सोमवार, 30 जुलाई 2018

ख्याली पुलाव और इमरान खान

ख्याली पुलाव पकाने में हमारा जवाब नहीं। जब दिल किया किसी न किसी मसले पर ख्याली पुलाव पकाने बैठ गए। सबसे ज्यादा ख्याली पुलाव खाली दिमागों में ही पकते हैं। कभी-कभी इतना पक जाते हैं कि जलने की बू तक आने लगती है। लेकिन पकाने वाले को जलने की बू से कोई मतलब नहीं रहता। उसे तो सिर्फ पकाने से मतलब।

जैसे- पिछले दो-तीन दिनों से इस बात पर खूब ख्याली पुलाव पक रहे हैं कि इमरान खान सेना के इशारों पर काम करेंगे या अपनी मर्जी से। भारत को इमरान खान से आपसी मसलों को सुलझाने में दिलचस्पी लेनी चाहिए कि नहीं लेनी चाहिए।... साथ-साथ मेरे कान तो यह सुनकर भी खूब पक लिए हैं कि इमरान खान का अपना कोई वजूद नहीं, वो पाकिस्तानी फौज की कठपुतली हैं।

बैठे-ठाले ख्याली पुलाव पकाने वाली को मैं दिल से दाद देता हूं। उनके हत्थे कोई भी मसला चढ़ना चाहिए बस फिर देखिए वे पुलाव को घोटकर खिचड़ी न बना दें।

किस्म-किस्म के ख्याली पुलाव तब पक रहे हैं जब इमरान खान के हाथों में पाकिस्तान पर शासन की बागडोर अभी पूरी तरह से आई नहीं है। अभी तो सबकुछ हवा में जुमलों की मानिंद तैर रहा है। अपने पहले भाषण में इमरान ने अभी तो अपनी इच्छाएं ही जाहिर की हैं कि वे पाकिस्तान को क्या बनाने का ख्वाब रखते हैं। चीन, अफगानिस्तान, अमेरिका, भारत आदि के साथ किस प्रकार के रिश्ते रखना चाहते हैं। पर आगे का सीन तो उनके कुर्सी पर बैठने के बाद ही बनेगा।

मगर भाई लोग हैं कि ख्याली पुलाव को पका-पकाकर उसे पतली दाल सरीखा बना डाला है। यह तो लगभग वही बात हो गई कि शादी अभी ढंग से हुई नहीं कि खुशखबरी सुनने की बेताबी सिर चढ़कर बोलने लगी।

अमां, अगले को अभी ढंग से गद्दी पर बैठने तो दो। कामधाम अपने हाथों में लेने तो दो। ऊंट को पहाड़ के नीचे आने तो दो। प्रधानमंत्री की कुर्सी का पहला-पहला स्वाद चखने तो दो। दो बातें अपनी, चार बातें आवाम की, दस बातें सेना की सुनने तो दो। राजनैतिक और डिप्लोमेटिक मसलों का क्या है, ये तो जन्म-जिंदगी भर के रोग हैं। इनसे छुटकारा पाना नामुमकिन है जनाब।

यों भी, पाकिस्तान का इतिहास गवाह है वहां सरकार या प्रधानमंत्री अपनी मर्जी के नहीं सेना की तानाशाही के गुलाम होते हैं। वहां तो पत्ता भी सेना के आदमियों से पूछे वगैर नहीं हिलता। अब तक जाने कितने ही शासक आए और चले गए परंतु सेना का रुतबा जैसा था वैसा ही रहा।

पाकिस्तान में सरकारें हमारे हिंदुस्तान जैसी लोकतांत्रिक सोच वाली थोड़े न होती हैं। वो तो बस दुनिया को दिखाने भर के लिए होती हैं कि देखो, हमारे यहां भी एक चुनी हुई सरकार है। जबकि उसे चुनता और गुनता कौन है सब जानते हैं।

मैं तो कहता हूं, अच्छा ही हुआ जो इमरान खान पाकिस्तान के कप्तान बन लिए। बहुत लंबे समय से वे इस जुगाड़ में थे भी कि कब वो दिन आएगा जब मैं पाकिस्तान का वजीरे-आलम कहलाऊंगा। अब जाकर आया है वो दिन।

हालांकि इमरान राजनीति की पिच पर बहुत लंबे वक्त से खेल रहे हैं। मगर फिर भी राजनीति की पिच क्रिकेट की पिच से काफी अलहदा होती है। खेल में तो आपको दस-ग्यारह खिलाड़ियों को ही संभालना होता है पर राजनीति की पिच पर तो देश और विदेश के संबंधों को साथ-साथ संभालना पड़ता है। राह कठिन तो है पर है जोरदार। लुत्फ यह है कि नेताओं के तो पांच साल खेल-खेल में कट जाते हैं।

कहने वाले तो यह भी कह रहे हैं कि मियां इमरान खान अपनी शादी, अपने परिवार को तो संभाल न पाए, इतना बड़ा मुल्क क्या खाक संभाल पाएंगे। बड़े ही भोले हैं लोग। समझते ही नहीं। शादी और मुल्क को संभालने में फर्क होता है। शादी के साथ तो हमेशा 'तू नहीं और सही' का ऑप्शन रहता है। किंतु मुल्क के साथ ऐसा सीन नहीं। वहां तो बागडोर एक दफा हाथ से फिसली तो फिर इतनी आसानी से दोबारा हाथ न आती। मियां नवाज शरीफ को ही देख लो, मुल्क की अच्छी-खासी डोर उनके हाथों में थी पर सेना ने उनसे छीनकर इमरान के हाथों में दे दी। और फिर शादी-ब्याह उनका जाति मसला है, किसी को उससे क्या। लोगों हैं लोगों का तो काम ही है कहना।

सुना तो यह भी है कि उनकी तीसरी बीवी ने उनके पाकिस्तान का प्रधानमंत्री होने की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी। सुना है, सियासत के मसलों में इमरान अपनी तीसरी बीवी से सलाह अवश्य लेते हैं। अच्छा है। एक हमारे यहां के पति हैं जो सियासत तो दूर रोमांस पर भी कोई सलाह अपनी बीवियों से न लेते। घोर अन्याय। डर भी बना रहता है न उन्हें।

बहरहाल, जिन्हें शौक है वे मन से इमरान खान पर अपने ख्याली पुलाव पकाने में व्यस्त हैं। चलिए इस बहाने वे कुछ तो कर रहे हैं। खाली तो नहीं बैठे हैं न। खाली दिमाग वैसे भी शैतान का घर होता है। ख्याली पुलाव पकाने में भी थोड़ी-बहुत बुद्धि तो खर्च होती ही है।

बाकी उम्मीद पर दुनिया कायम है ही। इमरान खान से आशा नहीं, उम्मीद ही रखें कि वे सेना के शिकंजे को तोड़ अपने मुल्क के लिए कुछ बेहतर कर पाएं! भारत भी उन पर निगाह और उम्मीद दोनों बनाए रखे है।

सोमवार, 23 जुलाई 2018

दिल मिले न मिले, गले मिलते रहिए

किस्मत वाले होते हैं वो जिन्हें किसी का गले लगना या आंख मारना नसीब होता है। वरना इस मतलबी दुनिया में किसे फुर्सत है, किसी के गले लगने या मौका भांप आंख मारने की।

उन्होंने भी तो उस रोज संसद में यही किया था, भावावेश में जाकर उनके गले ही तो लगे थे। फिर, किसी को एक आंख मार अपना रूतबा जाहिर किया था। मगर लोगों को ये भी नागवार गुजरा। उनके गले लगने और आंख मारने में तरह-तरह के तंज कसे गए। बनाने वालों ने चुटकुले तक बना डाले। ऐसा भी कहीं होता है भला!

देखा भी गया है, तीज-त्यौहार पर तो दुश्मन भी गले मिल लेते हैं। मजाक-मजाक में आपस में आंख भी मार लेते हैं। फिर ये गले मिलना तो छोटे का अपने बड़े के प्रति आदर था। हां, आंख मारने पर पेंच हो सकता है। यह भी तो सकता है कि उन्होंने आंख मारी ही न हो, आंख खुशी के मारे खुद ब खुद दब गई हो।

वैसे, ये आंखें भी न बड़ी चालू चीज होती हैं। आंखों ही आंखों में इशारा कर बैठती हैं। गुस्ताखियां आंखें करती हैं। बदनाम बेचारा इंसान हो जाता है। लोग समझते हैं, ये सब इंसान ने ही अपनी आंखों से जानकर करवाया होगा। उन्हें क्या मालूम आंखें भी मौके की नजाकत देख शरारत कर बैठती हैं।

माने या न माने, गले मिलना और आंख मारना सच्चा सेक्युलरिज्म है। गले और आंखें यह नहीं देखतीं सामने वाली की जात या धर्म क्या है। वे तो प्यार-मोहब्बत में यकीन करती हैं। वो तो हम लोग हैं, जो अपनी निजी खुन्नस की खातिर उन्हें खलनायक बना डालते हैं।
कहते रहिए, वो उनके गले पड़े थे पर हकीकत तो यही है कि वे उनसे गले मिले थे।

मैं तो अब तक इस उम्मीद में रहता हूं कि काश! ऐसे ही कोई मुझसे भी गले मिले। या सरे-राह आंख ही मार दे।

बड़े मतलबी हो गए लोग, गले मिलने को भी सियासत से जोड़ने लगे हैं। आंख मारने को बेइज्जती से। पीठ पीछे खंजर भोंकने से तो कहीं बेहतर है सामने रहकर गले मिलना।

उनका गले मिलना लंबे समय तक याद रखा जाएगा। जो याद नहीं रखना चाहेंगे वे भूल ही करेंगे। दिल मिले न मिले, गले मिलते रहिए।

रविवार, 22 जुलाई 2018

गले मिलना, आंख मारना : सियासत का एक रंग

अविश्वास प्रस्ताव को गिरना ही था, गिर गया। अब तक जिद के आगे जीत सुनते आए थे, इस दफा जिद के आगे हार देख ली। हार भी कोई ऐसी-वैसी नहीं, तगड़ी वाली। लेकिन गिरने या हारने का उन्हें कोई अफसोस नहीं। वे उनके चीख-पुकार युक्त भाषण में फिलहाल अपनी जीत देखकर ही मुतमईन हैं।

देश का बुद्धिजीवि वर्ग भी उन्हें सुन गद-गद है। वे भी उनके भाषण में कथित बोल्डनेस के तार जोड़ने में लगे हुए हैं। चूंकि हम एक लोकतांत्रिक मुल्क हैं, इस नाते हर कोई स्वतंत्र है अपनी खुशी, अपना विरोध चुनने-जताने के लिए।

मुझे तो ऐसा लगता है, भाषणबाजी तो महज बहाना थी, असली मकसद झप्पी और आंख मारने में निहित ही था। यों तो हम बहुत-सी झप्पीयां देखते आए है, पर ये झप्पी 'शुद्ध राजनीतिक' थी। अगर राजनीतिक न होती तो झप्पी के तुरंत बाद आंख भी न मारी जाती। किंतु, ये वो वाली आंख नहीं मारी गई थी, जिसमें स्नेह और अपनापन समाया होता है। जिसमें एक आंख मारने पर ही पटने-पटाने के हाव-भाव छिपे होते हैं। जिसमें अंखियों से गोली चलती हुई प्रतीत होती है। और, जिस एक आंख मारने की घटना ने पिछले दिनों सोशल मीडिया पर अभूतपूर्व तहलका मचा दिया था।

जिस तत्परता के साथ आंख को मारा गया था, स्वयं आंख को भी उम्मीद न रही होगी। आंख ने झपक जाने के बाद सोचा तो अवश्य होगा कि हाय! ये मैंने क्या किया? आंखें अमूमन बहुत भोली होती हैं, उन्हें तो यह तक पता नहीं रहता कि इंसान कब किस पल उनसे क्या काम ले लेगा। चाहे अच्छे में या मजबूरी में, बदनाम आखिर आंखों को ही होना पड़ता है। इस बार भी हुईं।

फिलहाल उनकी झप्पी और आंख मारने के अलग-अलग सियासी मतलब निकाले जा रहे हैं। बात एक छोर से निकल, दूसरे छोर तक दूर बहुत दूर तलक जाने लगी है। कुछ कह रहे हैं, ऐसा भी भला होता है कहीं, तो कुछ ड्रामा बता रहे हैं। ये तो दुनिया है, यहां हर कोई कुछ भी कहने-बोलने को आजाद है। लेकिन नेता मंडली खुश नजर आ रही है। प्रस्ताव का गिरना या उठे रहना उनके लिए इतना बड़ा मुद्दा नहीं, वे तो 2019 की चौसर पर अपने-अपने दलों के भविष्य का अनुमान लगाने में व्यस्त हैं।

जनता उतना भोली भी अब नहीं रही, जैसे पहले कभी नजर आती थी। उसने आक्रामक भाषण को भी खूब समझा। झप्पी और आंख मारने के भी मजे लिए। भाषण पर होने वाली विकट हंगामेबाजी भी उसकी निगाह से छिपी नहीं। उसे अच्छे से मालूम है, कि गड्ढा कहां है। और पानी कहां भरा हुआ है। चुनाव युक्त वादे और जुमले उसे अब मनोरंजन का साधन मात्र लगते हैं। इसलिए तो वो खुद खामोश रहकर नेताओं को चीखने-चिल्लाने का मौका देती है। उसका उत्तर तो वोट में छिपा है।

कभी-कभी तो ऐसा लगता है, जब जनता के पास विकल्प नहीं होता तो वो किसी को भी गले लगा लेती। फिर, पांच साल तक निभाती है। झेलती है। यही होता है, गले लगाने और गले पड़ने का हश्र। कोई जरूरी नहीं जो गले लगा हो वो आपका हमदर्द ही हो। हो सकता है, जान कर गले पड़ रहा हो ताकि आपस में गलबहियों की गुंजाइश बनी रहे।

जिस तरह वे उनके करीब आ कर गले लगे, मानो दिल खिले। अब कितने खिले या नहीं खिले ये तो उनके दिल ही बता सकते हैं। पर सियासत में कभी-कभार ऐसे गले आपस में मिला लेने चाहिए। ताकि गलों को भी ये भरोसा रहे कि वे सिर्फ कटने के लिए ही नहीं होते।

इस झप्पी, आंख और गले मिलन के सीन को देखने के बाद सोच रहा हूं, मुझे भी अपने भीतर थोड़ा सुधार लाना चाहिए। किसी से दिल मिले न मिले हां गला अवश्य ही मिलाते रहना चाहिए। हर्ज तो आंख मारने में भी कुछ नहीं पर वो सीधी जगह जाकर ही लगे इस पर भरोसा बैठाना थोड़ा मुश्किल है।

कुछ भी कहिए, सियासत बहुत खूबसूरत शै है। अच्छा या खराब लगने की यहां अधिक टेंशन नहीं। दुनियादारी का झंझट नहीं। जनता को दिखाने के लिए दुश्मन हैं पर अंदर झप्पी और पप्पी की जगह बनी रहती है। गले मिलकर आंख मारने की छूट भी सियासत में ही संभव है। वरना ऐसा आम जिंदगी में करके देखिए कभी, दिन में चांद-सितारे न नजर आ जाएं तो कहिएगा।

कोई मलाल नहीं अविश्वास पर विश्वास कायम न हुआ। घर बैठे जो मनोरंजन हुआ उसे तो इतिहास भी याद रखेगा हमेशा। गर्व करिए कि देश के नेता न केवल अपने भाषणों से बल्कि झप्पी और आंख से भी खुद को कूल और जनता को बेफिक्र रखना जानते हैं।

सियासतदां सबकुछ साधना जानते हैं। वो तो हमारी ही बेचारगी है, जो उनकी तिकड़मों को समझ नहीं पाते। अगर समझ भी लें तो भी क्या।

सोच रहा हूं, उनकी तरह झप्पी और आंख मारने का एक प्रयोग मैं भी करके देख ही लूं शायद बरसों से बिगड़ी बात अब बन जाए। न बन पाई तो यह मानकर संतोष कर लूंगा- तुमसे न हो पाएगा बेटा।

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

हर कोई थूक रहा है

किसी वक़्त मुझे थूक और थूकने वालों से बहुत चिढ़ होती थी। किसी को भी थूकते देख दिमाग भन्ना जाता और दिल भीषण घृणा से भर उठता था। जी तो करता अभी उस बंदे का गिरेबान पकड़ उसके गले में जितना थूक जमा है अपनी उंगलियां डाल सब निकाल लूं। न आंगन टेढ़ा होगा। न राधा नाचेगी।

मतलब हद होती है, जहां जिसको स्पेस मिलता नहीं कि या तो थूक लेता है या फिर मूतने खड़ा हो जाता है। मानो हर सड़क, हर दीवार पर उनके बाप-दादाओं की हुकूमत चल रही हो! हम एक लोकतांत्रिक मुल्क है पर इसका यह अर्थ तो नहीं कि हमने अपने थूक को भी स्वतंत्र कर रखा है। जिधर मन किया आ...क... थू कर दिया। सभ्यता नाम की भी कोई चीज होती है जनाब। लेकिन थूक वीरों को सभ्यता-संस्कृति से क्या सरोकार। कभी-कभी तो उन्हें थूकता देख ऐसा फील होता है, मानो- ईश्वर ने उन्हें धरती पर उतरा ही केवल थूकने और थूकते रहने के लिए है।

जबकि और देशों में ऐसा नहीं है। वहां आप सड़क चलते कभी थूक कर देखिए। तुरंत चालान हो जाएगा। इंसान तो दूर वहां तो कुत्ता भी यों ही सड़क पर हगने से घबराता है। आखिर वे साफ-सफाई पसंद लोग हैं।

मगर हमारे यहां का तो सीन ही उल्टा है। यहां तो आप न थूकने वाले को, न मूतने वाले को, न कूड़ा फेंकने वाले को, न अपने कुत्ते को बीच सड़क हगाने वाले को टोक ही नहीं सकते। दो सेकंड में दोनों तरफ से तलवारें खींच आती हैं। बड़े ही बिंदास अंदाज में न केवल मां-बहन बल्कि पुरखों तक को याद फरमा लिया जाता है। बात बढ़ते-बढ़ते राजनीतिक रसूख तक आ पहुंचती है। मामला कोर्ट-कचहरी में भी आ लेता है।

तो भला ऐसी विकट स्थिति में कौन किसको थूकने से कह या मना कर सकता है! थूकने को तो हमने 'अभिव्यक्ति की आजादी' सरीखा बना लिया है। हमारे आस-पास की रंग-बिरंगी दीवारें इस आजादी की दास्तान स्वयं कहती हुई मिल जाएंगी।

वो दफ्तर, सरकारी या गैर-सरकारी, ही क्या जिसकी दीवारों पर पीक की कलाकृतियां न मिलें। आलम यह है, थूक वीर अपने थूक से दीवारों को इतना सजा देते हैं कि कभी-कभी तो वो पहचान में ही नहीं आ पातीं कि दीवारें हैं या पीकदान...!

मैं तो सोचता था कि थूका-थाकी के दीवाने सिर्फ मेरे ही शहर में हैं। मगर थूकने वालों की सभ्यता के दर्शन मैंने तो मुंबई में भी साक्षात किये हैं। आर्थिक राजधानी की दीवारें भी थूक के असर से बेअसर नहीं।

मेरे जैसे चंद 'थूक ना-पसंद' लोगों को थूक देखकर बेशक जलन होती हो पर थूकने वाले हर जलन से बे-फिक्र होते हैं। कहीं भी  थूककर उन्हें लगता है जैसे उन्होंने थूककर वहां अपने थूक की नाल गड़ दी हो। कभी पान-मसाला खाए बंदे को थूकते देखिए...। उसके मुंह से निकली पान की पीक कब किसके कपड़े रंग दे खुद उसे भी यह एहसास न रहता। न जाने कितनी दफा इस रंगत का सुख मेरे ही कपड़े भोग चुके हैं। मगर इस पाप के लिए अगले पर गुस्सा होने का तो मुझे नैतिक अधिकार ही नहीं। क्योंकि उसका एक 'सॉरी भाईसाहब' हर पाप पर भारी है।... कुछ ऐसे शालीन लोग भी मुझे मिले हैं, जो मुझ पर थूकने के बाद मुझी से रूमाल मांग मेरी शर्ट पोंछ चुके हैं। उनकी शालीनता देख वैसे ही मेरा गला भर आता है, उन पर गुस्सा होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।
कबीरा इस संसार में भांति-भांति के थूक-वीर...।

विडंबना देखिए, कूड़े-कचरे पर सख्ती, साफ-सफाई पर बड़ी-बड़ी बातें खूब हो रही हैं। स्वयं प्रधानमंत्री जी और राज्य सरकारें भी स्वच्छता मिशन में जी-जान से जुटी हुईं हैं। स्मार्ट सिटी का दर्जा पाने के लिए शहर संघर्षरत हैं। परंतु थूक-वीर सबसे बेखबर बस थूके ही जा रहे हैं। उनके ठेंगे से आप कूड़ा सड़क पर फैलाएं या डस्ट-बीन में डालें। उन्हें तो कहीं भी थूकने से मतलब। समझ नहीं आता, सरकार ने थूक और थूकने वालों को क्यों स्वच्छता अभियान से दूर रखा है!

कहा तो यह भी जाता है कि 'इंसान को अपना गुस्सा थूक देना चाहिए।' थूकने वाले जगह-जगह थूककर कहीं इसी कथन का तो पालन नहीं कर रहे? थूकने वालों में हो सकता है कुछ ऐसे बाशिंदें भी हों जो पान-मसाले के बहाने अपना गुस्सा थूककर बाहर निकालते हों!  इसीलिए वे कहीं भी थूकने से डरते न हों! शायद इसी गुस्से के कारण उनके मुंह में थूक की मात्रा ज्यादा बनती हो!... यह भारत है। यहां कुछ भी हो सकता है। मेरे विचार में यह गहन शोध का विषय है।

लेकिन अब सोच रहा हूं, थूकने वालों के प्रति मैं अपना नजरिया थोड़ा बदलूं। नाहक ही उन पर नाराज होने या चिढ़ने से कोई फायदा नहीं। खामखां, अपनी एनर्जी को क्यों वेस्ट करना। बैठे-ठाले क्यों किसी से पंगा लेना? हो सकता है, उनके थूकने के पीछे बड़े कारण रहे हों! यों भी, कोई शौकिया तो थूकेगा नहीं यहां-वहां!

चलिए। छोड़िए। इस बेतुकी बहस को। और भी गम हैं दुनिया में थूक के सिवा!

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

स्मार्टफोन न खरीद पाने का दुख

यों तो ऊपर वाले का दिया मेरे पास सबकुछ है, बस स्मार्टफोन ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि मैं स्मार्टफोन खरीद नहीं सकता। खरीद सकता हूं, लेकिन खरीदता इसलिए नहीं क्योंकि स्मार्टफोन मेरे लिए 'अशुभ' है!

पिछले दिनों शहर के एक ऊंचे ज्योतिष ने- मेरे ग्रहों के बर्ताव को देखते हुए- मुझे हिदायत दी कि मैं स्मार्टफोन न ही रखूं! यह मेरी सेहत और व्यवहार के वास्ते विकट अशुभ साबित हो सकता है! उन्होंने यह भी बताया- इसका असर मेरे जीवन पर तकरीबन दस साल तक बना रहेगा।

इस अशुभता से निजात पाने का जो उपाय उन्होंने बताया वो मेरे तईं कम से कम इस जीवन में तो कर पाना संभव नहीं। उपाय यह है कि हर हफ्ते शनिवार के दिन मुझे अपनी पत्नी से लड़ाई करनी होगी! पत्नी से लड़ लेने का मतलब आप समझते हैं न। अंधे कुएं में छलांग लगाने से क्या हासिल!

इसलिए चाहते हुए भी मैं स्मार्टफोन नहीं खरीद सकता।

बिन स्मार्टफोन के मेरी जेब और लाइफ तकरीबन खाली-खाली सी लगती है। इस दर्द को केवल मैं ही समझ सकता हूं। कई दफा दिल में उचंग उठती है कि ग्रहों की बंदिशों को धकिया कर अभी बाजार जाऊं और एक बढ़िया-सा स्मार्टफोन खरीद लूं। मगर नहीं खरीदता। कल को कहीं ग्रहों में ऊंच-नीच हो गई तो सारा दोष मेरे माथे ही मढ़ दिया जाएगा।

स्मार्टफोन का न होना मेरे लिए दुनिया के तमाम दुखों से कहीं बड़ा दुख है। कभी-कभी तो इस वहज से मैं ऑफिस और नाते-रिश्तेदारियों में होने वाले फंक्शन में भी नहीं जाता। क्या भरोसा कोई पूछ ही बैठे, आपके पास स्मार्टफोन नहीं है क्या? तब मेरे पास आसमान को ताकने के सिवाय कोई और रास्ता न होगा!

आप यकीन नहीं करेंगे, मेरे तो ऑफिस-बॉय के पास भी स्मार्टफोन है! अक्सर ही वो मुझे मेरे पास स्मार्टफोन न होने का अहसास कराता रहता है।

स्मार्टफोन पास होता है तो मन और जीवन में एक आत्मविश्वास-सा बना रहता है। दुनिया वालों पर एक ठसक सी कायम रहती है, सो अलग।

वाकई बड़े खुशनसीब हैं वे लोग जो स्मार्टफोन रखते हैं। सुना है, स्मार्टफोन रखने वालों के सितारे कभी गर्दिश में नहीं आते! जिसके पास स्मार्टफोन होता है, दुनिया उसे उसी तरह झुककर सलाम ठोकती है, जैसे पहले कभी मारुति-800 रखने वालों को ठोका करती थी।

