गुरुवार, 15 मार्च 2018

रिस्क से इश्क कीजिए

रिस्क लेने का अपना मजा है। दाल में नमक का स्वाद और दूध में पानी की मात्रा रिस्क लेकर ही समझ आती है। रिस्क लेकर ही पता चलता है कि आपका दिल वाकई मजबूत है या मजबूत करने की गोलियां ले रहे हैं। बिना रिस्क लिए तो आप पत्नी के बनाए खाने की 'बुराई-भलाई' भी नहीं कर सकते। मैं तो यहां तक कहता हूं, नेता बनना लेखक बनने से कहीं अधिक रिस्की है। चाहे तो खुद पर आजमा कर देख लीजिए।

रिस्क लेना क्या होता है यह मार्केटिंग के उस बंदे से पूछिए जो हर रोज अपने माल को बेचने की कोशिश अपनी नौकरी को रिस्क पर रखकर करता है।

इंसान की जाने दीजिए, अब तो जिंदगी भी इतनी सयानी हो चली है, वो साथ उसी का देना पसंद करती है जो रिस्क लेने का बूता रखता हो।
इश्क में भी दिलजलों की अब कोई औकात न रही। कद्र अब उन्हीं आशिकों की है, जो रिस्क के दम पर अपने प्रेम को शादी के मंडप तक निभा ले जाते हैं। लेकिन रिस्क लेने की हिम्मत होनी दो तरफा ही चाहिए। एक तरफा रिस्क बहुत जल्दी फिस्स हो जाता है।

कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो रिस्क लेने को टाइम की बर्बादी समझते हैं। जो और जैसा चल रहा है उसी को आनंद मानते हैं। समंदर में पैर डालने से इसलिए डरते हैं कहीं डूब न जाएं। शेर के मुंह में हाथ देने से इसलिए डरते हैं कहीं वो खा न जाए। और तो और अपने मोबाइल की गैलरी में लॉक इसलिए लगाकर रखते हैं कहीं बीवी के हाथ न पड़ जाए। बताइए, ये तो आलम है। इतना भी रिस्क लेने से अगर भय खाएंगे तो जीवन में क्या अनूठा कर पाएंगे?

रिस्क-विहीन जिंदगी बड़ी बोरिंग होती है। न कोई उत्साह होता है न उमंग। जिंदगी भी सोचती होगी, ये किस बोगस आत्मा में प्रवेश कर गई। मेरा तो बचपन तो यही मानना रहा है कि जिंदगी लंबी भले न ही पर रिस्की अवश्य होनी चाहिए।

इसीलिए तो मेरा प्रयास हमेशा यही रहता है कि मैं निरंतर रिस्क लेता रहूं। रिस्क लेने में एक अजीब किस्म का पागलपन होता है। ठीक वैसा ही जैसा अक्सर 'भाबी जी घर पर हैं' में सक्सेना जी हमें दिखाते रहते हैं। पगलेट टाइप हरकतें रिस्क को और भी आकर्षक बना देती हैं।

रिस्क बोझ नहीं। बल्कि बोझ तो वो सोच है जिसमें रिस्क लेने का दम नहीं होता। रिस्क से मोह पालिए। रिस्क से इश्क कीजिए। रिस्क को अपना खुदा-गवाह बनाइए। फिर देखिए, रिस्क लेना कितना आसान लगने लगेगा।

नेता या व्यापारी लोग अगर रिस्क न लें तो ताउम्र वहीं पड़े रहें जहां से शुरुआत की थी। सड़क से संसद तक की दौड़ बिना रिस्क लिए पूरी हो ही नहीं सकतीं।

सच कहूं तो रिस्क लेने के मामले में नेतागण मेरी प्ररेणा हैं। उन्हीं को देख-देखकर जीवन में जरा-बहुत रिस्क लेना सीख पाया हूं। मौका देखकर चौक मारने का रिस्क नेता से बेहतर कोई दूसरा सीखा ही नहीं सकता।

तो अपने रिस्क के प्रति इश्क का जज्बा बनाए रखिए और जीवन का आनंद लेते रहिए।

1 टिप्पणी:

smt. Ajit Gupta ने कहा…

हमारी आत्मा ने भी बहुत बड़ी रिस्क ली थी, जो हमारे शरीर में आयी। बढ़िया लगा रिस्क का लेना।