गुरुवार, 31 मई 2018

आत्मचिंतन ही तो कर रहा हूं

मेरे शुभचिंतक अक्सर मुझे यह सलाह देते हैं कि मैं अपने लेखन पर आत्मचिंतन करूं! उनका मानना है कि निरंतर आत्मचिंतन से मैं अपने लेखन को और भी निखार सकता हूं।

उनकी सलाह सिर-आंखों पर। ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि मेरे शुभचिंतक मुझे सलाह दें और मैं न मानूं। मैंने धरती पर जन्म ही अपने शुभचिंतकों की सलाहें मानने के लिए लिया है! जिस दिन मैं उनकी सलाह मानने में अपनी दिलचस्पी रखना छोड़ दूंगा, समझिए मेरी रचनात्मकता कूड़ा हो जाएगी!

ऐसा नहीं कि मैं आत्मचिंतन नहीं करता। खूब करता हूं। कभी-कभी तो एक साथ इतना आत्मचिंतन कर लेता हूं कि मेरी आत्मा और मेरा चिंतन दोनों मिलकर मुझे गरियाने लग जाते हैं। एक दफा की बात है, मेरी आत्मा ने मेरे भीतर रहने से ही इनकार कर दिया था। आरोप लगा रही थी कि मैं चिंतन के बहाने उसका (आत्मा) का मानसिक शोषण कर रहा हूं! वो तो भला हो मेरे शुभचिंतकों का कि उनकी रिक्वेस्ट पर वो वापस लौट आई।

वैसे, लगता नहीं कि मुझे मेरे लेखन पर आत्मचिंतन की आवश्यकता है। क्योंकि चिंतन-परक ऐसा कुछ मैं लिखता ही नहीं। लेखन में मैंने हमेशा ऐसे विषयों से जी चुराने की कोशिश की है, जिसमें बहुत अधिक चिंतन की जरूरत पड़े। चिंतन और चिंता दोनों को मैं चिता समान मानता हूं। (ये मेरा निजी मत है। मेरे शुभचिंतक कृपया दिल पर न लें।)

फिर भी, हल्का-फुल्का आत्मचिंतन मैं इसलिए कर लेता हो ताकि मेरे दिमाग का विकास ठीक-ठाक होता रहे। 'सबका साथ, सबका विकास' में मेरी घोर आस्था है!

जिस प्रकार का आत्मचिंतन बुद्धिजीवि लोग कर लेते हैं, उतना तो मैं दस जन्म लेकर भी नहीं कर सकता। पता नहीं उनकी आत्मा उनसे नाराज होती भी है या नहीं? कहीं यह सोचकर तो चुप्पी नहीं मार जाती कि बुद्धिजीवियों से क्या पंगा लेना। ये तो इनका 24x7 का काम है। सही भी है न, बुद्धिजीवि आत्मचिंतन नहीं करेगा तो क्या मुझ जैसे ठलुए करेंगे?

आत्मचिंतन बहुत उम्दा चीज है अगर देख-भाल कर किया जाये। शायद इसीलिए मेरे शुभचिंतक मुझे आत्मचिंतन करने की सलाह देते रहते हैं।
जी, आत्मचिंतन में ही लगा हूं।

कोई टिप्पणी नहीं: