बुधवार, 9 मई 2018

गर्मी का डर

मनुष्य बड़ा ही डरपोक किस्म का प्राणी है। किसी न किसी बात पर हर वक्त डरा-सहमा सा रहता है। लेकिन 'डर के आगे जीत' होने का दावा भी करता है। हालांकि इस तरह के दावे विज्ञापनों में ही किए जाते, वास्तव में जब डर सामने होता है, तब सारी जीत दस्त बनकर निकल जाती है।

फिलहाल, इन दिनों मनुष्य गर्मी से डरा हुआ है। अभी चार-पांच महीने पहले तक सर्दी से डर हुआ था। थोड़े दिनों बाद जब मानसून शुरू होगा तब बरसात से डरा-डरा घूमेगा। डर को मनुष्य ने अपने व्यवहार में ऐसे शामिल कर लिया है कि नन्हे से कॉकरोच को देखकर भी विकट डर जाता है।

जब से मनुष्य ने यह सुना है कि इस बार गर्मी पेलके पड़ेगी, बस डर गया है। खुद को गर्मी से बचाए रखने के उपाय यूट्यूब पर देख-खोज रहा है। एक-दूसरे को गर्मी से बचाव के नुस्खे भी सुझा रहा है। फिर भी, गर्मी को गरियाने में लगा पड़ा है।

इस भले मनुष्य से यह पूछा जाए कि गर्मी को गरिया कर क्या हासिल हो जाएगा? गर्मी का स्वभाव ही तपाना है, वो तपाएगी ही। किसी के गरियाने या बौखलाने का असर गर्मी पर तो होने से रहा।

यों भी, गर्मी इस दफा कोई पहली बार तो पड़ नहीं रही। हर बार की यही कहानी है। गर्मियों के दिनों में ही पेड़ लगाने, पानी बचाने, प्रकृति से छेड़छाड़ न करने जैसी क्रांतिकारी बातें याद आती हैं। गर्मी के विदा लेते ही सारी बातें हवा में धूल उड़ाती जान पड़ती हैं।

बात-बात पर गाल बजाना मनुष्य का जन्म से ही स्वभाव रहा है। प्रकृति की रक्षा के वास्ते जाने कितनी ही कसमें हम हर रोज खाते हैं। पर नतीजा किसी का कुछ नहीं निकलता। जैसे- नेता जनता के समक्ष कसमें खाकर भूल जाते हैं, वैसे ही हम प्रकृति के समक्ष। हिसाब बराबर।
हर साल गर्मियों में पारा 50 पार निकल जाता है। टीवी हल्ला मचाता है। मनुष्य हाय गर्मी, हाय गर्मी चिल्लता है। मगर गर्मी है कि अपनी मर्जी से बाज नहीं आती। सोचने वाली बात है, गर्मी गर्मियों में नहीं पड़ेगी तो कब पड़ेगी?

मुझ जैसों को तो बेसब्री से इंतजार रहता है गर्मी का। हालांकि गर्मियां अब मेरे बचपन जैसी नहीं रहीं तो क्या आनंद तो अब भी उतना ही देती ही है। गर्मी के होने का अहसास ही बचपन की यादों में ले जाता है। बचपन की गर्मियां कितनी बे-फिक्र थीं। नानी का घर था। पास में घना पेड़ था। दोपहरें यों ही आपस में खेलते बीत जाती थीं। आंगन में पसरी धूप और उसी में खेलने की जिद का भी अपना ही मजा था।

मगर वो समय अब गुजर चुका है पर गर्मियां अपने स्वभाव में अब भी नहीं बदली हैं। हां, लोग जरूर बदल गए हैं। अब लोग गर्मी से घबराते हैं। ज्यादा गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पाते। पेड़ की नहीं एसी की ठंडक ढूंढ़ते हैं।

कितना डरपोक हो गया है मनुष्य न। गर्मी से डरता है।

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