सोमवार, 19 मार्च 2018

लोन लीजिए, लोन लेने में कोई बुराई नहीं

फिलहाल, मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि बैंक से कर्ज (लोन) लेने में कोई बुराई नहीं। बल्कि फायदा ही फायदा है। माशाअल्लाह आप अगर अमीर बंदे है तो दसों उंगलियां घी में। लोन लेके चुकाओ न चुकाओ, कोई न टोकने वाला। लोन लेके विदेश भाग जाओ तो नहले पे दहला। फिर तो मुल्क की पुलिस, सीबीआई, ईडी आदि तरह-तरह की तरकीबें ही निकालती रहेंगी आपको स्वदेश वापस लाने की। जैसे- अभी नीरव मोदी के लिए लगी पड़ी हैं।

हालांकि पुराने जमाने के लोग आज भी ठीक नहीं मानते बैंक क्या किसी से भी कर्जा लेना। वे तो साफ कहते हैं, कर्जा लेके घर बनवाया या गाड़ी खरीदी किस काम का! जैसे- भीख मांगकर अपनी इच्छा पूरी कर ली हो। चूंकि वे आदर्शवादी लोग हैं तो लाजिमी है उन्हें लोन (कर्ज) आदि लेना गया-बीता काम तो लगेगा ही। आज के जमाने की हकीकत यही है कि बिना लोन लिए काम भी तो नहीं चल सकता न। या तो दिली तमन्नाएं पूरी कर लीजिए या फिर मुंह ताकते रहिए। हर किसी के जीवन में जरूरतें इस कदर बढ़ गई हैं। अगला लोन न ले तो क्या करे।

बैंक भी भला कहां कम हैं। लोन देने को यों तैयार बैठे रहते हैं मानो उनकी कोई पुरानी उधारी हो हम पर। एक दिन में कितने बैंकों से कितने एसएमएस आ जाते हैं, हमें खुद ध्यान नहीं रहते।

अच्छा, हर चीज का लोन उपलब्ध है। आप डिमांड तो कीजिए। इधर जब से मोबाइल फोन पर लोन क्या मिलने लगा है, अब तो शायद ही कोई हाथ खाली नजर आता हो, जिसने महंगे से महंगा मोबाइल न पकड़ रखा हो। किश्तों पर अस्सी हजार तक के मोबाइल लोग इतना आसानी से ऐसे खरीद लेते है जैसे साग-सब्जी।

लोन के चलन ने लोगों की जिंदगी को बदलकर रख दिया है।

लोन लेना भी एक सब्जबाग की ही तरह होता है। चीजें जितनी सरल ऊपर से नजर आती हैं भीतर से उतनी ही टेढ़ी होती हैं। बैंकिंग व्यवस्था में लोन की परिभाषा अमीर के लिए कुछ और गरीब के लिए कुछ और है। अमीर हजारों करोड़ का लोन लेके विदेश चंपत हो जाए, मंजूर है। लेकिन गरीब द्वारा दस-पन्द्रहा हजार का लोन न चुका पाने की स्थिति में उसके घर से लेकर कपड़े लत्ते तक जब्त कर लिए जाते हैं।

लोन का सुख भोगने के लिए अमीर होना आवश्यक है। अगर रसूखदार हैं तो बात ही क्या। फिर तो बैंक वाला घर आनकर आपको लोन दे जाएगा। चुकाने के तकादे भी हैसियत देखकर ही किए जाएंगे।

कभी-कभी तो मेरा दिल भी करता है कि मोटा-तगड़ा एक लोन मैं भी ले लूं। लोन का सुख क्या होता है, थोड़ा मैं भी भोग लूं। जब चुकाने की बारी आए तो विदेश भाग लूं। जैसे और लोगों पर बनी हैं मुझ पर भी तरह-तरह की खबरें बनेंगी। चैनलों पर बहसें होंगी। अखबारों में नाम और फोटू छपेगी।

बता दूं, बदनामी से मैं नहीं डरता। बदनामी तो हाथ का मैल है। जो जितना बदनाम है वो उतना ही नाम वाला है। जो सिद्ध-पुरूष लोन लेके विदेश भाग गए, जब वे अपनी बदनामी से कभी न डरे, तो भला मैं ही क्यों डरूं!

लोन भले ही एक कर्ज है। पर इसे लेना हमारा फर्ज है। नहीं तो बैंकों के पास पड़े-पड़े पैसे को घुन नहीं लग जाएगा! घुन न लगे, चूहें न काटे, चोर चुराकर न ले जाए इसीलिए तो बैंक लोगों को लोन देकर थोड़ा हल्का हो लेते हैं।

देखो जी, दुकान हर किसी की चलती रहनी चाहिए। चाहे वो बैंक हो या आम आदमी। लोन लेने में बुराई कोई नहीं। बल्कि खुद की हैसियत में चार चांद ही लगते हैं।

लोन के सहारे ही सही अगर दिल के कुछ अरमान पूरे हो रहे हैं तो कर लीजिए। क्योंकि जिंदगी न मिलेगी दोबारा। जब धरती पर आए हैं तो लोन से लेकर जेल तक का हर अनुभव लीजिए। परिणाम की चिंता कतई न कीजिए। चिंता चिता समान। नीरव मोदी, ललित मोदी, विजय माल्या अपनी-अपनी चिंताओं पर खाक ही तो डाले हुए हैं। और, बेहतर सुख में हैं!

चलिए फिर, लोन लेकर थोड़ा-बहुत फर्ज मैं भी निभा ही लूं। क्यों ठीक है न!

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