बुधवार, 25 अप्रैल 2018

उपवास से उपहास तक

उनके उपवास को उपहास का केंद्र खामखां बनाया गया। जबकि ऐसा किसी इतिहास या कानून की किताब में नहीं लिखा है कि उपवास मतलब नितांत 'भूखा' रहना। पहले या बीच-बीच में थोड़ी-बहुत टूंगा-टांगी चलती है। बंदा उपवास कर रहा है, कोई अपनी जान देने थोड़े न बैठा है। जीवन अनमोल है।

सोशल मीडिया तो झूठ और फोटोशॉप का पुलंदा है। जो धत्तकर्म कहीं नहीं हो सकते वो यहां होते रहते हैं। और, बेहद खुलकर होते हैं। सीन को थोड़ा समझने का प्रयास करें। पहली बात, सोशल मीडिया पर खाने की जो तस्वीर वायरल हो रही है, उसमें छोले-भटूरे नहीं पूरियां-छोले नजर आ रहे हैं। दूसरी बात, उस तस्वीर में अध्य्क्ष महोदय कहीं नहीं हैं। अब पार्टी के कुछ सदस्य बाहर जाकर कुछ खा-पी लेते हैं तो इसमें इतना हंगामा खड़ा करने का क्या मतलब! पेटपूजा से बड़ा कोई कर्म नहीं।

यों भी, यह कुछ घंटे का सांकेतिक उपवास था। सरकार को बस बताना भर था कि 'देखो, दलित हित के नाम पर उपवास हम भी कर सकते हैं।' जरा-सी देर के उपवास के लिए तमाम तरह की फॉर्मिल्टज निभाई जातीं, यह तो कोई अक्लमंदी नहीं होती! आगे जब कभी उन्हें लंबी भूख हड़ताल करनी होगी, तब देखा जाएगा।

हर किसी ने सोशल मीडिया और अखबारों में कथित छोले-भटूरे तो खूब देख लिए किंतु उपवास के पीछे का उद्देश्य समझने की कोशिश ही नहीं की। अमां, इतना आसान नहीं होता जन-हित के लिए सरकार से लड़ना-भिड़ना। धरने पर बैठना। आंदोलन करना। उपवास रखना। हरदम जनता को यह विश्वास दिलाते रहना कि तुम चिंता मत करो। हम मरते दम तक तुम्हारे साथ हैं। ऐसा कहने और करने का साहस केवल जन-नेता के पास ही होता है। और, उन्होंने यह करके भी दिखा दिया। यह क्या कम बड़ी बात रही?

पता नहीं कुछ लोग उनके हर प्रयास को मजाक में क्यों लेते हैं। वे कोई पहले जन-नेता तो हैं नहीं जो उपवास पर बैठे हों। अतीत में ऐसे नेताओं की फौज है जिन्होंने अपना राजनीतिक करियर ही उपवास के सहारे चमकाया है। उनमें से कोई सीएम बना बैठा है तो कोई मंत्री।

सामाजिक जीवन में भले ही न हों पर राजनीतिक जीवन में उपवास के अनेक लाभ हैं। सीधे शब्दों में कहूं तो बड़ा और मशहूर नेता बनने का रास्ता उपवास की गली में से होकर ही निकलता है। वो नेता ही किया जो अपनी जनता के हितों की खातिर कुछ देर भूखा न रह पाए। या दलित के घर खाना खाने न जाए!

अंदर ही अंदर मैं भी उनकी सांकेतिक भूख हड़ताल से प्रभावित हुआ हूं। मेरा भी दिल करने लगा है कि किसी दिन किसी सोशल मुद्दे पर मैं भी उपवास पर बैठूं। गोटी अगर फिट बैठ गई तो लेखक से नेता बनने की संभावनाएं किसी भी पॉलिटिकल पार्टी में तलाश लूंगा। जन-हित के वास्ते जितने काम मैं नेता बनकर कर सकता हूं, लेखक बने रहकर नहीं कर पाऊंगा। लेखक की इस दुनिया में सुनता ही कौन है! खुद की बीवी तक न सुनती।

भले ही उनके उपवास का सोशल मीडिया पर उपहास उड़ा पर कदम उन्होंने पीछे नहीं हटाए हैं। सरकार से 2019 में दो-दो हाथ करने की तैयारी में दिख रहे हैं। अच्छा है। बहुत अच्छा है। करें। मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।

तंज कसने वालो से मैं कहना चाहता हूं, छोले-भटूरे इतना बुरा आइटम नहीं कि आप उपहास उड़ाएं। बड़ा ही मस्त धंधा है। सही बताऊं, अगर मैं ज्यादा न पढ़ा होता तो आज निश्चित ही अपने शहर में मेरा भी छोले-भटूरे का ठेला होता। जितना मैं नौकरी कर कमा पा रहा हूं, इससे दोगुना छोले-भटूरे का ठेला लगा कर कमा लिया होता अब तक। जिंदगी चैन से गुजर रही होती।

अपने देश में हर टाइप का धंधा मंद हो सकता है पर खाने-पीने का कभी नहीं। बड़े-बड़े भूखड़ पड़े हैं यहां। खाने-पीने का फ्यूचर हमेशा ही ब्राइट है अपने देश में।

लोगों का क्या है वो तो कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं। अभी उन्होंने उनके उपवास को टारगेट किया कल को पीएम के किसी भाषण पर जोक बनाने लग जाएंगे। सोशल मीडिया के अपने चोचले हैं। अच्छा खासा उनका उपवास चल रहा था अगर सोशल मीडिया पर इसका उपहास न उड़ाया गया होता।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह उनका पहला उपवास था। पहले कदम में थोड़ी-बहुत गलतियां तो हो ही जाती हैं। परफेक्ट तो यहां कंप्यूटर भी न होता शिरिमानजी।

उपहास उड़ाने वाले खुद जरा आधा घंटा भूखा रहकर तो देख लें। कसम से भीतर तक के टांके ढीले न हो जाएं तो जो कहें वो हारने को तैयार हूं।
पॉपुलर नेता बनने के लिए ये सब तो करना पड़ेगा। अभी उन्होंने उपवास किया है, हो सकता है, कल को जन-हित की खातिर वनवास पर भी निकल जाएं। इरादे मजबूत होने चाहिए बाकी समय इतिहास लिखता रहता है। उनके उपवास ने भी कम बड़ा इतिहास नहीं रचा है! मानिए तो सही।

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