गुरुवार, 31 मई 2018

शहरों को बदनाम करने की साजिश

एक सर्वे में एंवाई 14 शहरों को बदनाम कर डाला कि वो 'गंदे' हैं। शहर भला गंदे क्यों होने लगे! शहरों ने खुद को थोड़े न गंदा किया है। शहर तो गंदे इंसानों ने मिलकर किए हैं। सड़क से लेकर हवा-पानी तक को इतना दूषित कर दिया कि रहना तो छोड़िए, सांस लेना तक मुश्किल। शहरों की गंदगी जब खुद से संभल नहीं पाई तो कह दिया कि अमुख-अमुख शहर गंदे हैं।

जबकि हकीकत तो यह है कि शहर नहीं इंसान की मानसिकता ही गंदी है। इतने बरसों में इंसान न खुद को साफ-सुथरा रख सका न अपने शहरों को। जहां भी गया गंदगी लेकर गया। वो तो गनीमत बस इतनी रही है कि अभी चांद और सूरज रहने लायक ठिकाने नहीं बन पाए हैं इंसानों के इसलिए गंदगी से बचे हुए हैं। वरना उन्हें भी इंसानों ने कब का प्रदूषित कर डाला होता। फिर भी, कवायदें जारी हैं मंगल ग्रह पर आशियाना बसाने की।

गंदगी से हमारा प्रेम अब का नहीं बल्कि आदमजात के जन्म से है। तब हम अपनी अनिभिज्ञता के चलते गंदे रहते थे, अब अभिज्ञता के चलते रहते हैं। प्राथमिकता में हमारी अपने घर का चबूतरा साफ-सफाई संपन्न रहे, यही रहता है। पड़ोसी का चबूतरा या गली की नालियां कितनी ही गंदी रहें, हमसे नहीं मतलब। अपना चकचक रखने के चक्कर में हम प्रायः दूसरे का घर गंदा करने से कभी गुरेज नहीं करते।

शहरों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। शहर खुद से गंदे कभी नहीं रहे। गंदा तो हमने उन्हें किया है। अपने दिमागों में पसरा कचरा हम शहरों की सड़कों-नालियों में डालते रहते हैं। धीरे-धीरे कर कचरे ने इतना विकराल रूप ले लिया कि खुली हवा में सांस लेना तक दुभर हो गया। हम कपड़ों से लेकर रहन-सहन तक में आधुनिक होते चले गए मगर अपनी सोच को गंदगी से पाट दिया। नतीजा सामने है।

देख रहा हूं आजकल शहरों को स्मार्ट बनाने का खूब हल्ला मचा पड़ा है। जिसे देखो वही जुटा है अपने शहर को स्मार्ट घोषित करवाने में। कभी शौचालय बनाकर तो कभी सफाई अभियान चला कर शहरों को स्मार्ट सिटी की घोड़ा-दौड़ में लाया जा रहा है। यहां भी नंबर गेम की जुगाड़ जोरों पर है।

तिस पर भी पान की थूक और राह चलते कुछ भी फेंक देने की आदत में सुधार नहीं आ पाया है। बरसों पुरानी आदत है इतनी जल्दी कैसी छूट जाएगी भला। अपनी आदतों पर पर्दा डालने का सबसे उत्तम समाधान है शहरों को गंदा दिखाकर उन्हें बदनाम कर दो। हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा।

सुना है, 14 शहरों की बदनामी होते ही सरकारी अमला नींद से जाग गया है। पूरी जी-जान से जुट पड़ा है, शहरों की गंदगी के प्रदूषित दागों को धोने के लिए।

फिलहाल, यह अभी रहस्यमय ही है कि प्रदूषित दाग कब तलक धुल पाएंगे। जो हो पर शहर तो खामख्वाह बदनाम हो ही गए न।

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