शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

जल्द ही मैं भी अपना लक पहनकर चल सकूंगा

मैं कई दिनों से इस कोशिश में लगा हूं कि अपना लक पहनकर चल सकूं। लेकिन लक है कि मेरे खांचे में ही नहीं आ पा रहा। जबकि लक की जरूरत के मुताबिक मैंने अपना आकार-प्रकार भी घटा लिया है। बात फिर भी बन नहीं पा रही।

बार-बार दिल में यही ख्याल आता है कि मेरा लक दूसरों के लक से भिन्न क्यों है? भाग्य (लक) जब सबका साथ देता है तो मेरा क्यों नहीं दे रहा?
आप यकीन नहीं करेंगे। अपने लक को मनाने की खातिर मैंने 14 बुधवार के व्रत और 5 शनिवार की पूजा तक निपटा डाली है। अपनी नास्तिकता की प्रवृत्ति को आस्तिकता में तब्दील कर लिया है। मेरे भीतर इस धार्मिक परिवर्तन को देख घर वाले भी खासे आश्चर्यचकित हैं। सब कह रहे हैं कि ये मुझे हुआ क्या है? हालांकि मैं किसी के कहने-सुनने पर ध्यान नहीं देता। मुझे जो करना होता है, करता हूं।

आसपास के लोगों को जब मैं उनके पहने हुए लक के साथ चलता देखता हूं तो मन में भीषण ग्लानि-सी पैदा होती है। अपने-अपने लक के साथ लोग बड़े ही खुश नजर आते हैं। उनका जीवन मुझे अपने से ज्यादा सरल दिखाई देता है। आज लक का दिया उनके पास सबकुछ है। मेरे पास क्या है? ले देके एक उम्मीद। अब उम्मीद पर भी दुनिया या लक कहां कायम है! समय साथ सब बदल चुका है।

बताते हैं, मेरे लक में बचपन से ही खटाई पड़ी हुई है। जब मैं हुआ था, तब हस्पताल में बाढ़ आ गई थी! सूरज का रंग पीले से सिलेटी पड़ गया था! हवा उल्टी दिशा में बहने लगी थी! तब मुझसे अधिक मेरे लक (भाग्य) को कोसा गया था। यहां तक की डॉक्टर साहिब ने भी कह दिया था कि ये बच्चा बड़ा होकर बेहद अन-लक्की लेखक साबित होगा। देखिए, सबूत सामने है।

अपना लक अपने खिलाफ भी हो सकता है, यह मैंने खुद पर पड़ी तब जाना।

ऐसा भी नहीं है कि मेरी मेरे लक से बहुत बड़ी-बड़ी ख्वाहिशें हों। मुझे तो सिंपल उसे पहनकर चलना है। दुनिया को बताना है कि मैं भी अपना लक पहनकर चलने की हैसियत रखता हूं। उस पर भी मेरे साथ इतना भेदभाव। यह तो ठीक नहीं है।

अरे, लोग तो जाने क्या-क्या पहनकर चलते हैं। उसमें भी जाने कितना चोरी और उधार का शामिल होता है। मगर उनका लक तो उनसे खफा नहीं होता। तो मेरे लक को मुझसे ही क्या प्रॉब्लम है?

मेरा लक कहीं मतलबी तो नहीं हो गया है? हालांकि यह मेरी महज खामख्याली है। पर कभी-कभी न चाहते हुए भी अपने लक पर शक करना पड़ता है। शक करना तो वैसे भी मानव-प्रवृत्ति है। जाने कितने ही घर शक की आग में भस्म हो गए। फिर भी, मनुष्य ने शक पर विश्वास रखना बंद नहीं किया। तो मैं कौन-सा नया काम कर रहा हूं? किसी और के नहीं खुद के लक पर ही तो शक कर रहा हूं। हो सकता है, इसी से मुझे मानसिक शांति मिल जाए।

जो भी हो लेकिन मुझे इस बात का भी पक्का यकीन है कि एक दिन मैं अपने लक को खुद के फेवर में पटा ही लूंगा। औरों की तरह मैं भी अपना लक पहनकर चल सकूंगा। तब मुझे खुद पर शर्म भी नहीं आएगी।

फिलहाल, इस करिश्मे के इंतजार में हूं।

3 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन लीला चिटनिस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

प्रियंका गुप्ता ने कहा…

चुटीला व्यंग्य है ये... पढ़ना अच्छा लगा ।

Anshu Mali Rastogi ने कहा…

शुक्रिया प्रियंका जी।