बुधवार, 25 अप्रैल 2018

उपवास से उपहास तक

उनके उपवास को उपहास का केंद्र खामखां बनाया गया। जबकि ऐसा किसी इतिहास या कानून की किताब में नहीं लिखा है कि उपवास मतलब नितांत 'भूखा' रहना। पहले या बीच-बीच में थोड़ी-बहुत टूंगा-टांगी चलती है। बंदा उपवास कर रहा है, कोई अपनी जान देने थोड़े न बैठा है। जीवन अनमोल है।

सोशल मीडिया तो झूठ और फोटोशॉप का पुलंदा है। जो धत्तकर्म कहीं नहीं हो सकते वो यहां होते रहते हैं। और, बेहद खुलकर होते हैं। सीन को थोड़ा समझने का प्रयास करें। पहली बात, सोशल मीडिया पर खाने की जो तस्वीर वायरल हो रही है, उसमें छोले-भटूरे नहीं पूरियां-छोले नजर आ रहे हैं। दूसरी बात, उस तस्वीर में अध्य्क्ष महोदय कहीं नहीं हैं। अब पार्टी के कुछ सदस्य बाहर जाकर कुछ खा-पी लेते हैं तो इसमें इतना हंगामा खड़ा करने का क्या मतलब! पेटपूजा से बड़ा कोई कर्म नहीं।

यों भी, यह कुछ घंटे का सांकेतिक उपवास था। सरकार को बस बताना भर था कि 'देखो, दलित हित के नाम पर उपवास हम भी कर सकते हैं।' जरा-सी देर के उपवास के लिए तमाम तरह की फॉर्मिल्टज निभाई जातीं, यह तो कोई अक्लमंदी नहीं होती! आगे जब कभी उन्हें लंबी भूख हड़ताल करनी होगी, तब देखा जाएगा।

हर किसी ने सोशल मीडिया और अखबारों में कथित छोले-भटूरे तो खूब देख लिए किंतु उपवास के पीछे का उद्देश्य समझने की कोशिश ही नहीं की। अमां, इतना आसान नहीं होता जन-हित के लिए सरकार से लड़ना-भिड़ना। धरने पर बैठना। आंदोलन करना। उपवास रखना। हरदम जनता को यह विश्वास दिलाते रहना कि तुम चिंता मत करो। हम मरते दम तक तुम्हारे साथ हैं। ऐसा कहने और करने का साहस केवल जन-नेता के पास ही होता है। और, उन्होंने यह करके भी दिखा दिया। यह क्या कम बड़ी बात रही?

पता नहीं कुछ लोग उनके हर प्रयास को मजाक में क्यों लेते हैं। वे कोई पहले जन-नेता तो हैं नहीं जो उपवास पर बैठे हों। अतीत में ऐसे नेताओं की फौज है जिन्होंने अपना राजनीतिक करियर ही उपवास के सहारे चमकाया है। उनमें से कोई सीएम बना बैठा है तो कोई मंत्री।

सामाजिक जीवन में भले ही न हों पर राजनीतिक जीवन में उपवास के अनेक लाभ हैं। सीधे शब्दों में कहूं तो बड़ा और मशहूर नेता बनने का रास्ता उपवास की गली में से होकर ही निकलता है। वो नेता ही किया जो अपनी जनता के हितों की खातिर कुछ देर भूखा न रह पाए। या दलित के घर खाना खाने न जाए!

अंदर ही अंदर मैं भी उनकी सांकेतिक भूख हड़ताल से प्रभावित हुआ हूं। मेरा भी दिल करने लगा है कि किसी दिन किसी सोशल मुद्दे पर मैं भी उपवास पर बैठूं। गोटी अगर फिट बैठ गई तो लेखक से नेता बनने की संभावनाएं किसी भी पॉलिटिकल पार्टी में तलाश लूंगा। जन-हित के वास्ते जितने काम मैं नेता बनकर कर सकता हूं, लेखक बने रहकर नहीं कर पाऊंगा। लेखक की इस दुनिया में सुनता ही कौन है! खुद की बीवी तक न सुनती।

भले ही उनके उपवास का सोशल मीडिया पर उपहास उड़ा पर कदम उन्होंने पीछे नहीं हटाए हैं। सरकार से 2019 में दो-दो हाथ करने की तैयारी में दिख रहे हैं। अच्छा है। बहुत अच्छा है। करें। मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।

तंज कसने वालो से मैं कहना चाहता हूं, छोले-भटूरे इतना बुरा आइटम नहीं कि आप उपहास उड़ाएं। बड़ा ही मस्त धंधा है। सही बताऊं, अगर मैं ज्यादा न पढ़ा होता तो आज निश्चित ही अपने शहर में मेरा भी छोले-भटूरे का ठेला होता। जितना मैं नौकरी कर कमा पा रहा हूं, इससे दोगुना छोले-भटूरे का ठेला लगा कर कमा लिया होता अब तक। जिंदगी चैन से गुजर रही होती।

अपने देश में हर टाइप का धंधा मंद हो सकता है पर खाने-पीने का कभी नहीं। बड़े-बड़े भूखड़ पड़े हैं यहां। खाने-पीने का फ्यूचर हमेशा ही ब्राइट है अपने देश में।

लोगों का क्या है वो तो कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं। अभी उन्होंने उनके उपवास को टारगेट किया कल को पीएम के किसी भाषण पर जोक बनाने लग जाएंगे। सोशल मीडिया के अपने चोचले हैं। अच्छा खासा उनका उपवास चल रहा था अगर सोशल मीडिया पर इसका उपहास न उड़ाया गया होता।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह उनका पहला उपवास था। पहले कदम में थोड़ी-बहुत गलतियां तो हो ही जाती हैं। परफेक्ट तो यहां कंप्यूटर भी न होता शिरिमानजी।

उपहास उड़ाने वाले खुद जरा आधा घंटा भूखा रहकर तो देख लें। कसम से भीतर तक के टांके ढीले न हो जाएं तो जो कहें वो हारने को तैयार हूं।
पॉपुलर नेता बनने के लिए ये सब तो करना पड़ेगा। अभी उन्होंने उपवास किया है, हो सकता है, कल को जन-हित की खातिर वनवास पर भी निकल जाएं। इरादे मजबूत होने चाहिए बाकी समय इतिहास लिखता रहता है। उनके उपवास ने भी कम बड़ा इतिहास नहीं रचा है! मानिए तो सही।

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

कैशलैस होइए, क्या समस्या है

जब 'पैसा हाथ का मैल है' तो 'एटीएम में कैश नहीं है' को लेकर इतना फिक्रमंद क्यों होना महाराज? नहीं है तो नहीं है। समझदारी तो इसमें है कि जो चीज नहीं है, काम उसके वगैर चलाया जाए। लेकिन नहीं...।
लगा पड़ा है हर कोई सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक कभी सरकार तो कभी बैंक को गरियाने में। गरियाते रहिए। गरियाने से न तो कैश एटीएम में भर जाएगा। न सरकार नतमस्तक होकर अपनी जेब से पैसा निकालकर आपके हाथ में धर देगी।

जबकि प्रधानमंत्री जी कितनी ही दफा हमसे कैशलैस होने का आह्वान कर चुके हैं। कितनी ही तरह की एप्स मौजूद हैं पैसे के लेन-देन के लिए। एक प्रकार से बैंक ही मोबाइल पर आ गया है। अब ज्यादा जरूरत न बैंकों के चक्कर काटने की रही, न कैश को जेबों में रखने की। लेकिन फिर भी लोग एटीएम और कैश के प्रति अपना मोह त्यागना नहीं चाहते।
कैशलैस होने के अपने फायदे हैं। सबसे बड़ा फायदा तो यही है कि जेब भारी-भरकम पर्स के बोझ से मुक्त रहती है। जेब कटने का खतरा भी न के बराबर रहता है। प्लास्टिक मनी से पैसा चुकाते वक्त चार लोगों की निगाह आप पर रहती है। सोसाइटी में आपका मान-सम्मान बढ़ता है।
अब तो कुछ एप्स से पेमेंट करने पर अच्छा-खासा 'कैश-बैक' भी मिलने लगा है। जेब में क्रेडिट कार्ड का होना खुद में कितना आत्मविश्वास भर देता है। इसे दिल से महसूस कीजिए।

न्यू इंडिया में रहना है तो कैश और एटीएम का मोह तो छोड़ना होगा। आदत तो डालने से डलती है जनाब। मुझे ही देखिए न। जेब में कैश होने के बावजूद पत्नी से साफ कह देता हूं पैसे नहीं हैं। जब भी कोई रिश्तेदार घर आने का मन बनाता है तो उनसे कह देता हूं कार्ड साथ में लेते आइएगा। बाहर नकदी की समस्या विकट है।

चाहे दूध वाला हो या सब्जी वाला सबको पेटीएम ही करता हूं। कैश का अपने साथ कोई रगड़ा नहीं। सिर्फ कहने या विज्ञापन के दिखाए जाने से ही थोड़े न बन जाएंगे हम न्यू या डिजिटल इंडिया। उस रूप में खुद को ढालना तो पड़ेगा ही न।

यकीन मानिए, इस कैश-वैश, एटीएम-फेटीएम में कुछ नहीं रखा। जितना जल्दी हो खुद को कैशलैस कर लीजिए। कैश के झंझट से मुक्ति पाइए। समय से दो कदम आगे चलने में ही भलाई है। कब तक यथास्थितिवाद में जीते रहेंगे महाराज।

मैं तो उस कल्पना भर से ही प्रफुल्लित हो जाता जब मुझे पूरा इंडिया कैशलैस नजर आता है। यों लगता है मानो किसी दूसरे ही संसार में आ गया हूं। कितना दिलचस्प होगा न कि एक भिखारी मुझसे कैशलैस भीख मांगे। या एक जूस वाला मुझे कैशलैस जूस पिलाए। इंडिया ऐसे ही तो बदलेगा। सरकार या बैंक को गरिया लेने से मन की भड़ास जरूर निकल जाएगी मगर कैश फिर भी हाथ-पल्ले न पड़ेगा।

तो क्यों न कैशलैस ही हुआ जाए। क्या समस्या है।

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

आतंकवादी नहीं हैं मच्छर

आजकल मुझे मच्छरों से पीड़ित लोग बहुत मिल रहे हैं। हर किसी की जुबान पर बस यही शिकायत है- 'मच्छरों ने आतंक मचा रखा है।' तो क्या मच्छर आतंकवादी हो गए हैं? नहीं। मैं मच्छरों की तुलना आतंक या आतंकवादी से करने के सख्त खिलाफ हूं। यह एक निरही जीव को बदनाम करने की कुत्सित साजिश है।

मैं इस बात की पूर्ण जिम्मेदारी लेने को तैयार हूं कि मच्छर कभी आतंक मचा ही नहीं सकते। आतंक न तो मच्छरों के स्वभाव में है न ही उनका शौक। यह मैं इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि मेरा उनका साथ 24x7 का है। न वे मुझसे एक पल को दूर रह सकते हैं न मैं उनसे।

सिर्फ हल्का-सा काट भर लेने के अतिरिक्त मच्छर कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। ईश्वर ने डंक उन्हें दिए ही इस बात के लिए हैं ताकि वे उनके माध्यम से खुद का दाना-पानी ले सकें। क्या हम मच्छरों के पेट की खातिर अपना थोड़ा-सा खून भी नहीं दे सकते? हे! मनुष्य, इतना भी स्वार्थी न बन कि एक नन्हे से जीव को जीवन भी न दे सके। यों भी बेचारे मच्छर की जिंदगी होती ही कितनी-सी है। बामुश्किल दस-पन्द्रह दिन।