समाज के बीच अपने स्टेटस को बनाए रखने के लिए इंसान क्या-क्या नहीं करता।

ग्रहों और ज्योतिष महाराज के मुताबिक अभी मुझे दस साल स्मार्टफोन के लिए इंतजार करना होगा। दस साल में दुनिया-समाज जाने कहां से कहां पहुंच जाएगा। यहां तो एक पल में ही टेक्नोलॉजी के भीतर-बाहर कितना कुछ बदल जाता है।

इस बात की भी क्या गारंटी है कि दस साल तक मैं इस धरती पर बना ही रहूं! लाइफ की कोई वेलिडिटी न होती प्यारे।

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

जल्द ही मैं भी अपना लक पहनकर चल सकूंगा

मैं कई दिनों से इस कोशिश में लगा हूं कि अपना लक पहनकर चल सकूं। लेकिन लक है कि मेरे खांचे में ही नहीं आ पा रहा। जबकि लक की जरूरत के मुताबिक मैंने अपना आकार-प्रकार भी घटा लिया है। बात फिर भी बन नहीं पा रही।

बार-बार दिल में यही ख्याल आता है कि मेरा लक दूसरों के लक से भिन्न क्यों है? भाग्य (लक) जब सबका साथ देता है तो मेरा क्यों नहीं दे रहा?
आप यकीन नहीं करेंगे। अपने लक को मनाने की खातिर मैंने 14 बुधवार के व्रत और 5 शनिवार की पूजा तक निपटा डाली है। अपनी नास्तिकता की प्रवृत्ति को आस्तिकता में तब्दील कर लिया है। मेरे भीतर इस धार्मिक परिवर्तन को देख घर वाले भी खासे आश्चर्यचकित हैं। सब कह रहे हैं कि ये मुझे हुआ क्या है? हालांकि मैं किसी के कहने-सुनने पर ध्यान नहीं देता। मुझे जो करना होता है, करता हूं।

आसपास के लोगों को जब मैं उनके पहने हुए लक के साथ चलता देखता हूं तो मन में भीषण ग्लानि-सी पैदा होती है। अपने-अपने लक के साथ लोग बड़े ही खुश नजर आते हैं। उनका जीवन मुझे अपने से ज्यादा सरल दिखाई देता है। आज लक का दिया उनके पास सबकुछ है। मेरे पास क्या है? ले देके एक उम्मीद। अब उम्मीद पर भी दुनिया या लक कहां कायम है! समय साथ सब बदल चुका है।

बताते हैं, मेरे लक में बचपन से ही खटाई पड़ी हुई है। जब मैं हुआ था, तब हस्पताल में बाढ़ आ गई थी! सूरज का रंग पीले से सिलेटी पड़ गया था! हवा उल्टी दिशा में बहने लगी थी! तब मुझसे अधिक मेरे लक (भाग्य) को कोसा गया था। यहां तक की डॉक्टर साहिब ने भी कह दिया था कि ये बच्चा बड़ा होकर बेहद अन-लक्की लेखक साबित होगा। देखिए, सबूत सामने है।

अपना लक अपने खिलाफ भी हो सकता है, यह मैंने खुद पर पड़ी तब जाना।

ऐसा भी नहीं है कि मेरी मेरे लक से बहुत बड़ी-बड़ी ख्वाहिशें हों। मुझे तो सिंपल उसे पहनकर चलना है। दुनिया को बताना है कि मैं भी अपना लक पहनकर चलने की हैसियत रखता हूं। उस पर भी मेरे साथ इतना भेदभाव। यह तो ठीक नहीं है।

अरे, लोग तो जाने क्या-क्या पहनकर चलते हैं। उसमें भी जाने कितना चोरी और उधार का शामिल होता है। मगर उनका लक तो उनसे खफा नहीं होता। तो मेरे लक को मुझसे ही क्या प्रॉब्लम है?

मेरा लक कहीं मतलबी तो नहीं हो गया है? हालांकि यह मेरी महज खामख्याली है। पर कभी-कभी न चाहते हुए भी अपने लक पर शक करना पड़ता है। शक करना तो वैसे भी मानव-प्रवृत्ति है। जाने कितने ही घर शक की आग में भस्म हो गए। फिर भी, मनुष्य ने शक पर विश्वास रखना बंद नहीं किया। तो मैं कौन-सा नया काम कर रहा हूं? किसी और के नहीं खुद के लक पर ही तो शक कर रहा हूं। हो सकता है, इसी से मुझे मानसिक शांति मिल जाए।

जो भी हो लेकिन मुझे इस बात का भी पक्का यकीन है कि एक दिन मैं अपने लक को खुद के फेवर में पटा ही लूंगा। औरों की तरह मैं भी अपना लक पहनकर चल सकूंगा। तब मुझे खुद पर शर्म भी नहीं आएगी।

फिलहाल, इस करिश्मे के इंतजार में हूं।

सोमवार, 9 जुलाई 2018

मेरे मरने के बाद...

