गुरुवार, 21 जून 2018

समाज को सुधारना चाहता हूं!

कई दिनों से मैं समाज को सुधारने की सोच रहा हूं! न न आप गलत समझ रहे हैं। मैं समाज को समाज के बीच जाकर नहीं, अपने लेखन के दम पर सुधराना चाहता हूं। समाज के लिए कुछ सुधार-पूर्ण लिखना चाहता हूं। समाज को बताना चाहता हूं कि वो ये-ये उपाय कर खुद को कैसे और किस हद तक सुधार सकता है।

हालांकि मैं यह बहुत अच्छे से जानता हूं कि समाज को- लेखन के दम पर सुधारना- हंसी-खेल नहीं। मगर फिर भी सुधार की एक कोशिश करके देख लेने में हर्ज ही क्या है प्यारे। सुधरा हुआ समाज किसे नहीं भाता। अपने लेखन के दम पर दस परसेंट भी अगर मैं समाज को सुधार लेता हूं तो मुझे मेरी 'समाज-सुधार' पर लिखी किताब की अच्छी-खासी रॉयल्टी मिल सकती है। समाज भी सुधार जाएगा और मेरी आर्थिक स्थिति भी। यानी, एक पंथ दो काज।

अपने दिमाग में पनपे समाज-सुधार के इस कीड़े की परिकल्पना जब मैंने पत्नी के सामने रखी तो उसे यकीन ही नहीं हुआ। उसने पूरी परिकल्पना पर पानी उड़ेलते हुए मुझसे कह दिया- 'तुम...तुम समाज को सुधरोगे! पहले खुद तो सुधर जाओ। समाज को बाद में सुधार लेना।' पत्नी का कटाक्ष भीतर तक सुलगा तो बहुत कुछ गया। पर वही है न कि पत्नियों से बहस नहीं कर सकते। पता चला, समाज को सुधारने के चक्कर में अपनी ही कहानी कहीं बिगड़ गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे।

वैसे, समाज में हर बात, हर मुद्दे पर सुधार की दरकार है। लेकिन एक सुधार तो समाज को अपने भीतर तुरंत ही कर लेना चाहिए, वो है: हर विषय में अपनी टांग घुसेड़ने की आदत। मैं समझता हूं, अगर समाज सिर्फ इसी आदत को सुधार ले तो अस्सी परसेंट तक सुधर सकता है।
एक समाज ही नहीं बल्कि घर-परिवार से लेकर राजनीतिक हलकों तक में आधे से अधिक झगड़े और मन-मुटाव बीच में टांग घुसेड़ने की वजह से ही होते हैं। मसला तब और बिगड़ जाता है जब टांग घुसेड़ने के साथ अपनी राय भी जाहिर की जाती है। कि, ये करो तो ऐसा होगा। वो करो तो वैसा होगा। सबसे ज्यादा राय के छौंक से दुखी नया-नवेला शादी-शुदा जोड़ा रहता है।

यों तो इस देश में राजा राम मोहन राय से लेकर ज्योतिबा फुले तक कई महान समाज-सुधराक हुए हैं। ऐसे में मेरा समाज को सुधराने के लिए प्रयास बेशक ऊंट में मुंह में जीरा टाइप ही होगा। मगर फिर भी, कोशिश करने में क्या जाता है। हो सकता है, मेरी किताब समाज सुधार की दिशा और दशा ही बदल दे। चेहरे पर किसी के थोड़े न लिखा होता है कि वो जीवन में वो कितना ऊंचा या नीचा जाएगा।

खैर, इधर-उधर की बातों पर खाक डालते हुए मैं समाज को सुधराने के उपायों पर लिखने बैठ गया हूं। मुझे अग्रिम शुभकामनाएं दें।

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