मेरा ही खून दिन भर में जाने कितनी बार मच्छर पी लेते हैं किंतु मैंने न तो कभी बुरा माना न कभी शहर के डीएम साहब से शिकायत की। पी लेते हैं तो पी लें। इतने बड़े शरीर से चींटी बराबर खून अगर निकल भी जाएगा तो मेरा क्या चला जाएगा। जरूरतमंद को खून देना शास्त्रों में पुण्य का काम बताया गया है।

न जाने क्यों हम इंसान पुण्य कमाने से घबराते हैं। जबकि सबको पता है खाली हाथ आए थे, खाली हाथ ही जाना है। फिर भी...!

मच्छरों का वर्चस्व सर चढ़कर बोल रहा है। जमीन से लेकर जहाज तक में उनका रुतबा कायम है। अभी खबर पढ़ी कि एक विमान में मच्छर के काट लेने से अंदर विकट अप्रिय स्थिति बन गई। एयर-होस्टेस ने तो यात्री से यह तक कह डाला- 'हर कहीं हैं मच्छर। तुम देश बदल लो।'

मच्छरों से पार पाना फिलहाल असंभव-सा जान पड़ता है। लेकिन मच्छर आतंकवादी नहीं हैं।

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

नाम में कुछ न रखा

तय किया है कि मैं अपना नाम बदलूंगा! यह नाम अब मुझे जमता नहीं। न तो मेरे नाम में फिल्मी फील है न साहित्यिक प्रभाव। जब भी कोई मेरा नाम पुकारता है, लगता है, शुष्क नदी में पत्थर फेंक रहा हो! पता नहीं, क्या और क्यों सोचकर मेरे घर वालों ने मेरा यह नाम रख दिया।

बहुत अच्छे से याद है, जब क्लास में टीचर मुझे मेरे नाम से बुलाया करते तो सारे दोस्त मुझ पर हंसा करते थे। मजाक उड़ाते हुए कहते- कभी टाइम निकालकर दो-चार फूल हमारी बगिया में भी लगा जाना यार। कसम से उस वक़्त इतनी आक्रमक टाइप फील आती थी कि बस कुछ पूछिए मत। मन मसोस और मुट्ठी भिंच कर रह जाता था। लड़-भिड़ इसलिए नहीं सकता था क्योंकि मेरी गिनती क्लास के चरित्रवान स्टूडेंट्स में हुआ करती थी।

वैसे, मेरा चरित्रवान होना उनका कोरा भ्रम ही था। जबकि चरित्र से मेरा नाता दूर-दूर तक न तब था न अब है।

मैं अपने नाम के साथ कुछ ऐसा जोड़ना चाहता हूं ताकि भीड़ से अलग दिखूं। नाम से कुछ फेम तो कुछ बदनामी भी मिले। बदनामी से मैं डरता नहीं। क्योंकि लेखक आधा बदनाम ही होता है।

सोच रहा हूं, मैं भी अपने नाम के बीच में 'राम जी', 'शिव जी', 'गणेश जी', 'टकला', 'लंगड़ा', 'कबाड़ी', 'भूरा' आदि उपनाम लगा लूं। ये सभी नाम हिट हैं। और, आसानी से किसी की भी जुबान पर चढ़ जाने के लिए पर्याप्त हैं।

कोशिश मेरी यही रहेगी कि मेरे नाम पर थोड़ा सियासी बवाल भी हो। मेरे 'उपनाम' की प्रासंगिकता या अप्रासंगिकता पर नेता और बुद्धजीवि लोग आपस में बहस करें। मेरे उपनाम से जुड़ा इतिहास खंगाला जाए। सोशल मीडिया पर मेरे 'उपनाम' के स्क्रीन या फोटो-शॉप्ड लगे जाएं।
इससे मुझे और मेरे नाम दोनों को समान फायदा मिलेगा। साथ ही, इस अवधारणा पर लोगों का विश्वास मजूबत होगा कि नाम में कुछ न रखा। कभी भी कैसे भी इस्तेमाल कर लो।

मैं तो कहता हूं, एक मुझे ही नहीं हर किसी को अपने नाम के साथ कुछ-न-कुछ खिलवाड़ करते रहना चाहिए। इससे खुद के साथ-साथ कई लोगों का मन लगा रहता है।

बदनाम होकर नाम कमाने का चार्म ही कुछ अलग है बॉस।

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

लोटावाद की जय

सिवाय 'लोटावाद' को छोड़कर दुनिया के किसी भी वाद में मेरा रत्तीभर विश्वास नहीं। बाकी वादों के साथ अपनी-अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताएं हैं लेकिन लोटावाद के साथ ऐसा कुछ भी नहीं। यह वाद एकदम स्वतंत्र है।

हालांकि लोग ऐसा मानेंगे नहीं लेकिन अपनी-अपनी लाइफ में थोड़े-बहुत लोटे तो हम सभी हैं। जहां सुविधा या निजी हित देखें हैं, वहां लुढ़के भी हैं। सफलता का पूरा स्वाद केवल वही लोग चख पाते हैं, जिन्होंने लुढ़कने को अपने जीवन का मंत्र बनाया हुआ है।

खामखां के आदर्शों से दिल को सुकून तो अवश्य मिल सकता है किंतु पेट नहीं भरा जा सकता। पेट भरने के लिए लोटा तो बनना ही पड़ेगा।
लुढ़काऊपन लोटे में स्वभाविक है, बनावटी नहीं। जिस भी दिशा में चाहता है वो लुढ़क सकता है। लोटे के लुढ़कने पर किसी का जोर नहीं। यही वजह है कि लोटावादी अपने लोटावाद के साथ ज्यादा सहज रह पाते हैं। जैसे मैं।

दुनिया में जितने भी किस्म के वाद हैं, हर वाद अपने साथ किसी न किसी वैचारिक मजबूरी को ढोह रहा है। वैचारिक मजबूरियां तब अधिक बोझप्रद जान पड़ती हैं जब उन्हें जबरन थोपने की कोशिश की जाती है। आजकल यही हो रहा है। अपने-अपने वाद में यकीन रखने वाले वादी पूरी मुस्तैदी से लगे हैं दूसरे के वाद को खारिज करने में। उनके वाद ने उन्हें लोटा बना रखा है लेकिन वे यह मानेंगे थोड़े ही।

मगर लोटा-प्रेमी मस्त हैं अपने लोटावाद के साथ। उन्हें किसी के वाद से कोई मतलब नहीं। न उनकी किसी के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता है न वाद की मजबूरी। उनका पूरा ध्यान लुढ़कने में केंद्रित रहता है। जिसे वे अच्छे से निभा रहे हैं।

मुझे भी लोटावाद एक आदर्श वाद लगता है। इसीलिए हर किस्म के वाद से मैं खुद को दूर रखता हूं। चूंकि मुझे- अपनी सुविधानुसार- लुढ़कना पसंद है इसलिए लोटों में मेरा विश्वास गहन है।

समाज और दुनिया को समझने के लिए आपको लोटा बनना ही पड़ेगा। जब तक आप लुढ़केंगे नहीं, जान ही नहीं पाएंगे कि सयाने किस एंगल की ओर झुके हुए हैं।

ये वाद-फाद सब ऊपरी दिखवे हैं, असली मकसद है अपने काम का निकलना। काम निकालने के लिए इंसान किसी भी हद तक जा सकता है। वादवादी तो अपने-अपने वादों को खुद पर इसलिए ढो रहे हैं ताकि समाज की सहानुभूति जुटा सकें। नादान हैं।

अगर खुद की प्रासंगिकता को बचाए रखना है तो वैचारिक वादों से ध्यान हटाकर लोटावादी बनिए। जहां मतलब निकलता हुआ दिखे बस वहीं लोट जाइए। दुनिया क्या कहेगी, इसकी फिक्र दुनिया वालों पर छोड़िए।

लुढ़कते लोटावाद को अपने जीवन का अंतिम सत्य मानकर चलिए। दुनिया आपके कदमों में न हो तो मेरा नाम बदल देना।

आइए, खुद पर हंसा जाए

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हम खुद पर हंसने से कतराते हैं। हां, दूसरों पर हंसने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते। दूसरों पर हंसना हमें अपनी 'उपलब्धि' नजर आता है। कुछ चेहरे ऐसे भी होते हैं जिन्हें देखकर यह सोचना पड़ता है कि आखिर बार वे कब और कितना हंसे होंगे? एक अजीब टाइप की गंभीरता वे अपने चेहरे पर धरे रहते हैं। मानो, अपनी गंभीरता के दम पर शांति का नोबेल जीत लेने की तमन्ना रखते हों!

लेकिन वो लोग सबसे खतरनाक होते हैं जो अपनी हंसी हंसते और दूसरे की हंसी रोते हैं। इन पर हंसने का आप दुःसाहस भी नहीं कर सकते।
इतिहास गवाह है, दुर्योधन अपनी हंसी हंसता और दूसरे की हंसी रोता था। हिटलर कब हंसता था यह खुद उसको भी मालूम न रहता होगा!
इनसे इतर, चार्ली चैपलिन ने तो खैर हंसते-हंसाते ही अपनी जिंदगी गुजार दी। जॉनी वॉकर कभी उधार की हंसी नहीं हंसे। केश्टो मुखर्जी तो अपने चेहरे के चाप से ही हमें उन पर हंसने को मजबूर कर देते थे। लगभग ऐसा ही हाल मिस्टर बीन का है। उनकी शक्ल देखते ही हंसी आ जाए।

हंसी एक नायाब अस्त्र है खुद और दूसरों को मानसिक रूप से जवान रखने का। यों, हंसते तो हम सभी हैं पर अपने पर हंसी गई हंसी का कोई मुकाबला नहीं।

इसीलिए तो मेरी हरदम कोशिश यही रहती है कि मैं ज्यादा से ज्यादा खुद पर ही हंसूं। खुद पर कटाक्ष करूं। खुद की खिंचाई करूं। खुद की बेवकूफियों को केंद्र में रख खुद पर तंज कसूं। आखिर पता तो चले कि मुझमें खुद पर हंसने की कितनी कुव्वत है।

असली सुख तो मुझे तब हासिल होता है, जब लोग मुझ पर हंसकर खुश होते हैं। उनकी खुशी मेरे लिए मायने रखती है। वरना, भाग-दौड़ भरी जिंदगी में किसके पास इतना समय है कि वो किसी पर हंसकर खुश होए। खुशी और हंसी से तो लोग ऐसे दूर भागने लगे हैं जैसे बिल्ली को देखकर चूहा।

दिल से निकली हंसी की बात ही कुछ और है। पर कुछ लोग दिल से न हंस हंसने के लिए लॉफ्टर क्लब का सहारा लेते हैं। लॉफ्टर क्लबों की हंसी वास्तविक नहीं कृत्रिम होती हैं। वहां खुद से हंसा नहीं जाता, जबरन हंसाया जाता है।

न न मुझे उधार की ऐसी हंसी कतई स्वीकार नहीं। हंसने के लिए किसी का मुंह ताकने से बेहतर है कि खुद ही खुद पर हंस लें। किसी से शिकायत भी नहीं रहेगी।

बे-अक्ल हैं वे लोग जो मूर्खों पर गुसाते हैं। जबकि मूर्ख तो हंसी का सबसे उत्तम वाहक हैं। वे न हों तो लोग शायद हंस ही न पाएं! इसीलिए तो मुझे अपनी बेवकूफी पर गुस्सा नहीं, हंसी आती है। मैं चाहता भी यही हूं कि लोग मुझे पर हंसें ताकि हमारे दरमियान हंसी का कारोबार चलता रहे।

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

मच्छर हैं सदा के लिए

'जियो और जीने दो' में मेरा विश्वास बचपन से है। अपनी तरफ से मेरी पूरी कोशिश रहती है- मैं न किसी को सताऊं, न मारूं, न दबाऊं। खुद भी सुकून की जिंदगी काटूं, दूसरे को भी काटने दूं। क्योंकि जीवन अनमोल है।

इसीलिए मैंने मच्छरों को मारना, उड़ाना, भागना कतई बंद कर दिया है। कमरे में विकट मच्छर होने के बावजूद न मैं कॉइल जलाता हूं न रैकेट ही चलाता हूं। उन्हें इत्मिनान से विचरण करने देता हूं। जहां जिधर भी बैठना चाहें बैठे रहने देता हूं। अब तो कमरे से मैंने सीलिंग फैन भी उखड़वा दिया है। हालांकि इस मुद्दे पर पत्नी से भीषण बहस कई दफा हो चुकी है मगर मैं अपने इरादे पर कायम हूं। क्योंकि जैसे मेरा जीवन अनमोल है वैसे ही मच्छरों का भी।

मच्छरों के प्रति हम बेहद नकारात्मक नजरिया रखते हैं। हर वक्त उनका विनाश करने का ही प्लान बनाते रहते हैं। अब तो सरकारें भी मच्छरों के अस्तित्व पर सख्त हो गई हैं। विडंबना देखिए, सरकार मधुमक्खी पालन पर तो जोर देती है किंतु मच्छर पालन पर गोल रहती है। क्या यह मच्छर प्रजाति का अपमान नहीं? जबकि मच्छर से कहीं ज्यादा नुकसान मधुमक्खी करती है। जिन्हें मधुमक्खी ने काटा हो, वे उस असहनीय पीड़ा को बेहतर समझ सकते हैं।

इंसान के आक्रामक व्यहवार को देखते हुए मच्छरों ने भी खुद को बदल लिया है। वे भी ढीठ हो चले हैं। इंसान कितनी ही जुगत कर ले उन्हें भगाने या मारने की अब न वे भगाते हैं न मरते। आलम यह है, उन पर किसी हानिकारक कॉइल, दवा, इस्प्रे, रेपिलेंट का भी कोई असर नहीं होता। वे धड़ल्ले से हमें काट रहे हैं। और अपना पेट भर रहे हैं।

देख रहा हूं, जिन मच्छरों से प्रायः मैं कटवाता रहता हूं, वे सेहत में बड़े बलशाली हैं। खूब मोटे-ताजा। किसी भी खाए-पीए मच्छर को दीवार पर बैठे देखता हूं, मेरा दिल अंदर से खासा गर्व फील करता है कि मेरा खून किसी के तो काम आ रहा। इंसान को खून पिलाने से कहीं बेहतर समझूंगा मच्छर को खून पिलाना। कम से कम वो मेरा एहसान तो मानेगा।

मैं सबकुछ सह सकता हूं लेकिन मच्छरों के प्रति बेवफाई बर्दाश्त नहीं कर सकता। चाहे कोई हो। मैं मच्छरों को यों बेमौत मारे जाने के सख्त खिलाफ हूं। मच्छर की उम्र यों भी 10-12 दिन की ही तो होती है। क्यों उसे उतने दिन सुकून से जीने दिया जाए। हमें किसी की भी जान लेने का लीगल अधिकार नहीं। नहीं तो हममें और जानवर में फर्क ही क्या रह जाएगा।

सोच रहा हूं, अपनी बची-खुची जिंदगी मच्छरों को बचाने, उनके हितों की रक्षा में खर्च कर दूं। इंसानों के साथ सहानुभूति जताने के हश्र उपेक्षा के रूप में ही मिला है मुझे। क्यों न अब मच्छरों के जीवन को ही बचाया जाए।

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

निजता का लीक होना

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी कभी था। अब सोशल मीडिया का प्राणी है। जागने से लेकर सोने तक के सारे काम अब वो सोशल मीडिया पर 'ही' करता है। उसकी उंगलियों को तब तक चैन नहीं पड़ता जब तक वो उससे छोटी से छोटी बात का स्टेटस उसके फेसबुक पर डलवा नहीं लेतीं।

सोशल मीडिया पर किसी का किसी से कुछ भी छिपा नहीं है। हर कोई हर एक के बारे में उसकी पसंद, उसके टहलने-घुमने का समय, उसने क्या खाया, क्या पचाया, कब किससे कहां मिला सब जानता है। आलम यह है कि दो पड़ोसी आपस में एक-दूसरे को न जानते हों, न कभी मिले हों पर सोशल मीडिया पर सारी औपचारिकताएं निभा लेते हैं। व्यक्तिगत रूप से मिलना अब बोझ टाइप मामला लगने लगा है।

इतना कुछ सोशल मीडिया पर डालते रहने पर कभी-कभी वो चीजें भी यहां आ लेती हैं जिन्हें नहीं आना चाहिए। निजता में खलल पड़ने जैसा मामला हो जाता है। निजता में खलल पड़ते ही लिकिंग का दौर शुरू हो जाता है। न केवल सोशल मीडिया, बाहर पर खूब हंगामा मचता है।
जिनका डाटा लीक होता है वो तो शोर मचाते हैं ही, वो लोग भी खूब उछल-कूद करते हैं जिन्हें इस मसले से न लेना एक न देना दो होता है। बहती गंगा में भला कौन हाथ नहीं धोना चाहेगा।

डाटा लीक के मुद्दे पर जितना राजनीतिक दल आपस में मुंह-जोरी कर रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा बुद्धिजीवि सुलग रहे हैं। ये सारा सीन घटित हो सोशल मीडिया पर ही रहा है। हालांकि हमाम में नंगे सभी हैं पर स्वीकार कोई नहीं करना चाहता। निजता पर बहसबाजी चल अवश्य रही है पर छींकने, खंखारने की पोस्टें और पाउट बनाने की सेल्फियां फिर भी फेसबुक पर छाई हुई हैं। इनमें कहीं कोई कमी नहीं आई है।

लोग इतनी-सी बात नहीं समझते कि सोशल मीडिया या फेसबुक पर हमारा कुछ भी निजी नहीं है। सबकुछ पब्लिक डोमेन है। हमने खुद ही सबको यह अधिकार दे रखा है कि 'आओ, हमारा कुछ भी लीक कर जाओ।'

सोशल मीडिया पर निजता का लीक होने भी 'बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा' टाइप मामला है। यहां जिसकी निजता सबसे अधिक लीक हुई है, वो रात भर में सेलिब्रिटी बन गया। मसला यह नहीं है कि क्या लीक हुआ, सुकून इस बात का है कि जो लीक हुआ चलो अच्छा ही हुआ। घर बैठे मिला फेम भला कौन नहीं लेना चाहेगा!

सौ बात की एक बात ये है पियारे कि निजताएं कितनी भी क्यों न लीक हो जाएं लेकिन हम सोशल मीडिया या फेसबुक का साथ नहीं छोड़ने वाले। चूंकि लिकिंग का मामला अभी नया-नया है तो हल्ला कट भी रहा है, जैसे-जैसे लीकता के मामले पुराने पड़ने लगेंगे सब भूल जाएंगे। कुछ दिनों बाद लोग खुद ही कहते मिलेंगे- जैसे पैसा हाथ का मैल है, उसी तरह निजता का लीक होने सोशल मीडिया का मैल है। लेकिन यह मैल डिजिटल है अतः लोगों से सध जाएगा।

फिर भी, आप अपनी निजता के लीक होने की चिंताएं करना चाहते हैं तो शौक से करें। आखिर दिमाग है आपका।