शुक्रवार, 29 जून 2018

पाप का घड़ा

इन दिनों मेरे साथ कुछ भी ठीक नहीं हो रहा। कभी बनता काम बिगड़ जाता है, तो कभी सड़क चलते कोई भी लड़ लेता है। चार रोज हुए, उल्टे पैर की कन्नी उंगली में ऐसी चोट लगी कि दिन में चांद-सितारे नजर आने लगे। जैसे-तैसे उससे करार पाया तो अभी कोई फुटबॉल चुरा ले भागा। कल जेब से पांचों का नोट गिरकर जाने किस का भला कर गया।
आलम यह है कि अब तो खुद की शक्ल आईने में देखने से घबराने लगा हूं, क्या पता, आईना ही कहीं टेढ़ा-मेढ़ा न हो जाए!

शहर के सबसे समझदार ज्योतिष को अपना हाथ दिखाया तो उन्होंने मेरे ग्रहों का चाल-चलन दुरुस्त न बताकर दो हजार रुपए सीधे कर लिए। साथ में एक उपाय और बता दिया कि रोज आधी रात के बाद गधे की पूंछ के चार बाल तोड़कर शमशान की मिट्टी में गाड़ दूं। लेकिन इस बात का खास ख्याल रखूं कि गधा हर बार अलग होना चाहिए।

अब मेरा कोई गधों का कारोबार तो है नहीं कि हर रोज एक नया गधा मिल जाएगा। यों भी, शहर में हर रोज एक नए गधे को ढूंढना, सड़क पर गड्ढे ढूंढने से भी ज्यादा कठिन काम है। शहरी गधे देहाती गधों के मुकाबले यों भी सयाने होते हैं।

अतः ज्योतिष महाराज के उपाय से अपना पिंड छुड़ाया।

बहुत सोचने पर मैंने पाया कि ये सब मेरे 'ग्रह-दोष' के कारण न होकर मेरे 'पाप का घड़ा' भरने की वहज से है। मतलब- मेरे पापों का घड़ा भर चुका है। जब पाप का घड़ा ओवरफ्लो होने लगता है तब जीवन में ऐसी खतरनाक किस्म की घटनाएं होने लगती हैं।

यह बात अलहदा है कि किसी के पाप का घड़ा देर से भरता है तो किसी का जल्दी। लेकिन भरता अवश्य है, यह तय है।

मगर मैं मेरे पापों का घड़ा भरने से परेशान कतई नहीं हूं। बल्कि खुश ही हूं कि चलो, पाप का घड़ा मेरी उम्र के चालीसवें बसंत में ही भर गया। वरना तो लोगों के पापों का घड़ा अस्सी-नब्बे साल की उम्र तक भी न भर पाता। यह ऊपर वाले की मुझ पर अतिरिक्त कृपा रही। मैं उसका ऋणी हूं।

समय रहते जो काम निपट जाए उसी में भलाई है। मैं भी कब और कहां तक अपने पाप का घड़ा यहां-वहां लिए-लिए घूमता।

अब जबकि मेरे पाप का घड़ा भर ही चुका है, तो मैंने हर किसी से डरना भी छोड़ दिया है। यहां तक की बीवी से भी। पहले तो अनजाने डर के कारण से उसे मैं जबाव भी नहीं दे पाता था, मगर अब तुरंत दे देता हूं। ऑफिस में बॉस को भी जब मौका पड़ता है, खरी-खोटी सुना डालता हूं। मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाते। बस मन मसोस कर रह जाते हैं।

ऐसा लोगों का भरम है कि पाप का घड़ा भरना बुराई का प्रतीक है। जबकि ऐसा कुछ नहीं है। पाप का घड़ा भरते ही बंदा एकदम निडर टाइप हो लेता है। बिल्कुल मेरी तरह।

कम उम्र में पाप का घड़ा भर जाने का सबसे बड़ा फायदा यही मिलता है कि ज्यादा बड़े घड़े की जुगाड़ नहीं करनी पड़ती। छोटे घड़े से ही काम चल जाता है।

इतने ज्यादा पापों से भी क्या हासिल कि अतिरिक्त घड़े की व्यवस्था करनी पड़े। कम पाप, छोटा घड़ा।

पहले के मुकाबले आज के समय का इंसान ज्यादा समझदार है। वक्त से पहले ही अपने पापों का घड़ा भर जीवन से मुक्ति पा लेता है। किया भी क्या जाए; अब पाप ही इतने तरह के होने लगे हैं। पाप भी ऐसे-ऐसे की दांतों तले उंगली दबा ले।

बहरहाल, जिनके पापों का घड़ा जल्दी भर गया है, वे मेरी तरह जश्न मना सकते हैं। बाकी अपने घड़ों के भरने का इंतजार करें।

गुरुवार, 28 जून 2018

सपनों का न आना

मुझे सपने नहीं आ रहे। सपनों के न आने से मैं खासा परेशान हूं। पूरा दिन इसी सोच-विचार में निकल जाता है कि आखिर क्या कारण है, जो सपनों ने मुझसे किनारा कर लिया है।

सपने न आने की समस्या जब भी पत्नी या यार-दोस्तों के समक्ष रखता हूं तो यह कहकर मुझे टाल देते हैं कि 'अच्छा है जो तुम्हें सपने नहीं आ रहे। आजकल के वक्त में सपनों का न आना ही बेहतर।' मगर उन्हें मैं यह कैसे समझाऊं कि सपनों का न आना मेरे लिए सही नहीं है। सपनों से मुझे उतना ही प्यार है, जितना एक मां को अपने बच्चों से होता है।

सपने मेरे जीवन का आईना हैं। इस आईने में मैं वो सबकुछ देख पाता हूं, जो मुझे हकीकत में कहीं नजर नहीं आता। मुझे अपने पागलखाने में होने का अहसास सपने में ही तो हुआ था। मैं तमाम पागलों के बीच उनसे जिंदगी के असली मायने समझ-जान रहा था। उनसे बात करके कभी लगा ही नहीं कि वे पागल हैं। बल्कि मुझे तो यह दुनिया, यह समाज उनसे कहीं अधिक पागल नजर आया। मंटो में भी तो इस दुनिया को पागलखाना कहा था।

लोगों और दुनिया के पागल होने के प्रति मेरी धारण इससे भी और मजबूत होती है, जब वे यह कहते हैं कि इंसान को सपने आना उसके पागलपन की निशानी है। उन्हें क्या मालूम इस पागलपन में कितना सुकून है। वो इंसान ही क्या जिसे सपने नहीं आते।

या, कहीं ऐसा तो नहीं मुझे सपने मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल करने के कारण न आते हों? कहीं मोबाइल और सपने के बीच छत्तीस का आंकड़ा तो नहीं? मोबाइल से निकलने वाली खतरनाक तरंगें ही मेरे सपनों को दिमाग में आने से रोके रखती हों? मोबाइल पर मेरी जब से निर्भरता अधिक बढ़ी है, तब से एक सपनों ने ही नहीं बच्चों ने भी मेरे करीब आना छोड़ दिया है। जब तब वो तपाक से मुझसे कहा देते हैं कि पापा आपके पास क्या आएं, आप तो दिनभर मोबाइल में ही व्यस्त रहते हो!

तो क्या मोबाइल ही मेरे सपनों को काट रहा है! सम्भवता यही वजह हो सकती है मुझे सपने न आने की। सपनों को भी एक स्पेस चाहिए होता है, हमसे रू-ब-रू होने के लिए। मगर हमने तो उस खाली जगह में मोबाइल को कब्जा दे दिया है। फिर भला कैसे आएंगे सपने मुझे।
लेकिन मैं सपने चाहता हूं। इसके लिए चाहे मुझे मोबाइल को ही अपनी जिंदगी से रुखसत क्यों न करना पड़े। सपने नहीं आएंगे तो जिंदगी में उमंग कहां रह जाएगी। बिन सपनों के जिंदगी बड़ी बे-नूर होती है जनाब।

इसका मतलब और लोग भी मेरी तरह सपने न आने की समस्या से जूझ रहे होंगे न? कितना अन्याय कर रहे हैं हम अपने सपनों के साथ।

सोमवार, 25 जून 2018

ये तो होना ही था...

जिसका 'डर' कम 'यकीन' ज्यादा था, वही हुआ। एक और 'राजनीतिक गठबंधन' (बीजेपी-पीडीपी) 'ब्रेकअप' की भेंट चढ़ गया। देश का बच्चा-बच्चा जानता था कि 'गठबंधन' की बुनियाद खोखली है मगर फिर भी दोनों ने निभाने की जिद पकड़ रखी थी। गठबंधन में ऐसी 'जिदें' भला कहां कामयाब हुई हैं! इतिहास उठाकर देख लीजिए, हर गठबंधन अपने साथ-साथ देश की भी भद्द पिटवाकर ही टूटा है।

गठबंधन में कल तक जो 'हम साथ-साथ हैं' का गाना गुनगुनाया करते थे, अब एक-दूसरे को सर से लेकर पांव तक शब्द-वाणों से भेद रहे हैं। एक-दूसरे के इतिहास के गड़े मुर्दे उघाड़ रहे हैं। जैसे- गठबंधन का फर्ज निभाते-निभाते पति-पत्नी एक-दूसरे की कमियों के चित्रहार अपने-अपने नाते-रिश्तेदारों को दिखाते हैं, ठीक वैसा ही यहां भी हो रहा है।

दोनों ही दल देश की जनता को बता रहे हैं कि हमने इनके साथ क्या किया और इन्होंने हमारे साथ का बदला कैसे दिया। ठीक उसी गाने की तरह- 'अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का, यार ने ही लूट लिया घर यार का...।'

और कीजिए गठबंधन। सब-कुछ जानते-समझते हुए भी राजनीतिक दल आपस में गठबंधन कर लेते हैं। और जब नहीं चला पाते तो अपने घर का झगड़ा लेकर सड़क पर आ जाते हैं कि जनता या कोर्ट फैसला करे। जैसे- दोनों खाली बैठे हों!

हालांकि यह (बीजेपी-पीडीपी) साथ चालीस माह तक चला। पर हकीकत ये रही कि दोनों की आपस में चार पल भी न बनी। चालीस माह का संग-साथ चार सेकेंड में छूट गया। गठबंधन का साथ ऐसा ही होता है पियारे। चला तो चला। नहीं चला तो तुम अपने रास्ते खुश, हम अपने।

गठबंधन के फर्ज को निभाना हर एक के बस की बात न होती। चाहे शादी-व्याह का हो या राजनीतिक; जब तक समझौते करते रहेंगे, मजबूरियों को जिंदगी का हिस्सा बनाए रखेंगे, गठबंधन की गाड़ी चलती रहेगी। लेकिन जहां आपस में तू-तू, मैं-मैं शुरू हुई नहीं कि गठबंधन की गांठ पर ग्रहण का असर तुरंत प्रभावी हो लेता है।

इसीलिए तो मैं बिना चू-चपड़ किए बेहद शांति और समझौते के साथ अपनी शादी के गठबंधन को 'वीर तुम बढ़े चलो...' की तर्ज पर खींचे चला जा रहूं। ये कोई राजनीतिक गठबंधन तो है नहीं कि अभी इस दल के साथ हैं तो कल को उस दल के साथ हो लेंगे। क्या फर्क पड़ना है।
यहां तो गठबंधन की गाड़ी जरा-सी इधर-उधर हुई नहीं कि जान और जीवन दोनों सांसत में। इज्जतदार पति वही है, जो पत्नी के साथ अपने गठबंधन को बिना 'उफ्फ' किए साधे चला जाए। जैसे के मैं!

अभी थोड़ा-सा लग रहा है कि ये गठबंधन क्यों टूटा? जख्म अभी ताजा है न इसलिए। दिन जैसे-जैसे गुजरते जाएंगे बहुतों को तो याद भी न रहेगा कि ऐसा कोई गठजोड़ था भी!

इस घटना को 'ये तो होना ही था' की नियति मान भूल जाइए। बाकी आगे-आगे देखिए होता है क्या।

गुरुवार, 21 जून 2018

समाज को सुधारना चाहता हूं!

कई दिनों से मैं समाज को सुधारने की सोच रहा हूं! न न आप गलत समझ रहे हैं। मैं समाज को समाज के बीच जाकर नहीं, अपने लेखन के दम पर सुधराना चाहता हूं। समाज के लिए कुछ सुधार-पूर्ण लिखना चाहता हूं। समाज को बताना चाहता हूं कि वो ये-ये उपाय कर खुद को कैसे और किस हद तक सुधार सकता है।

हालांकि मैं यह बहुत अच्छे से जानता हूं कि समाज को- लेखन के दम पर सुधारना- हंसी-खेल नहीं। मगर फिर भी सुधार की एक कोशिश करके देख लेने में हर्ज ही क्या है प्यारे। सुधरा हुआ समाज किसे नहीं भाता। अपने लेखन के दम पर दस परसेंट भी अगर मैं समाज को सुधार लेता हूं तो मुझे मेरी 'समाज-सुधार' पर लिखी किताब की अच्छी-खासी रॉयल्टी मिल सकती है। समाज भी सुधार जाएगा और मेरी आर्थिक स्थिति भी। यानी, एक पंथ दो काज।

अपने दिमाग में पनपे समाज-सुधार के इस कीड़े की परिकल्पना जब मैंने पत्नी के सामने रखी तो उसे यकीन ही नहीं हुआ। उसने पूरी परिकल्पना पर पानी उड़ेलते हुए मुझसे कह दिया- 'तुम...तुम समाज को सुधरोगे! पहले खुद तो सुधर जाओ। समाज को बाद में सुधार लेना।' पत्नी का कटाक्ष भीतर तक सुलगा तो बहुत कुछ गया। पर वही है न कि पत्नियों से बहस नहीं कर सकते। पता चला, समाज को सुधारने के चक्कर में अपनी ही कहानी कहीं बिगड़ गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे।

वैसे, समाज में हर बात, हर मुद्दे पर सुधार की दरकार है। लेकिन एक सुधार तो समाज को अपने भीतर तुरंत ही कर लेना चाहिए, वो है: हर विषय में अपनी टांग घुसेड़ने की आदत। मैं समझता हूं, अगर समाज सिर्फ इसी आदत को सुधार ले तो अस्सी परसेंट तक सुधर सकता है।
एक समाज ही नहीं बल्कि घर-परिवार से लेकर राजनीतिक हलकों तक में आधे से अधिक झगड़े और मन-मुटाव बीच में टांग घुसेड़ने की वजह से ही होते हैं। मसला तब और बिगड़ जाता है जब टांग घुसेड़ने के साथ अपनी राय भी जाहिर की जाती है। कि, ये करो तो ऐसा होगा। वो करो तो वैसा होगा। सबसे ज्यादा राय के छौंक से दुखी नया-नवेला शादी-शुदा जोड़ा रहता है।

यों तो इस देश में राजा राम मोहन राय से लेकर ज्योतिबा फुले तक कई महान समाज-सुधराक हुए हैं। ऐसे में मेरा समाज को सुधराने के लिए प्रयास बेशक ऊंट में मुंह में जीरा टाइप ही होगा। मगर फिर भी, कोशिश करने में क्या जाता है। हो सकता है, मेरी किताब समाज सुधार की दिशा और दशा ही बदल दे। चेहरे पर किसी के थोड़े न लिखा होता है कि वो जीवन में वो कितना ऊंचा या नीचा जाएगा।

खैर, इधर-उधर की बातों पर खाक डालते हुए मैं समाज को सुधराने के उपायों पर लिखने बैठ गया हूं। मुझे अग्रिम शुभकामनाएं दें।

रविवार, 10 जून 2018

महाभारत काल में 'इंटरनेट' का होना

अगर वो बताते नहीं तो हमें भी कहां पता नहीं चल पाता कि महाभारत काल में भी 'इंटरनेट का अस्तित्व' था! मैं समझ नहीं पा रहा महाभारत के रचयिता और सीरियल बनाने वालों ने हमसे इस 'महत्त्वपूर्ण रहस्य' को छिपाए क्यों रखा? महाभारत काल में 'इंटरनेट' का होना कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। यह युद्ध से कहीं अधिक मायने रखती थी।

बल्कि मुझको तो ऐसा भी लगता है कि महाभारत की प्रत्येक घटना उस वक्त 'इंटरनेट' पर जरूर डाली गई होगी। यह गहन खोज का विषय है। इतिहासकारों एवं वैज्ञानिकों को इस पर अवश्य ही शोध करना चाहिए।
मुझे पक्का यकीन है, उन्होंने महाभारत काल में इंटरनेट होने की बात हवा में नहीं कही होगी। अवश्य ही उनके पास इसके ठोस तथ्य मौजूद होंगे। कोई और भले ही कर ले किंतु नेता लोग कभी इतिहास से छेड़छाड़ नहीं किया करते! हो सकता है, कभी उन्होंने भी उन जगहों की खुदाई की हो, जहां महाभारत का युद्ध घटा! जहां कौरव-पांडव आदि रहा करते थे। खुदाई के दौरान हो सकता है, उन्हें इंटरनेट चलाने वाली कोई डिवाइस मिली हो! सिम या फिर उस वक्त का कोई डेटा प्लान की शीट आदि ही हाथ आ गई हो!

जब उस दौर में इंटरनेट था ही तो यह भी संभव है कि किसी न किसी शक्ल में मोबाइल भी जरूर रहे ही होंगे। वरना, तब वे लोग इंटरनेट चलाते किस पर थे।

मुझे तो इस बात की भी हैरानी है कि पूर्व में हुईं इतनी खुदाइयों के बाद भी खुदाई-कर्त्ता वो नहीं खोज पाए जो उन्होंने एक ही बार में खोजकर देश को बता दिया। इससे यह बात भी प्रमाणित होती है कि देश के नेता सिर्फ राजनीति ही करना नहीं जानते बल्कि वे पैराणिक काल की भी ठीक-ठाक जानकारी रखते हैं।

उनके कहे पर मेरी सहमति इस कारण भी बनती है क्योंकि महाभारत के युद्ध का आंखों-देखा हाल संजय ने महाराज धृतराष्ट्र को सुनाया था। एक-एक पल की खबर उन्हें वे देते रहते थे। इतना ही नहीं वासुदेव कृष्ण भी युद्ध का परिणाम बहुत अच्छे से जानते थे। एक-दूसरे के खेमे की गुप्त सूचनाओं का आदान-प्रदान भी, तब के इंटरनेट के, माध्यम से ही होता रहा होगा।

इंटरनेट का तो खैर उन्होंने बता ही दिया, साथ ही, यह भी खोज और जिज्ञासा का विषय है कि क्या यूट्यूब का जलवा तब भी था! राजा-महाराजा अपना मनोरंजन गीत-संगीत-नृत्य आदि से तो करते ही थे, क्या दिल बहलाने को यूट्यूब का भी इस्तेमाल किया करते थे! जब इंटरनेट था तो संभव है, यूट्यूब भी रहा ही होगा! वैसे, इस विषय पर शोध किया जा सकता है।

अभी एक नेता ने और भी दिलचस्प बयान दिया कि नारदजी के पास गूगल समान जानकारियां रहती थीं। कुछ समय पहले इन्हीं नेता जी ने राम के तीरों को इसरो के रॉकेट जैसा बताया था! मगर लोग हैं कि इस सब को मजाक समझ हवा में उड़ा दे रहे हैं। किंतु मैं ऐसा कतई नहीं करता। बल्कि मुझे तो गर्व टाइप फील हो रहा है कि मेरे देश के नेता वैज्ञानिक सोच के मामले में दस कदम आगे हैं। बेशक, उनकी बातों-बयानों को सुनकर आपका सिर चकरा रहा होगा पर पौराणिक सत्य को कभी झुठलाया नहीं जा सकता।

न भूलें, डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को भी पिछले दिनों एक नेता ने चुनौती दी थी।

चलिए, वापस महाभारत पर लौटते हैं। अक्सर जब महाभारत के युद्ध के विषय में सोचता हूं तो मेरे दिमाग में बार-बार यही प्रश्न कौंधता है कि महाभारत का युद्ध कहीं इंटरनेट की मदद से तो नहीं लड़ा गया था? कहीं युद्ध के तौर-तरीकों को गूगल तो नहीं किया गया था? मामा शकुनि के बारे में अक्सर मुझे कुछ ऐसा ही शक होता है। उनके पास अपने प्रिय भांजे दुर्योधन को देने के लिए इतनी सलाहें थीं। इतने तो वाण भी न होंगे अर्जुन के तरकश में।

महाभारत के किसी भी पात्र की बात कर लीजिए, हर किसी में कुछ न कुछ इंटरनेटिए प्रभाव दिखेगा ही।

मुझे तो पांडवों द्वारा इंद्रप्रस्थ का निर्माण भी गूगल किया हुआ ही लगता है।

इतने प्रमाण मिलने के बाद भी उनके बयान 'महाभारत काल में इंटरनेट था' पर विश्वास न करना कोरी बेवकूफी ही कहलाएगी। शेष आपकी मर्जी।

शनिवार, 9 जून 2018

व्यंग्य में 'पाथ ब्रेकिंग'

जीवन में सफलता का रास्ता अच्छा पढ़ने या अच्छा करियर बनाने से ही नहीं निकलता, 'पाथ ब्रेकिंग' से भी निकलता है। 'पाथ ब्रेकिंग' की अवधारणा को काफी हद तक स्वरा भास्कर ने साबित भी किया है। खुलकर बताया कि मनुष्य के 'चरम सुख' का सुख 'पाथ ब्रेकिंग' में ही निहित है। हालांकि हमारा ऊपर से 'सभ्य' लगने-दिखने वाला समाज अभी 'पाथ ब्रेकिंग' के कॉन्सेप्ट पर नाक-मुंह जरूर सिकोड़ रहा है पर भीतर ही भीतर इसका दीवाना भी बन चुका है। लेकिन बताएगा थोड़े न!

वो तो लोगों को 'पाथ ब्रेकिंग' के कॉन्सेप्ट का एहसास 'वीरे दी वेडिंग' में हुआ जबकि यह उपलब्धि तो चचा वात्स्यायन जाने कब की हमें 'कामासूत्र' के रूप में दे चुके हैं। वही है न कि 'घर की मुर्गी दाल बराबर।'

लोगों के बेड-रूम का तो मुझे नहीं पता मगर सोशल मीडिया पर 'पाथ ब्रेकिंग' ने इन दिनों गजब ढाह रखा है। 'पाथ ब्रेकिंग' पर बनने वाले जोक और वन-लाइनर्स इसकी सफलता की कहानी खुद कह रहे हैं। 'पाथ ब्रेकिंग' शब्द को ईजाद करने वाले ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसका यह शब्द 'यूथ आइकन' बन जाएगा। आलम यह है कि अब तो सड़क चलते कोई भी पूछ लेता है 'और जनाब 'पाथ ब्रेकिंग' कैसी चल रही है?'

मेरे विचार में 'फॉग' के बाद सबसे ज्यादा पूछे जाने वाला सवाल 'पाथ ब्रेकिंग' ही है।

'पाथ ब्रेकिंग' में मुझे अनंत संभावनाएं नजर आ रही हैं। सबसे ज्यादा व्यंग्य में। व्यंग्य के लिए सबसे धांसू नजरिया है 'पाथ ब्रेकिंग'। एक से बढ़कर एक 'पाथ ब्रेकिंग' व्यंग्य लिखे जा सकते हैं। बल्कि मैं तो यहां तक कहने को तैयार हूं 'पाथ ब्रेकिंग' व्यंग्य का भविष्य है। मौजूदा दौर के व्यंग्यकारों को इस मसले पर गंभीर चिंतन करने की जरूरत है।

आपाधापी भरी जिंदगी में जैसे कुछ पल का 'चरम सुख' शरीर को लाइट रखने का काम करता है, वैसे ही व्यंग्य में 'पाथ ब्रेकिंग' मूड को रिफ्रेश करने के काम आएगा। दिमाग पर हर वक्त गंभीरता का लबादा ओढ़े रखना भी ठीक नहीं।

मैं तो यह सोचकर हैरान हूं कि हमारे पुराने और वरिष्ठ व्यंग्यकारों ने 'पाथ ब्रेकिंग' के कॉन्सेप्ट को अपने व्यंग्य लेखन में लेने का प्रयास क्यों नहीं किया? इतनी उत्तेजक रचनात्मकता से अपने पाठकों को महरूम क्यों रखा? माना कि व्यंग्य में जरा बहुत संवेदना, सरोकार, कलात्मकता जरूरी है किंतु 'पाथ ब्रेकिंग' भी उतनी ही आवश्यक है।

खैर...। जो हुआ सो हुआ। वो समय अलग था, यह समय अलग है।

व्यंग्य में नई चमक और गर्माहट पैदा करने के लिए 'पाथ ब्रेकिंग' जरूरी है। लेकिन ये व्यंग्य में आ तभी पाएगी जब हमारे जीवन में भी थोड़ी-बहुत 'पाथ ब्रेकिंग' का चांस बना रहे।

शुक्रवार, 8 जून 2018

फूफा जी का डांस

डांस हर कोई नहीं कर सकता। न डांस हर किसी को कराया जा सकता है। जो डांस नहीं कर सकते, उन्हें आंगन हर वक्त टेढ़ा ही नजर आता है। लेकिन विदिशा (मध्य प्रदेश) वाले फूफा जी ऐसे नहीं हैं। वे शादी में आए अन्य फूफओं से बहुत अलग हैं। आजकल तो अपने 'अद्भुत डांस' के चलते पूरी दुनिया में वायरल हो रखे हैं। दुनिया ही नहीं पूरा सोशल मीडिया उनके डांस का मुरीद बन बैठा है। ट्विटर पर उनके डांस को जमकर रि-ट्वीट किया जा रहा है। तो फेसबुक की पोस्टों में फूफा जी के चर्चे हैं।

जिसे देखो उसी की मोबाइल स्क्रीन पर फूफा जी डांस करते दिख जाएंगे। फूफा जी के डांस ने ऐसा रंग जमाया है कि बॉलीवुड से लेकर मामा जी तक को तारीफ करनी पड़ गई है। मामा जी ने तो यहां तक कह डाला कि मध्य प्रदेश के पानी में कुछ बात तो है। सही है। पानी आखिर कहीं तो अपना असर छोड़ता ही है।

फूफा जी के फुर्तीले डांस को देखकर एक बार फिर यह धारणा मजबूत हो चली है कि डांस में उम्र मायने नहीं रखती। बस दिल का जवां और शरीर का चुस्त होना जरूरी है। वजन भी खास मायने नहीं रखता फूफा जी को नाचता देखकर।

पता नहीं गोविंदा ने फूफा जी का डांस अभी देखा होगा कि नहीं। अगर देख लेंगे तो दीवाने वे भी उनके हुए बिना न मानेंगे।

फूफा जी को डांस करते जब से देखा है, मेरा दिल भी डांस करने को मचलने लगा है। बीच में पत्नी ने भी ताना मार दिया- 'देखो, ऐसे होता है डांस। तुम्हारी तरह नहीं सिर्फ हाथ-पैर हिला लिए।' पत्नी ने हल्की-सी हिदायत भी दे डाली- 'मेरी मानो थोड़े दिन विदिशा में रहकर फूफा जी से डांस सीख आओ।'

पत्नी की सलाह नेक है लेकिन नौकरी की अपनी दुश्वारियां हैं।
बचपन में बड़ी तमन्ना थी, जब भी माइकल जैक्सन को डांस करते देखता था, उस जैसा बनने की। वैसा ही डांस करने की। बॉडी को उतना ही लचीला बनाने की। केवल डांस के दम पर पूरी दुनिया पर छा जाने की। मगर हर कोई तो माइकल जैक्सन नहीं हो सकता न। जैक्सन बनने का ख्वाब ख्वाब ही रहा। फिलहाल, लेखक बन गया।

लेकिन फूफा जी के गोविंदा स्टाइल डांस ने दिल मोह लिया। शरीर में इतना लोच, इतनी स्फूर्ति जाने कहां से लाते हैं फूफा जी।

मानना तो पड़ेगा, डांस प्रेमी होते बहुत जिंदादिल हैं। कहीं भी, कैसे भी डांस करवा लो बिना शर्माए नाच जाते हैं। वे डांस कर अपने शरीर की चपलता को बनाए रखते हैं। और एक हम लेखक हैं, जो इस-उस पर टिका-टिप्पणी कर अपना दिल जलाते रहते हैं।

कितना खुशनसीब है वो परिवार जिसमें ऐसे मस्त डांसर फूफा जी हैं। फूफा शादियों में सिर्फ मुंह ही नहीं बिगाड़ते, डांस भी बिंदास करते हैं। जियो फूफा जी।

बुधवार, 6 जून 2018

फ्लिपकार्ट का बिकना

जब भी किसी को बिकते देखता हूं तो खास आश्चर्य नहीं होता। सोचता हूं, अगले में बिकने का गुण रहा होगा, इसीलिए तो बिका। वरना, इस घोर प्रतिस्पर्धा के समय में बिकना-बिकाना इतना आसान कहां।
मैं तो जब आईपीएल के खिलाड़ियों को बिकते देखता हूं तो यह हौसला मन में जगा रहता है कि बिकना इतना बुरा भी नहीं अगर ठीक-ठाक पैसे मिल रहे हों।

इसीलिए फ्लिपकार्ट ने ठीक किया वालमार्ट के हाथों बिक कर। खुद की मेहनत पर खड़ी की दुकान बंद करने से तो बेहतर था कि उसे बेच दिया जाए। जब बिजनेस की झोंक खुद से न संभल पा रही हो तो उसका तियां-पांचा कर ही देना चाहिए।

मगर फ्लिपकार्ट के बिकने पर देश का बुद्धिजीवि वर्ग बड़ा परेशान है। उनकी परेशानी को सुनकर लग तो ऐसा रहा है मानो- उनके बेटे की दुकान बिक गई हो! जबकि खुद बड़े आराम की जिंदगी बसर कर रहा है देश का बुद्धिजीवि वर्ग। सिवाय हर मुद्दे पर गाल बजाने और जुबान चटखाने के कोई खास काम उनके कने नहीं होता।

कह रहे हैं, फ्लिपकार्ट का बिकना देश को विदेशी पूंजीवाद के हाथों गिरवीं रख देने जैसा है। सरकार धीरे-धीरे कर देश के उद्योग-धंधों को विदेशी कंपनियों को सौंप रही है। पहली बात तो यह है कि फ्लिपकार्ट ने बिकने का फैसला खुद से किया है, सरकार का इस डील में कोई रोल ही नहीं बनता। और फिर ऐसा कौन-सा धंधा है, जहां विदेशी हस्तक्षेप नहीं है। खाने से लेकर जीने तक हर कहीं विदेशी आइटम्स का दबदबा है। पूंजीवाद का विरोध तो महज दिखावा है। बुद्धिजीवि खुद अंदर से कितना पूंजी में डूबे हुए हैं, सब जानते हैं।

वैसे, जब भी देशी कंपनियों को विदेशियों के हाथों बिकते देखता हूं तो यही सवाल मन में आता है कि हम भारतीयों को बाजार की मांग के मुताबिक चलना नहीं आता। कस्टमर्स का टेस्ट कंपनियां जान नहीं पातीं। जबकि अपना माल बेचने में विदेशी हमसे कहीं अधिक चालक और तेज होते हैं। अगर यह सच न होता तो मोबाइल मार्केट में चाइनीज फोनों की धूम न होती।

खैर, फिर भी दो बंदों ने फ्लिपकार्ट को इतने लंबे समय तक अपने दम पर टिकाए रखा बड़ी बात है। बाद में जब कंपनी हाथ से फिसलने लगी तो बेच दी। बिल्कुल ठीक किया। फिसलने से पहले संभल जाने में ही तो समझदारी है।

बिकना-बिकाना खुद को मार्केट में बनाए रखने के फंडे हैं। आज के दौर में कामयाब भी वही है जो खुद को ऊंचा बेच सके। चाहे खिलाड़ी हो या कलाकार या फिर लेखक ही क्यों न हो। अंटी में आता पैसा किसे बुरा लगता है जनाब।

मुझसे तो कोई आकर कहे कि मैं आपके लेखन को खरीदना चाहता हूं, मैं तो हंसी-हंसी स्वीकृति दे दूंगा। खरीद ले। पर पैसा मस्त दियो। पैसा ही जीवन का अंतिम सत्य है। बाकी सब हवाबाजी है महाराज।

खैर, जिसे बिकना था वो बिक गई। जिन्हें पूंजीवाद को गरियाना है, गरियाते रहें। मुनाफा पहले है। जज्बातों का कोई अचार थोड़े न डालना है उम्रभर। क्या समझे।

मंगलवार, 5 जून 2018

खटमलों से प्रेम

पिछले दिनों एक सज्जन के घर ठहरने का मौका मिला। सज्जन की सज्जनता तब बहुत भा गई, जब रात को सोने से पहले ही उन्होंने मुझे बता दिया कि उनकी खटिया और बिस्तर में खटमल हैं! खटमल का नाम सुनते ही मेरा मन प्रसन्न हो उठा। मैंने उन्हें खटमल वाली खटिया और बिस्तर पर मुझे सुलाने के लिए तहे-दिल से धन्यवाद दिया। एक बार को वे भी थोड़ा सकपका-सा गए कि कैसा बंदा है, जो खटमल की खटिया और बिस्तर पर सोने के लिए बाबला हुआ जा रहा है।

उन्होंने मुझसे पूछा भी कि मुझे खटमलों के साथ सोने में कोई एतराज तो नहीं। मैंने उन्हें साफ कह दिया एतराज का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। बल्कि खटमलों के प्रति तो मेरे दिल में बचपन से ही प्यार और आदर हैं। खटमल द्वारा इंसानों का खून पीने को मैं कतई बुरा नहीं मानता। इंसान का खून उनका भोजन है। यों, किसी के भोजन पर लात मारना उचित नहीं।

वक्त ने इंसान को बड़ा निर्दयी और मतलबपरस्त बना दिया है। हमेशा वो अपना ही भला सोचता है। कभी नहीं चाहता कि उसके दम पर किसी दूसरे के साथ भी अच्छा हो। अपवादों को छोड़ दें तो 'अच्छाई' करना इंसानों की कुंडली में लिखा ही नहीं।

किंतु मैं ऐसा रत्तीभर नहीं सोचता। चाहे खटमल हो या छिपकली, इंसान हो या शैतान कोशिश मेरी यही रहती है, उनके साथ अच्छा ही करूं। बताते है, अच्छा करने से स्वर्ग मिलता है। हालांकि मुझे स्वर्ग की कभी तमन्ना नहीं रही, फिर भी, अगर मिल जाए तो क्या हर्ज?

कोई ऐसा मानेगा तो नहीं पर हम इंसानों ने खटमलों के साथ ज्यादती बहुत की है। उन्हें यों उपेक्षित रख छोड़ा है मानो वे हमें भारी नुकसान पहुंचाते हों! जबकि हकीकत यह है कि खटमल सिवाय इंसान का खून चूसने के और कोई हानि उसे नहीं पहुंचाता। एक नन्हा-सा जीव इतने बड़े इंसान का कितना खून चट कर जाएगा भला! उससे कहीं अधिक मात्रा में इंसान जानवरों का खून कर रहा है। खुद ही एक-दूसरे के खून का प्यासा है।

लेकिन खटमल जरा-सा क्या पी ले, हमें तरह-तरह की मुसीबतें होने लगती हैं। तुरंत ही उसे मारने के इंतजाम किए जाते हैं। जबकि खटमल से कहीं खतरनाक मच्छर है पर उस पर इंसान का जोर चल ही नहीं पा रहा। देश में मच्छर सुकून भरी जिंदगी जी रहे हैं। और बेचारे खटमल विलुप्ति की कगार पर हैं।

खटमलों के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए किया मैंने यह है कि मैं उन सज्जन के यहां से दस-बीस खटमल मांग लाया हूं। ताकि उन्हें अपनी खटिया और बिस्तर पर संरक्षण दे सकूं। रात को जब सोऊं तो वे मेरे खून से अपनी भूख मिटा सकें। भूखे को भोजन खिलाना शास्त्रों में भी पुण्य का काम बताया गया है।

शेर, चीता, गाय आदि तो हम बचाते ही रहते हैं अब थोड़ा हमें खटमलों को बचाने के बारे में भी सोचना चाहिए। खटमलों को भी हमारे प्यार की दरकार है।