बुधवार, 6 जून 2018

फ्लिपकार्ट का बिकना

जब भी किसी को बिकते देखता हूं तो खास आश्चर्य नहीं होता। सोचता हूं, अगले में बिकने का गुण रहा होगा, इसीलिए तो बिका। वरना, इस घोर प्रतिस्पर्धा के समय में बिकना-बिकाना इतना आसान कहां।
मैं तो जब आईपीएल के खिलाड़ियों को बिकते देखता हूं तो यह हौसला मन में जगा रहता है कि बिकना इतना बुरा भी नहीं अगर ठीक-ठाक पैसे मिल रहे हों।

इसीलिए फ्लिपकार्ट ने ठीक किया वालमार्ट के हाथों बिक कर। खुद की मेहनत पर खड़ी की दुकान बंद करने से तो बेहतर था कि उसे बेच दिया जाए। जब बिजनेस की झोंक खुद से न संभल पा रही हो तो उसका तियां-पांचा कर ही देना चाहिए।

मगर फ्लिपकार्ट के बिकने पर देश का बुद्धिजीवि वर्ग बड़ा परेशान है। उनकी परेशानी को सुनकर लग तो ऐसा रहा है मानो- उनके बेटे की दुकान बिक गई हो! जबकि खुद बड़े आराम की जिंदगी बसर कर रहा है देश का बुद्धिजीवि वर्ग। सिवाय हर मुद्दे पर गाल बजाने और जुबान चटखाने के कोई खास काम उनके कने नहीं होता।

कह रहे हैं, फ्लिपकार्ट का बिकना देश को विदेशी पूंजीवाद के हाथों गिरवीं रख देने जैसा है। सरकार धीरे-धीरे कर देश के उद्योग-धंधों को विदेशी कंपनियों को सौंप रही है। पहली बात तो यह है कि फ्लिपकार्ट ने बिकने का फैसला खुद से किया है, सरकार का इस डील में कोई रोल ही नहीं बनता। और फिर ऐसा कौन-सा धंधा है, जहां विदेशी हस्तक्षेप नहीं है। खाने से लेकर जीने तक हर कहीं विदेशी आइटम्स का दबदबा है। पूंजीवाद का विरोध तो महज दिखावा है। बुद्धिजीवि खुद अंदर से कितना पूंजी में डूबे हुए हैं, सब जानते हैं।

वैसे, जब भी देशी कंपनियों को विदेशियों के हाथों बिकते देखता हूं तो यही सवाल मन में आता है कि हम भारतीयों को बाजार की मांग के मुताबिक चलना नहीं आता। कस्टमर्स का टेस्ट कंपनियां जान नहीं पातीं। जबकि अपना माल बेचने में विदेशी हमसे कहीं अधिक चालक और तेज होते हैं। अगर यह सच न होता तो मोबाइल मार्केट में चाइनीज फोनों की धूम न होती।

खैर, फिर भी दो बंदों ने फ्लिपकार्ट को इतने लंबे समय तक अपने दम पर टिकाए रखा बड़ी बात है। बाद में जब कंपनी हाथ से फिसलने लगी तो बेच दी। बिल्कुल ठीक किया। फिसलने से पहले संभल जाने में ही तो समझदारी है।

बिकना-बिकाना खुद को मार्केट में बनाए रखने के फंडे हैं। आज के दौर में कामयाब भी वही है जो खुद को ऊंचा बेच सके। चाहे खिलाड़ी हो या कलाकार या फिर लेखक ही क्यों न हो। अंटी में आता पैसा किसे बुरा लगता है जनाब।

मुझसे तो कोई आकर कहे कि मैं आपके लेखन को खरीदना चाहता हूं, मैं तो हंसी-हंसी स्वीकृति दे दूंगा। खरीद ले। पर पैसा मस्त दियो। पैसा ही जीवन का अंतिम सत्य है। बाकी सब हवाबाजी है महाराज।

खैर, जिसे बिकना था वो बिक गई। जिन्हें पूंजीवाद को गरियाना है, गरियाते रहें। मुनाफा पहले है। जज्बातों का कोई अचार थोड़े न डालना है उम्रभर। क्या समझे।

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