ही जा रहे हैं। उनके ठेंगे से आप कूड़ा सड़क पर फैलाएं या डस्ट-बीन में डालें। उन्हें तो कहीं भी थूकने से मतलब। समझ नहीं आता, सरकार ने थूक और थूकने वालों को क्यों स्वच्छता अभियान से दूर रखा है!

कहा तो यह भी जाता है कि 'इंसान को अपना गुस्सा थूक देना चाहिए।' थूकने वाले जगह-जगह थूककर कहीं इसी कथन का तो पालन नहीं कर रहे? थूकने वालों में हो सकता है कुछ ऐसे बाशिंदें भी हों जो पान-मसाले के बहाने अपना गुस्सा थूककर बाहर निकालते हों!  इसीलिए वे कहीं भी थूकने से डरते न हों! शायद इसी गुस्से के कारण उनके मुंह में थूक की मात्रा ज्यादा बनती हो!... यह भारत है। यहां कुछ भी हो सकता है। मेरे विचार में यह गहन शोध का विषय है।

लेकिन अब सोच रहा हूं, थूकने वालों के प्रति मैं अपना नजरिया थोड़ा बदलूं। नाहक ही उन पर नाराज होने या चिढ़ने से कोई फायदा नहीं। खामखां, अपनी एनर्जी को क्यों वेस्ट करना। बैठे-ठाले क्यों किसी से पंगा लेना? हो सकता है, उनके थूकने के पीछे बड़े कारण रहे हों! यों भी, कोई शौकिया तो थूकेगा नहीं यहां-वहां!

चलिए। छोड़िए। इस बेतुकी बहस को। और भी गम हैं दुनिया में थूक के सिवा!

4 टिप्‍पणियां:

Amit ने कहा…

यह सचमुच एक विकट समस्या है । कुछ समय पहले मैंने ठीक इसी विषय पर व्यंग्य लेख लिखा था । शायद आपको पसंद आएगा । देखिए -- बिना थके थूकते रहे

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Meena sharma ने कहा…

सच में, ये हर गाँव, शहर, गली, सड़क, इमारत की समस्या है। कितना भी स्वच्छता अभियान चला लें आप, ये नहीं रुकनेवाला....जहाँ मर्जी आए थूकना इनका जन्मसिद्ध अधिकार है

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

एक गंदी और घृणित आदत है जो विश्वव्यापी समस्या है। कुछ ने तो दंड रूपी हल निकला है पर अधिकाँश हमारे और चीन जैसे देश अपने इस सैकड़ों टन मुफ्त उत्पाद से बेहद परेशान है !