गुरुवार, 29 मार्च 2018

उनसे भूल हो गई, उनका माफी दई दो...

एक जमाने में उनके 'आंदोलन' खूब चर्चा में रहते थे, आजकल 'माफीनामे' चर्चा में हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जिस दिन वो विरोधी दल के नेता से माफी न मांग रहे हों। कोई दब-छिपकर नहीं, खुलकर माफी मांग रहे हैं। हालांकि उनको इस तरह माफी मांगते देखना अच्छा तो नहीं लग रहा लेकिन सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते। उनके साथ भी लगभग यही सीन बन रहा है।

माफी मांगना उनके लिए न केवल समय मांग है बल्कि राजनीति का तकाजा भी। जीवन में अपने विरोधियों से लड़ने-भिड़ने की भी एक सीमा होती है महाराज। होते हैं कुछ साहसी लोग जो पूरी जिंदगी ही लड़ने में बीता देते हैं। लेकिन अगर माफी मांगकर बीच का रास्ता निकल आए तो माफी इतनी बुरी भी नहीं। वैसे भी, राजनीति में नेता को हर कदम देख-भाल कर उठाना चाहिए। कब, किस मोड़ पर किस पार्टी या नेता का दामन थामना पड़ जाए, इसका विशेष ख्याल रखना पड़ता है।
मैं देख रहा हूं कुछ लोग उनके माफी मांगने से खुश नहीं। फेसबुक, ट्विटर पर अपनी नाराजगी उनसे लगातार व्यक्त भी कर रहे हैं। उनकी ईमानदारी, उनके साहस, उनकी निष्ठा पर सवाल उठा रहे हैं। अपने विरोधियों की तरफ झुका हुआ तक कह रहे हैं।

बड़े नादान हैं लोग। कुछ समझते ही नहीं। यों भी, किसी को सलाह देना बहुत आसान है मगर जब खुद पर पड़ती है तो ऊपर से लेकर नीचे तक के टांके ढीले हो जाते हैं। राजनीति में रहकर विरोधी नेताओं से थोड़ा-बहुत विरोध तो चलता है। मगर विरोध इतना तगड़ा भी न हो कि अगले की लाइफ मुकदमों के झमेले में ही उलझ कर रह जाए।

एकाध मुकदमा हो तो बंदा लड़ भी ले किंतु यहां तो उन पर मुकदमों की लिस्ट खाने के मीनू से भी कहीं अधिक लंबी है। पूरी जिंदगी लड़कर भी चार-पांच फिर भी बाकी रह जाएंगे। तो बेहतर और बीच का रास्ता तो यही है कि एक-एक कर विरोधी नेताओं से माफी मांग ली जाए। कम से कम आगे का राजनीतिक सफर तो सुकून से कटेगा।

बात जहां तक ऊंचे आदर्शों, ईमानदारी, सत्यता आदि की है, ये सब किताबों में ही अच्छी लगती हैं, राजनीतिक और सामाजिक जीवन इसके उलट ही होता है। उलट होना चाहिए भी। इमानदारी के चक्कर में अगर पड़े रहेंगे तो दो वक्त की छोड़िए, एक वक्त की रोटी भी नसीब न होगी महाराज।

मैं नहीं समझता, माफी मांगकर वे कोई पाप कर रहे हैं। बल्कि माफी के आदर्श को समाज के बीच स्थापित कर रहे हैं। बता रहे हैं, शांति और चैन का रास्ता माफी मांग कर ही निकल सकता है। माफी कठोर से कठोर को पिघलाने का माआदा रखती है। माफी मांगकर बंदा जीवन में ऊंचे मानक बना सकता है। माफी मांगकर न केवल राजनीतिक कॅरियर बल्कि नौकरी को जाने से लेकर शादी को टूटने तक से बचाया जा सकता है। शमी यही तो गलती कर रहा है। बीवी से माफी मांग ले तो झगड़ा तुरंत सेट हो जावे। पता नहीं लोगों को अपनी बीवी से माफी मांगने में इतनी शर्म क्यों आती है। एक मैं हूं जो 24x7 अपनी न केवल अपनी बीवी बल्कि जो रास्ते में मिल जाता है उससे बे-बात ही माफी मांग लेता हूं।

सॉरी कहने में कोई एक्स्ट्रा एनर्जी थोड़े न बर्न करनी है।
ऐसा भी कोई है दुनिया में जो माफी न मांग रहा हो! हर कोई अपने-अपने स्तर पर किसी न किसी मसले को लेकर माफी मांग ही रहा है। यह बात अलग है कि माफियों के रंग अलग-अलग हैं। पर माफी तो मांग ही रहे हैं न।

इतिहास किस्म-किस्म के माफीनामों से भरा पड़ा है। सबसे ज्यादा माफीनामे राजनीति के हैं। जिन्होंने माफी नहीं मांगी उनका हश्र या तो दुर्योधन जैसा हुआ या फिर कंस जैसा। रावण भी अगर माफी मांग लेता तो आज बहुतों का आदर्श होता! नहीं क्या?

किसी को हो चाहे न हो पर मुझे तो आदरणीय के माफीनामे पर घणा गर्व है। बल्कि मुझे तो यह सीख हासिल हुई है कि जब, जहां अपना दांव कमजोर पड़ने लगे तुरंत माफी मांग लो। इसी में खुद की भलाई है। हर वक़्त की ऐंठबाजी ठीक न होती पियारे।

और फिर वे माफी ही तो मांग रहे हैं। कोई चोरी-चकारी थोड़े न कर रहे। माफी में शर्मिंदा होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। यह बहती गंगा में हाथ धोने जैसा करम है।

अतीत में की गई भूलें एक-एक कर अब वो सुधार रहे हैं। यह एक अच्छी शुरुआत है। बाकी लोगों का क्या है उनका तो कम ही है कहना।

अभी जिन्होंने उन्हें माफी नहीं दी है, मुझे पूरी उम्मीद है, एक दिन वे भी उन्हें माफी दे ही देंगे। अंत में जीत तो माफी की ही होनी है।

1 टिप्पणी:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, लायक बेटे की होशियारी “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !