सोमवार, 25 जून 2018

ये तो होना ही था...

जिसका 'डर' कम 'यकीन' ज्यादा था, वही हुआ। एक और 'राजनीतिक गठबंधन' (बीजेपी-पीडीपी) 'ब्रेकअप' की भेंट चढ़ गया। देश का बच्चा-बच्चा जानता था कि 'गठबंधन' की बुनियाद खोखली है मगर फिर भी दोनों ने निभाने की जिद पकड़ रखी थी। गठबंधन में ऐसी 'जिदें' भला कहां कामयाब हुई हैं! इतिहास उठाकर देख लीजिए, हर गठबंधन अपने साथ-साथ देश की भी भद्द पिटवाकर ही टूटा है।

गठबंधन में कल तक जो 'हम साथ-साथ हैं' का गाना गुनगुनाया करते थे, अब एक-दूसरे को सर से लेकर पांव तक शब्द-वाणों से भेद रहे हैं। एक-दूसरे के इतिहास के गड़े मुर्दे उघाड़ रहे हैं। जैसे- गठबंधन का फर्ज निभाते-निभाते पति-पत्नी एक-दूसरे की कमियों के चित्रहार अपने-अपने नाते-रिश्तेदारों को दिखाते हैं, ठीक वैसा ही यहां भी हो रहा है।

दोनों ही दल देश की जनता को बता रहे हैं कि हमने इनके साथ क्या किया और इन्होंने हमारे साथ का बदला कैसे दिया। ठीक उसी गाने की तरह- 'अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का, यार ने ही लूट लिया घर यार का...।'

और कीजिए गठबंधन। सब-कुछ जानते-समझते हुए भी राजनीतिक दल आपस में गठबंधन कर लेते हैं। और जब नहीं चला पाते तो अपने घर का झगड़ा लेकर सड़क पर आ जाते हैं कि जनता या कोर्ट फैसला करे। जैसे- दोनों खाली बैठे हों!

हालांकि यह (बीजेपी-पीडीपी) साथ चालीस माह तक चला। पर हकीकत ये रही कि दोनों की आपस में चार पल भी न बनी। चालीस माह का संग-साथ चार सेकेंड में छूट गया। गठबंधन का साथ ऐसा ही होता है पियारे। चला तो चला। नहीं चला तो तुम अपने रास्ते खुश, हम अपने।

गठबंधन के फर्ज को निभाना हर एक के बस की बात न होती। चाहे शादी-व्याह का हो या राजनीतिक; जब तक समझौते करते रहेंगे, मजबूरियों को जिंदगी का हिस्सा बनाए रखेंगे, गठबंधन की गाड़ी चलती रहेगी। लेकिन जहां आपस में तू-तू, मैं-मैं शुरू हुई नहीं कि गठबंधन की गांठ पर ग्रहण का असर तुरंत प्रभावी हो लेता है।

इसीलिए तो मैं बिना चू-चपड़ किए बेहद शांति और समझौते के साथ अपनी शादी के गठबंधन को 'वीर तुम बढ़े चलो...' की तर्ज पर खींचे चला जा रहूं। ये कोई राजनीतिक गठबंधन तो है नहीं कि अभी इस दल के साथ हैं तो कल को उस दल के साथ हो लेंगे। क्या फर्क पड़ना है।
यहां तो गठबंधन की गाड़ी जरा-सी इधर-उधर हुई नहीं कि जान और जीवन दोनों सांसत में। इज्जतदार पति वही है, जो पत्नी के साथ अपने गठबंधन को बिना 'उफ्फ' किए साधे चला जाए। जैसे के मैं!

अभी थोड़ा-सा लग रहा है कि ये गठबंधन क्यों टूटा? जख्म अभी ताजा है न इसलिए। दिन जैसे-जैसे गुजरते जाएंगे बहुतों को तो याद भी न रहेगा कि ऐसा कोई गठजोड़ था भी!

इस घटना को 'ये तो होना ही था' की नियति मान भूल जाइए। बाकी आगे-आगे देखिए होता है क्या।

1 टिप्पणी:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन पंचम दा - राहुल देव बर्मन और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार। ।