जीते-जी इस बात का पता लगाना बेहद मुश्किल है कि ये दुनिया, समाज और नाते-रिश्तेदार आपके बारे में क्या और कैसा सोचते हैं। ये सब जानने के लिए आपको मरना पड़ेगा। क्योंकि इंसान की सामाजिक औकात का पता उसके मरने के बाद ही लगता है।

तो, एक दिन मैंने भी यही सोचा क्यों न मर ही लिया जाए। यों भी, जिंदा रहकर मैं कौन-सा अपने चमन को गुलजार कर रहा हूं। मरूंगा तो कम से कम चार लोग मेरी खैर-खबर तो लेंगे। मेरे बारे में दो बातें बुरी तो पांच अच्छी भी बोलेंगे। यमराज की भी एक दिन की दिहाड़ी पक्की हो जाएगी।

मौका पाते ही एक रोज मैंने अपने मरने की खबर वाइरल करवा दी। खबर एक घर से दूसरे घर कम, फेसबुक-व्हाट्सएप पर अधिक दौड़ी। जिसने सुना लगभग हिल-सा गया। अभी उम्र ही क्या थी...के जुमले फिजाओं में तैरने लगे। मेरे जाने को व्यंग्य लेखन का बहुत बड़ा नुकसान बताया गया। फेसबुक पर मेरे लिखे व्यंग्य टांगे जाने लगे। मुझ पर पोस्टें भी लिखी गईं। व्हाट्सएप पर मुझे धीर-गंभीर टाइप श्रद्धांजलि भी दी गई।

ये सब तो खैर सोशल मीडिया पर चलता रहा। आदमी का चरित्र सोशल मीडिया पर कुछ और जमीन पर कुछ और ही होता है।

जमीन पर मेरे खर्च होने की जमीनी हकीकत यह रही कि सब अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त रहे। मेरे मरने की खबर को 'आम खबर' की तरह ही लिया गया। दो-चार लेखक लोग मेरे घर मुझे 'अंतिम सलाम' कहने पहुंचे। दो-चार मिनट मेरे सिरहाने भी बैठे। एक ने तो आपसी खुसर-पुसर में यहां तक कह डाला- 'अच्छा ही हुआ जो महाराज निपट लिए। अखबार में कम से कम एक जगह, एक दिन तो खाली हुआ। वरना, तो जब तक रहा अखबार के कॉलम पर अपना हक जमाए रहा।'

दूसरे ने पहले वाले कि हां में हां मिलाते हुए कहा- 'ठीक फरमाया यार। व्यंग्य की बहुत बड़ी चिरांद था ये। खुद को शौकत थानवी और लतीफ घोंगी से कम नहीं समझता था। जबकि आता-जाता इसे व्यंग्य का 'व' तक नहीं था।' व्यंग्य लेखन पर बोझ थे मियां। तीसरे ने नुक्ता जोड़ा।

मैं अपने भूतपूर्व साथी लेखकों की अपने बारे में जाहिर की जा रही राय को सुन मन ही मन खुश हो रहा था। खुद को दुआएं भी दे रहा था कि अच्छा हुआ मुझे मेरी लेखकीय औकात का अहसास करवा दिया साथी लोगों ने। वरना तो मैं अपने को जाने क्या माने बैठा था।

मरने के बाद अमूमन आदमी को अपनी तारीफें ही सुनने को मिलती हैं मगर मैं लक्की रहा कि मुझे अपनी बुराइयां सुनने को मिलीं। बुरा बनकर रहने में भी सुख है। पर ये सुख हर किसी के नसीब में नहीं आ पाता।
एक बात मुझे और भी पसंद आई कि मेरे जाने के बाद न अखबारों में मेरे ऊपर कोई लेख ही आए न पत्रिकाओं ने मुझ पर केंद्रित अंक ही निकाले। अगर आ जाते तो ऊपर वाले को अपने लेखकीय चरित्र का स्पष्टीकरण देना मेरे तईं बड़ा कठिन पड़ता।

वैसे, बतौर लेखक मरने में हजार झंझट हैं। लोगबाग लेखक को बुद्धिजीवि समझ सेंटी टाइप हो जाते हैं। जबकि हकीकत यह है कि लेखक बुद्धिजीवि नहीं होता। सिर्फ अपनी बुद्धि की कमाई खाता है।

अगर आप भी लेखक हैं तो एक दफा मरकर जरूर देखिए। लोगों के भीतर छिपे, आपके बारे में, सारे सच पता चल जाएंगे।

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

देख लेना, गिरकर फिर उठेगा रुपया

गिरना एक स्वभाविक प्रक्रिया है। कुछ मैदान-ए-जंग में गिरते हैं तो कुछ मैदान-ए-बाजार में। गिरकर जो उठ या संभल नहीं पाते, दुनिया उन्हें बहुत जल्द भूला देती है। जैसे- शेयर बाजार के जाने कितने ही शेयर। आज उन शेयरों का अता-पता तक नहीं। एक बार गिरे तो कभी उठ ही न सके।

यह भी उतना ही सत्य है कि गिरने वाले की हंसी अवश्य बनाई जाती है। उस पर हंसकर उसे इस बात का एहसास कराया जाता है कि तूने गिरकर कितना बड़ा 'अनर्थ' कर डाला। फिर भी, होते है कुछ ऐसे लोग जो अपने गिरने का जबाव खीझकर नहीं बल्कि खुद को साबित कर देते हैं। जैसे- खेल के मैदान पर इस बात को जाने कितनी ही दफा सचिन तेंदुलकर और महेंद्र सिंह धोनी ने सिद्ध भी किया है।

हाल-फिलहाल तो गिरावट का संकट रुपए पर आन पड़ा है। रुपया गिरकर 69 पर अटक गया है। डॉलर ने रुपए को भरे बाजार पटखनी दे डाली है। गिरे रुपए का मजाक बनाया जा रहा है। कोई सोशल मीडिया पर चुटकले खींच रहा है तो कोई बाजार में बत्तीसी फाड़ रहा है। मंदड़िये रुपए के फिसलने पर खुश हैं तो तेजड़िये दुखी।

मगर रुपया स्थिर है। वो अपनी हंसी बनाने का बुरा नहीं मान रहा। उसे मालूम है कि यह गिरावट आंशिक है। गिरकर वो फिर से उठेगा। डॉलर को ईंट का जबाव पत्थर से देगा।

इससे पहले भी तो जाने कितनी दफा रुपया गिरा है। किसी ने संभाला नहीं, खुद ही संभला है। रुपया बहुत समझदार है। उसे अच्छे से मालूम है कि देश की अर्थव्यवस्था का दारोमदार उसके कंधों पर टिका है। वो गिरा-पड़ा रहेगा तो आर्थिक ढांचा ही गड़बड़ा जाएगा।

रही बात उसके लुढ़कने पर हंसने वालों की तो ये वही लोग हैं जो अपनी हंसी हंसते और दूसरे की हंसी पर रोते हैं। इनकी फिक्र रुपया नहीं करता।

रुपए को मैं अपनी प्रेरणा मानता हूं। उसके गिरकर उठने के जज्बे को सलाम करता हूं। ऐसा साहस बहुत कम लोगों में होता है। अपने इसी साहस के दम पर ही तो रुपया बाजार में अब तलक टिका हुआ है।

रुपया बरेली के बाजार में गिरा झुमका थोड़े है कि उठे ही न।

सोमवार, 2 जुलाई 2018

बुरा मानने वाले

ऐसे लोग मुझे बेहद पसंद हैं, जो बुरा मानते हैं। या कहूं, धरती पर जन्म ही उन्होंने बुरा मानने के लिए लिया होता है। वे इसी खुशफहमी में डूबे रहते हैं कि यह दुनिया टिकी ही उनकी बुरा मानने की आदत पर है। वे अगर बुरा नहीं मानेंगे तो विश्वभर की तमाम बुरी आत्माओं का भविष्य खतरे में आ जाएगा।

उनके बुरा मानने का कोई विषय या मुद्दा निर्धारित नहीं होता। किसी भी बात का बुरा मान सकते हैं। यों भी, बुरा मानने या जुबान चलाने में कभी एक नया पैसा खर्च नहीं करना होता।

बुरा मानने का तो ये है कि आप नल में पानी न आने से लेकर पक्षी के सिर पर हग देने तक का बुरा मान सकते हैं। हालांकि इन दोनों घटनाओं के घटने पर जोर किसी का भी नहीं है, तो क्या, उनको तो बुरा मानने से मतलब। कई बुरा मानने वाले मैंने तो ऐसे भी देखे हैं, जो अक्सर अपने जन्म लेने को ही बुरा मानते हैं। कहते हैं, जन्म लेकर जीवन की बहुत बड़ी गलती कर दी।

उन्हें समझाना बेकार है क्योंकि बुरा मानने को वे अपना लोकतांत्रिक हक मानते हैं।

सुन या देखकर ऐसा लगता जरूर है कि बुरा मानना बेहद सरल विधा है। किंतु ऐसा है नहीं। हर बात पर बुरा मानने के लिए आपको दिल से ज्यादा दिमाग को मजबूत करना होता है। काम सिर्फ बुरा मानने से ही नहीं चल जाता। डिपेंड यह करता है कि आप किस बात का कितनी देर या कितने लंबे समय तक बुरा मानते हैं। कुछ क्षणिक भर को बुरा मानते हैं तो कुछ जन्म-जिंदगी भर बुरा माने रहते हैं। बुरा माने रहने में धैर्य बहुत बड़ी भूमिका निभाता है।

निजी और सामाजिक जीवन में जब से सोशल मीडिया का असर बढ़ा है, लोगों की बुरा मानने की आदत में भी खासा इजाफा हुआ है। जहां तक मेरा अंदाजा कहता है, सोशल मीडिया पर तकरीबन अस्सी प्रतिशत लोग किसी न किसी बात पर बुरा मान ही जाते हैं। कभी-कभी तो मामला कोर्ट-कचहरी तक भी खींच जाता है।

बर्दाश्त करना क्या होता है, इस पर तो सोशल मीडिया पर बुरा मानने वाले वीर विचार करना ही पसंद नहीं करते। मानो- जब तक वे किसी बात का बुरा नहीं मान जाएंगे, उनका खाना हजम नहीं होगा।

गाहे-बगाहे मैं भी कोशिश करता रहता हूं बुरा मानने की लेकिन अभी वो बात मुझमें नहीं आ पाई है। मगर लगा हुआ हूं। एक दिन मैं भी बुरा मानने का हुनर सीख ही लूंगा। किसी और लाइन में भले ही नाम न कर पाऊं, बुरा मानने में तो कर ही लूंगा।

अच्छे और भले लगते हैं मुझे वे लोग जो अपने बुरा मानने को दिल में नहीं रखते। बाहर निकाल देते हैं। जमाना ही कुछ ऐसा हो चला है, जो जितना बुरा मानेगा, वो उतना ही बड़ा साहसी कहलाएगा।