मंगलवार, 27 मार्च 2018

आइए, मूर्तियां लगाएं

पहले मैं मूर्तियों के खिलाफ था। जबकि मुझे नहीं होना चाहिए था। मूर्तियां रहती हैं तो राजनीतिक व सामाजिक दलों को गाहे-बगाहे 'फेम' दिलवाती रहती हैं। पक्षियों के रहने-बैठने का ठिकाना होती हैं। मूर्तियों के नीचे खड़े होकर नारे लगाने और क्रांति करने का हौसला पैदा होता है। मूर्तियां रह-रहकर हमें इतिहास के सबक भी याद दिलाती हैं। कभी-कभार महापुरुषों की मूर्तियों के गले मालाएं डालने से लेकर आयोजन की डोरियां लपेटने के काम भी आती हैं। जब बस नहीं चलता तो कुछ कुंठित लोग मूर्तियां तोड़ते हैं। मूर्तियां तोड़कर वे दूसरे की विचारधारा को धकिया अपनी विचारधारा थोपने की जुगाड़ में रहते हैं।

कुछ दिन पहले मोहल्ले वालों ने चौराहे पर मेरी मूर्ति लगाना तय किया। इस बाबत मुझसे मेरी सहमति भी मांगी गई। किंतु मैंने यह कहते हुए मना करने की कोशिश की कि मेरी मूर्ति लगाने से बेहतर यह होगा कि किसी क्रांतिकारी महापुरुष की मूर्ति लगाई जाए। मगर मोहल्ले वालों को मेरा सुझाव पसंद नहीं आया। वे मेरी ही मूर्ति लगाने पर डटे रहे।

जब मैंने उनसे पूछा कि 'आप लोग मेरी ही मूर्ति लगाने की जिद पर क्यों अड़े हुए हैं?' तो उनका जवाब था- 'आप चूंकि न केवल हमारे मोहल्ले बल्कि शहर के भी बड़े लेखक हैं इस नाते हम चौराहे पर आपकी मूर्ति लगाना चाहते हैं। आपकी मूर्ति हमें सोच, विचार, धैर्य और लेखन का हौसला देती रहेगी।'

अपने प्रति उनके इतने गंभीर विचार जानकर पहले तो मैं खुद पर शर्मिंदा हुआ। फिर उनसे कहा- 'सज्जनों, अमूमन मूर्तियां तो मर चुके लोगों की लगती हैं मैं तो फिलहाल अभी आपके बीच हूं।' तभी एक सज्जन बोल पड़े- 'लेकिन हम यह करिश्मा आपके जीते-जी करना चाहते हैं। आप बस अपनी नाक और गर्दन का नाप दे दीजिए मूर्ति के वास्ते।' नाक और गर्दन का नाप सुनकर मैं थोड़ा चौंका! इतने में उन्हीं सज्जन ने बात को संभालते हुए कहा- 'मूर्ति में दो ही चीजों का खास ख्याल रखना चाहिए। एक- गर्दन, दूसरा- नाक। अप्रिय स्थिति में सबसे अधिक चोट इन्हीं पर पड़ती है।'

खैर, उनके समझाने-बुझाने पर मैंने चौराहे पर अपनी मूर्ति लगाने की इजाजत दे दी। मोहल्लेदारी में ज्यादा भाव खाना ठीक नहीं। सबका साथ में ही तो मेरा विकास संभव है।

लेकिन अभी हाल मूर्तियां तोड़े जाने की खबरों ने मुझे थोड़ा डरा-सा दिया है। मैं अपनी मूर्ति (जोकि अभी बनी भी नहीं है) के बारे में सोचने लगा। कल को यही सब अगर मेरी मूर्ति के साथ हुआ? वैचारिक असहमति रखने वाले किसी सरफिरे ने मेरी भी मूर्ति को तोड़ डाला तो मैं क्या करूंगा? कैसे बचाऊंगा अपनी नाक और गर्दन टूटने से? स्टैच्यू की तरह खड़े बुत कहां अपनी रक्षा खुद कर पाते हैं। जब तक उन्हें बचाने को लोग आते हैं सिरफिरे अपना काम तमाम कर चुके होते हैं।

'तो क्या इस डर से मूर्तियां लगाना छोड़ दिया जाए?' मैंने खुद से ही प्रश्न किया। भीतर से आवाज आई- 'नहीं। कदापि नहीं। मूर्तियां लगना अगर बंद हो जाएंगी तो कितने ही मूर्तिसाज बेरोजगार हो जाएंगे। फिर कलाकार, शिल्पकार कैसे मूर्तियों में अपनी कल्पनाओं के रंग भर पाएंगे। जैसे- रोटी, कपड़ा, मकान और मोबाइल जरूरी है उसी तरह समाज के जीने और अपनी आस्थाओं को बनाए-बचाए रखने के लिए मूर्तियां भी जरूरी हैं।'

वो देश भी कोई देश है महाराज जहां मूर्तियां न हों। चूंकि हम बड़े लोकतंत्र हैं इस नाते मूर्तियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी ज्यादा बनती है। सेक्युलरिज्म क्या होता है यह विरोधियों को हमसे सीखना चाहिए। हम मूर्तियों के प्रति भी एकदम सेक्युलर भाव रखते हैं। हमारे यहां लेनिन से लेकर गांधी, पेरियार से लेकर प्रेमचंद तक की मूर्तियां हैं। जिस तरह चंद सरफिरों ने कुछ मूर्तियों को खंडित किया उसकी हर कोई कड़ी निंदा कर रहा है। कड़ी निंदा करने का अपना असर होता है।

कोई कितना ही बड़ा मूर्तिपूजक या मूर्तिभंजक क्यों न हो मूर्ति के प्रति थोड़ी-बहुत आस्था तो रखता ही है। इसीलिए तो गाहे-बगाहे मूर्तियां बनती और लगती भी रहती हैं।

बहरहाल, मैंने अपना मूर्ति विरोध छोड़ दिया है। मैं दिल से चाहता हूं न सिर्फ मेरी बल्कि आमो-खास की भी मूर्ति लगनी चाहिए। दो-चार कुंठित लोगों के तोड़ भर देने से मूर्तियां लगनी बंद थोड़े न हो जाएंगी। बंद होनी चाहिए भी नहीं।

2 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन गुरु अंगद देव और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

उम्दा प्रस्तुति