बुधवार, 11 अप्रैल 2018

आइए, खुद पर हंसा जाए

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हम खुद पर हंसने से कतराते हैं। हां, दूसरों पर हंसने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते। दूसरों पर हंसना हमें अपनी 'उपलब्धि' नजर आता है। कुछ चेहरे ऐसे भी होते हैं जिन्हें देखकर यह सोचना पड़ता है कि आखिर बार वे कब और कितना हंसे होंगे? एक अजीब टाइप की गंभीरता वे अपने चेहरे पर धरे रहते हैं। मानो, अपनी गंभीरता के दम पर शांति का नोबेल जीत लेने की तमन्ना रखते हों!

लेकिन वो लोग सबसे खतरनाक होते हैं जो अपनी हंसी हंसते और दूसरे की हंसी रोते हैं। इन पर हंसने का आप दुःसाहस भी नहीं कर सकते।
इतिहास गवाह है, दुर्योधन अपनी हंसी हंसता और दूसरे की हंसी रोता था। हिटलर कब हंसता था यह खुद उसको भी मालूम न रहता होगा!
इनसे इतर, चार्ली चैपलिन ने तो खैर हंसते-हंसाते ही अपनी जिंदगी गुजार दी। जॉनी वॉकर कभी उधार की हंसी नहीं हंसे। केश्टो मुखर्जी तो अपने चेहरे के चाप से ही हमें उन पर हंसने को मजबूर कर देते थे। लगभग ऐसा ही हाल मिस्टर बीन का है। उनकी शक्ल देखते ही हंसी आ जाए।

हंसी एक नायाब अस्त्र है खुद और दूसरों को मानसिक रूप से जवान रखने का। यों, हंसते तो हम सभी हैं पर अपने पर हंसी गई हंसी का कोई मुकाबला नहीं।

इसीलिए तो मेरी हरदम कोशिश यही रहती है कि मैं ज्यादा से ज्यादा खुद पर ही हंसूं। खुद पर कटाक्ष करूं। खुद की खिंचाई करूं। खुद की बेवकूफियों को केंद्र में रख खुद पर तंज कसूं। आखिर पता तो चले कि मुझमें खुद पर हंसने की कितनी कुव्वत है।

असली सुख तो मुझे तब हासिल होता है, जब लोग मुझ पर हंसकर खुश होते हैं। उनकी खुशी मेरे लिए मायने रखती है। वरना, भाग-दौड़ भरी जिंदगी में किसके पास इतना समय है कि वो किसी पर हंसकर खुश होए। खुशी और हंसी से तो लोग ऐसे दूर भागने लगे हैं जैसे बिल्ली को देखकर चूहा।

दिल से निकली हंसी की बात ही कुछ और है। पर कुछ लोग दिल से न हंस हंसने के लिए लॉफ्टर क्लब का सहारा लेते हैं। लॉफ्टर क्लबों की हंसी वास्तविक नहीं कृत्रिम होती हैं। वहां खुद से हंसा नहीं जाता, जबरन हंसाया जाता है।

न न मुझे उधार की ऐसी हंसी कतई स्वीकार नहीं। हंसने के लिए किसी का मुंह ताकने से बेहतर है कि खुद ही खुद पर हंस लें। किसी से शिकायत भी नहीं रहेगी।

बे-अक्ल हैं वे लोग जो मूर्खों पर गुसाते हैं। जबकि मूर्ख तो हंसी का सबसे उत्तम वाहक हैं। वे न हों तो लोग शायद हंस ही न पाएं! इसीलिए तो मुझे अपनी बेवकूफी पर गुस्सा नहीं, हंसी आती है। मैं चाहता भी यही हूं कि लोग मुझे पर हंसें ताकि हमारे दरमियान हंसी का कारोबार चलता रहे।

1 टिप्पणी:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन कुन्दन लाल सहगल और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।