मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

कैशलैस होइए, क्या समस्या है

जब 'पैसा हाथ का मैल है' तो 'एटीएम में कैश नहीं है' को लेकर इतना फिक्रमंद क्यों होना महाराज? नहीं है तो नहीं है। समझदारी तो इसमें है कि जो चीज नहीं है, काम उसके वगैर चलाया जाए। लेकिन नहीं...।
लगा पड़ा है हर कोई सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक कभी सरकार तो कभी बैंक को गरियाने में। गरियाते रहिए। गरियाने से न तो कैश एटीएम में भर जाएगा। न सरकार नतमस्तक होकर अपनी जेब से पैसा निकालकर आपके हाथ में धर देगी।

जबकि प्रधानमंत्री जी कितनी ही दफा हमसे कैशलैस होने का आह्वान कर चुके हैं। कितनी ही तरह की एप्स मौजूद हैं पैसे के लेन-देन के लिए। एक प्रकार से बैंक ही मोबाइल पर आ गया है। अब ज्यादा जरूरत न बैंकों के चक्कर काटने की रही, न कैश को जेबों में रखने की। लेकिन फिर भी लोग एटीएम और कैश के प्रति अपना मोह त्यागना नहीं चाहते।
कैशलैस होने के अपने फायदे हैं। सबसे बड़ा फायदा तो यही है कि जेब भारी-भरकम पर्स के बोझ से मुक्त रहती है। जेब कटने का खतरा भी न के बराबर रहता है। प्लास्टिक मनी से पैसा चुकाते वक्त चार लोगों की निगाह आप पर रहती है। सोसाइटी में आपका मान-सम्मान बढ़ता है।
अब तो कुछ एप्स से पेमेंट करने पर अच्छा-खासा 'कैश-बैक' भी मिलने लगा है। जेब में क्रेडिट कार्ड का होना खुद में कितना आत्मविश्वास भर देता है। इसे दिल से महसूस कीजिए।

न्यू इंडिया में रहना है तो कैश और एटीएम का मोह तो छोड़ना होगा। आदत तो डालने से डलती है जनाब। मुझे ही देखिए न। जेब में कैश होने के बावजूद पत्नी से साफ कह देता हूं पैसे नहीं हैं। जब भी कोई रिश्तेदार घर आने का मन बनाता है तो उनसे कह देता हूं कार्ड साथ में लेते आइएगा। बाहर नकदी की समस्या विकट है।

चाहे दूध वाला हो या सब्जी वाला सबको पेटीएम ही करता हूं। कैश का अपने साथ कोई रगड़ा नहीं। सिर्फ कहने या विज्ञापन के दिखाए जाने से ही थोड़े न बन जाएंगे हम न्यू या डिजिटल इंडिया। उस रूप में खुद को ढालना तो पड़ेगा ही न।

यकीन मानिए, इस कैश-वैश, एटीएम-फेटीएम में कुछ नहीं रखा। जितना जल्दी हो खुद को कैशलैस कर लीजिए। कैश के झंझट से मुक्ति पाइए। समय से दो कदम आगे चलने में ही भलाई है। कब तक यथास्थितिवाद में जीते रहेंगे महाराज।

मैं तो उस कल्पना भर से ही प्रफुल्लित हो जाता जब मुझे पूरा इंडिया कैशलैस नजर आता है। यों लगता है मानो किसी दूसरे ही संसार में आ गया हूं। कितना दिलचस्प होगा न कि एक भिखारी मुझसे कैशलैस भीख मांगे। या एक जूस वाला मुझे कैशलैस जूस पिलाए। इंडिया ऐसे ही तो बदलेगा। सरकार या बैंक को गरिया लेने से मन की भड़ास जरूर निकल जाएगी मगर कैश फिर भी हाथ-पल्ले न पड़ेगा।

तो क्यों न कैशलैस ही हुआ जाए। क्या समस्या है।

कोई टिप्पणी नहीं: