बुधवार, 11 अप्रैल 2018

लोटावाद की जय

सिवाय 'लोटावाद' को छोड़कर दुनिया के किसी भी वाद में मेरा रत्तीभर विश्वास नहीं। बाकी वादों के साथ अपनी-अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताएं हैं लेकिन लोटावाद के साथ ऐसा कुछ भी नहीं। यह वाद एकदम स्वतंत्र है।

हालांकि लोग ऐसा मानेंगे नहीं लेकिन अपनी-अपनी लाइफ में थोड़े-बहुत लोटे तो हम सभी हैं। जहां सुविधा या निजी हित देखें हैं, वहां लुढ़के भी हैं। सफलता का पूरा स्वाद केवल वही लोग चख पाते हैं, जिन्होंने लुढ़कने को अपने जीवन का मंत्र बनाया हुआ है।

खामखां के आदर्शों से दिल को सुकून तो अवश्य मिल सकता है किंतु पेट नहीं भरा जा सकता। पेट भरने के लिए लोटा तो बनना ही पड़ेगा।
लुढ़काऊपन लोटे में स्वभाविक है, बनावटी नहीं। जिस भी दिशा में चाहता है वो लुढ़क सकता है। लोटे के लुढ़कने पर किसी का जोर नहीं। यही वजह है कि लोटावादी अपने लोटावाद के साथ ज्यादा सहज रह पाते हैं। जैसे मैं।

दुनिया में जितने भी किस्म के वाद हैं, हर वाद अपने साथ किसी न किसी वैचारिक मजबूरी को ढोह रहा है। वैचारिक मजबूरियां तब अधिक बोझप्रद जान पड़ती हैं जब उन्हें जबरन थोपने की कोशिश की जाती है। आजकल यही हो रहा है। अपने-अपने वाद में यकीन रखने वाले वादी पूरी मुस्तैदी से लगे हैं दूसरे के वाद को खारिज करने में। उनके वाद ने उन्हें लोटा बना रखा है लेकिन वे यह मानेंगे थोड़े ही।

मगर लोटा-प्रेमी मस्त हैं अपने लोटावाद के साथ। उन्हें किसी के वाद से कोई मतलब नहीं। न उनकी किसी के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता है न वाद की मजबूरी। उनका पूरा ध्यान लुढ़कने में केंद्रित रहता है। जिसे वे अच्छे से निभा रहे हैं।

मुझे भी लोटावाद एक आदर्श वाद लगता है। इसीलिए हर किस्म के वाद से मैं खुद को दूर रखता हूं। चूंकि मुझे- अपनी सुविधानुसार- लुढ़कना पसंद है इसलिए लोटों में मेरा विश्वास गहन है।

समाज और दुनिया को समझने के लिए आपको लोटा बनना ही पड़ेगा। जब तक आप लुढ़केंगे नहीं, जान ही नहीं पाएंगे कि सयाने किस एंगल की ओर झुके हुए हैं।

ये वाद-फाद सब ऊपरी दिखवे हैं, असली मकसद है अपने काम का निकलना। काम निकालने के लिए इंसान किसी भी हद तक जा सकता है। वादवादी तो अपने-अपने वादों को खुद पर इसलिए ढो रहे हैं ताकि समाज की सहानुभूति जुटा सकें। नादान हैं।

अगर खुद की प्रासंगिकता को बचाए रखना है तो वैचारिक वादों से ध्यान हटाकर लोटावादी बनिए। जहां मतलब निकलता हुआ दिखे बस वहीं लोट जाइए। दुनिया क्या कहेगी, इसकी फिक्र दुनिया वालों पर छोड़िए।

लुढ़कते लोटावाद को अपने जीवन का अंतिम सत्य मानकर चलिए। दुनिया आपके कदमों में न हो तो मेरा नाम बदल देना।

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