सोमवार, 26 मार्च 2018

डाटा ही तो था, चोरी हो गया तो क्या!

इससे कहीं अच्छा तो पहले का जमाना था, जब सोशल मीडिया हमारे जीवन में दूर-दूर तलक नहीं था। चैन से खाते थे। सुकून से पीते थे। आराम से सोते थे। जी भरकर एक-दूसरे से घंटों बातें किया करते थे। जीवन में रंग, उमंग, तरंग सबकुछ था। संवेदनशील तब भी थे पर इतने भी नहीं कि भूत का नाम सुनते ही टेंशन में आ जाएं। हनुमान चालीसा पढ़ ली फिर भूत तो क्या उसके फरिश्ते भी पास फटकने की हिम्मत न करते थे!

मगर अब तो पूरा सीन ही बदल लिया है। संवेदनशील इतने हो गए हैं कि एक जरा-सा डाटा चोरी होने पर सोशल मीडिया से लेकर संसद तक कोहराम कटा पड़ा है। उधर ट्विटर पर 'डिलीट फेसबुक' हैशटैग चल रहा है तो इधर नेता लोग आपस में ही लड़े-भिड़े पड़े हैं। बच्चों की तरह एक-दूसरे पर 'मैंने नहीं, इसने किया' टाइप इल्जाम लगा रहे हैं। डाटा चोरी का इतिहास खंगाला जा रहा है। किस कंपनी ने किस पार्टी को चुनावों में कितना फायदा पहुंचाया पर विकट बहस छिड़ी है।

मतलब देश से अन्य सभी समस्याएं दूर हो चुकी हैं। जनता खुशहाली की ओर अग्रसर है। फिलहाल बड़ी और खास समस्या डाटा चोरी की ही है। नेता लोग इसी के समाधान में रात-दिन लगे पड़े हैं। जबकि जुकरबर्ग माफी मांग चुका है।

इतनी सिंपल-सी बात किसी को समझ न आ रही कि डाटा ही तो था चोरी हो गया। इसमें कौन-सा पहाड़ टूट गया महाराज। दुनिया में जाने क्या-क्या चोरी हो रहा है। हर तरफ चोर घात लगाए बैठे हैं। लेकिन फिर भी लोग खुश हैं। मस्ती के साथ जी रहे हैं। उन्हें मालूम है कि चोरी चली गई चीज वापस तो मिलने से रही फिर काहे को मातम मनाना? दो-चार मिनट का अफसोस जताया, छुट्टी!

डाटा कोई पहली दफा तो चुरा है नहीं। महीने, दो महीने में कोई न कोई खबर किसी न किसी के डाटा चुरने की आ ही जाती है। विकिलिक्स ने तो पिछले दिनों कितनी ही बड़ी-बड़ी हस्तियों के डाटा लीक किए। क्या हुआ? कुछ भी नहीं। थोड़े दिन हंगामा कटा फिर सब शांत।

किसी और क्या कहूं; मेरे ही फेसबुक का डाटा कितनी बार चुराया जा चुका है। मगर मैंने तो न कभी जुकरबर्ग से शिकायत की न सरकार से। जरा-जरा से मसलों की शिकायत करने लग जाऊंगा तो आधी जिंदगी तो शिकायतों के हवाले ही हो जाएगी। डाटा चुरना था चुर गया। इस पर अफसोस जतलाकर क्या करना!

देखो जी, यह सोशल प्लेटफॉर्म है। यहां डाटा चोरी होना कोई बड़ी बात नहीं। ऐसे मुद्दों को हल्के में लेना चाहिए।

लोग जब अपना दिल चुरने पर हल्ला नहीं काटते तो डाटा चोरी होने पर जाने क्यों चीखे पड़े हैं? डाटा को दिल की तरह ही ट्रीट करें। चोरी हो भी गया तो क्या; कम से कम किसी के काम तो आया। जितना बांटेगे उतना मिलेगा। इंसानियत का तकाजा भी यही है।

कोई टिप्पणी नहीं: