गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

नाम में कुछ न रखा

तय किया है कि मैं अपना नाम बदलूंगा! यह नाम अब मुझे जमता नहीं। न तो मेरे नाम में फिल्मी फील है न साहित्यिक प्रभाव। जब भी कोई मेरा नाम पुकारता है, लगता है, शुष्क नदी में पत्थर फेंक रहा हो! पता नहीं, क्या और क्यों सोचकर मेरे घर वालों ने मेरा यह नाम रख दिया।

बहुत अच्छे से याद है, जब क्लास में टीचर मुझे मेरे नाम से बुलाया करते तो सारे दोस्त मुझ पर हंसा करते थे। मजाक उड़ाते हुए कहते- कभी टाइम निकालकर दो-चार फूल हमारी बगिया में भी लगा जाना यार। कसम से उस वक़्त इतनी आक्रमक टाइप फील आती थी कि बस कुछ पूछिए मत। मन मसोस और मुट्ठी भिंच कर रह जाता था। लड़-भिड़ इसलिए नहीं सकता था क्योंकि मेरी गिनती क्लास के चरित्रवान स्टूडेंट्स में हुआ करती थी।

वैसे, मेरा चरित्रवान होना उनका कोरा भ्रम ही था। जबकि चरित्र से मेरा नाता दूर-दूर तक न तब था न अब है।

मैं अपने नाम के साथ कुछ ऐसा जोड़ना चाहता हूं ताकि भीड़ से अलग दिखूं। नाम से कुछ फेम तो कुछ बदनामी भी मिले। बदनामी से मैं डरता नहीं। क्योंकि लेखक आधा बदनाम ही होता है।

सोच रहा हूं, मैं भी अपने नाम के बीच में 'राम जी', 'शिव जी', 'गणेश जी', 'टकला', 'लंगड़ा', 'कबाड़ी', 'भूरा' आदि उपनाम लगा लूं। ये सभी नाम हिट हैं। और, आसानी से किसी की भी जुबान पर चढ़ जाने के लिए पर्याप्त हैं।

कोशिश मेरी यही रहेगी कि मेरे नाम पर थोड़ा सियासी बवाल भी हो। मेरे 'उपनाम' की प्रासंगिकता या अप्रासंगिकता पर नेता और बुद्धजीवि लोग आपस में बहस करें। मेरे उपनाम से जुड़ा इतिहास खंगाला जाए। सोशल मीडिया पर मेरे 'उपनाम' के स्क्रीन या फोटो-शॉप्ड लगे जाएं।
इससे मुझे और मेरे नाम दोनों को समान फायदा मिलेगा। साथ ही, इस अवधारणा पर लोगों का विश्वास मजूबत होगा कि नाम में कुछ न रखा। कभी भी कैसे भी इस्तेमाल कर लो।

मैं तो कहता हूं, एक मुझे ही नहीं हर किसी को अपने नाम के साथ कुछ-न-कुछ खिलवाड़ करते रहना चाहिए। इससे खुद के साथ-साथ कई लोगों का मन लगा रहता है।

बदनाम होकर नाम कमाने का चार्म ही कुछ अलग है बॉस।

1 टिप्पणी:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के शहीदों की ९९ वीं बरसी “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !