गुरुवार, 28 जून 2018

सपनों का न आना

मुझे सपने नहीं आ रहे। सपनों के न आने से मैं खासा परेशान हूं। पूरा दिन इसी सोच-विचार में निकल जाता है कि आखिर क्या कारण है, जो सपनों ने मुझसे किनारा कर लिया है।

सपने न आने की समस्या जब भी पत्नी या यार-दोस्तों के समक्ष रखता हूं तो यह कहकर मुझे टाल देते हैं कि 'अच्छा है जो तुम्हें सपने नहीं आ रहे। आजकल के वक्त में सपनों का न आना ही बेहतर।' मगर उन्हें मैं यह कैसे समझाऊं कि सपनों का न आना मेरे लिए सही नहीं है। सपनों से मुझे उतना ही प्यार है, जितना एक मां को अपने बच्चों से होता है।

सपने मेरे जीवन का आईना हैं। इस आईने में मैं वो सबकुछ देख पाता हूं, जो मुझे हकीकत में कहीं नजर नहीं आता। मुझे अपने पागलखाने में होने का अहसास सपने में ही तो हुआ था। मैं तमाम पागलों के बीच उनसे जिंदगी के असली मायने समझ-जान रहा था। उनसे बात करके कभी लगा ही नहीं कि वे पागल हैं। बल्कि मुझे तो यह दुनिया, यह समाज उनसे कहीं अधिक पागल नजर आया। मंटो में भी तो इस दुनिया को पागलखाना कहा था।

लोगों और दुनिया के पागल होने के प्रति मेरी धारण इससे भी और मजबूत होती है, जब वे यह कहते हैं कि इंसान को सपने आना उसके पागलपन की निशानी है। उन्हें क्या मालूम इस पागलपन में कितना सुकून है। वो इंसान ही क्या जिसे सपने नहीं आते।

या, कहीं ऐसा तो नहीं मुझे सपने मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल करने के कारण न आते हों? कहीं मोबाइल और सपने के बीच छत्तीस का आंकड़ा तो नहीं? मोबाइल से निकलने वाली खतरनाक तरंगें ही मेरे सपनों को दिमाग में आने से रोके रखती हों? मोबाइल पर मेरी जब से निर्भरता अधिक बढ़ी है, तब से एक सपनों ने ही नहीं बच्चों ने भी मेरे करीब आना छोड़ दिया है। जब तब वो तपाक से मुझसे कहा देते हैं कि पापा आपके पास क्या आएं, आप तो दिनभर मोबाइल में ही व्यस्त रहते हो!

तो क्या मोबाइल ही मेरे सपनों को काट रहा है! सम्भवता यही वजह हो सकती है मुझे सपने न आने की। सपनों को भी एक स्पेस चाहिए होता है, हमसे रू-ब-रू होने के लिए। मगर हमने तो उस खाली जगह में मोबाइल को कब्जा दे दिया है। फिर भला कैसे आएंगे सपने मुझे।
लेकिन मैं सपने चाहता हूं। इसके लिए चाहे मुझे मोबाइल को ही अपनी जिंदगी से रुखसत क्यों न करना पड़े। सपने नहीं आएंगे तो जिंदगी में उमंग कहां रह जाएगी। बिन सपनों के जिंदगी बड़ी बे-नूर होती है जनाब।

इसका मतलब और लोग भी मेरी तरह सपने न आने की समस्या से जूझ रहे होंगे न? कितना अन्याय कर रहे हैं हम अपने सपनों के साथ।

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